3 जनवरी 2026,

शनिवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

मेरी खबर

icon

प्लस

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

भाजपा मोदी के सहारे, कांग्रेस अपनों से परेशान, गुजरात में जीत की हैट्रिक का तानाबाना बुनने में लगी BJP

वर्ष 1995 के विधानसभा चुनावों के बाद से ही सूबे की सल्तनत की बागडोर भाजपा ने थाम रखी है। मतदाताओं पर पकड़ का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2022 के विधानसभा चुनावों में मोरबी ब्रिज हादसा होने के बावजूद मतदाताओं ने भाजपा की झोली में रेकार्ड 156 सीटें डाली। पढ़िए रुपेश मिश्रा का विशेष लेख...

3 min read
Google source verification
modi_shah_gujarat_lok_sabha.jpg

छब्बीस लोकसभा सीटों और 182 विधानसभा सीटों वाला गुजरात अब भाजपा का ऐसा गढ़ बन चुका है, जिसमें सैंध लगाना विपक्षी पार्टियों के लिए आसान नहीं। वर्ष 1995 के विधानसभा चुनावों के बाद से ही सूबे की सल्तनत की बागडोर भाजपा ने थाम रखी है। मतदाताओं पर पकड़ का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2022 के विधानसभा चुनावों में मोरबी ब्रिज हादसा होने के बावजूद मतदाताओं ने भाजपा की झोली में रेकार्ड 156 सीटें डाली। हां, वर्ष 2017 के विधानसभा चुनावों में पार्टी की लगाम जरूर ढ़ीली पड़ी जब भाजपा की सीटों में जीत का आंकड़ा सिमट कर 99 रह गया था। कांग्रेस भले ही सरकार नहीं बना पाई थी, लेकिन 78 सीटें जीतकर दुर्ग को भेदने में सक्षम रहने के संकेत जरूर दे दिए थे।

बात लोकसभा की करें तो 1991 के बाद से मजबूत होती भाजपा 2014 में पूरा मैदान ही अपने नाम कर लिया। लेकिन भाजपा की तैयारी और मतदाताओं के मन टटोलने पर पता चलता है कि जीत की हैट्रिक लगाने के लिए भाजपा इस बार भी ब्रांड मोदी के इर्द-गिर्द पूरे चुनाव का तानाबाना बुन रही है।

बात कांग्रेस की करें तो पार्टी यहां अपनों के सितम से ही परेशान है। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की आंधी में जीतने वाले कांग्रेस विधायकों में से चुनाव आते-आते कितने साथ रह पाएंगे यह बड़ा सवाल है। पिछले दो माह में ही तीन विधायक पार्टी से किनारा कर चुके हैं। पांच विधायकों को लेकर सियासी गलियारे में सुगबुगाहट तेज है। कांग्रेस को लोकसभा चुनाव की तैयारियों की दिशा में झटके लगते ही जा रहे हैं। राम मंदिर मुद्दे पर कांग्रेस आलाकमान के स्टैंड पर कार्यकर्ताओं की नाराजगी भी सामने आई है। ऐसे में पार्टी की नौका पार लगाना कांग्रेस अध्यक्ष शक्ति सिंह गोहिल के सामने बड़ी चुनौती है।

नायक के रूप में उभरे थे

कांतिलाल दरअसल, मोरबी में इस अचंभित परिणाम के पीछे लोग भाजपा के उस मास्टरस्ट्रोक को याद करते हैं जो पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने कांतिलाल अमृतिया को उम्मीदवार बनाकर चला। पांच बार के विधायक रह चुके कांतिलाल सियासी गलियारे में ओझल हो चुके थे। मोरबी ब्रिज हादसे में कांतिलाल लोगों के लिए मसीहा बनकर सामने आए।

उन्होंने कई लोगों की जान बचाई। पूर्व विधायक का यह सेवाभाव लोगों को इतना पसंद आया कि सोशल मीडिया से लेकर सियासी गलियारे तक कांतिलाल नए नायक के रूप में उभरे। इस समूचे घटनाक्रम ने उनके हाशिए में पहुंचे सियासी करियर को नई रफ्तार दे दी। भारतीय जनता पार्टी ने तब के मंत्री का टिकट काटकर कांतिलाल पर दांव खेला तो नतीजा पक्ष में आया और भाजपा ने फंसी हुई बाजी जीत ली।


ब्रिज हादसे के बाद से मोरबी प्रदेश की सबसे हॉट सीट बन गई थी। लिहाजा भाजपा ने इसे जीतने के लिए अलग से रणनीति पर काम किया। माना यह जा रहा था कि मोरबी सीट 2017 की तरह यदि हाथ से फिसल जाती तो प्रदेश की राजनीति में अलग संदेश जाता। हादसे के तुरंत बाद पीएम मोदी खुद लोगों का हालचाल जानने पहुंचे थे। इसके अलावा यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ जैसे फायरब्रांड नेताओं को भी मैदान में उतारा। यहां दिल्ली के सीएम अरविन्द केजरीवाल से लेकर कांग्रेस के इमरान प्रतापगढ़ी तक पहुंचे थे।

लोकसभा के चुनाव जल्द ही होने वाले हैं। मोरबी के मुख्य बाजार में कुछ व्यापारियों से चुनावी चर्चा छेडऩे की कोशिश की। व्यापारियों का मानना था कि मोरबी में यातायात जाम व क्षतिग्रस्त सड़कों की समस्या है। लेकिन मोरबी के महानगरपालिका बनने के बाद अब विकास कार्य तेजी से होने की उम्मीद बंधी है। किराना व्यापारी जयंती भाई का तर्क था कि विकास कार्य हो रहे हैं इसलिए थोड़ी परेशानियां भी हैं। जल्द ही सब ठीक हो जाएगा। यहीं मौजूद उमेश कुमार का कहना था कि विकास और राममंदिर के मुद्दे पर भाजपा का ही माहौल नजर आता है। कांग्रेस की सक्रियता कहीं दिखती भी नहीं।