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1951: बेलगाम चुनाव खर्च बना बड़ी चुनौती, जानिए पहले चुनाव में प्रति मतदाता कितने पैसे का आया था खर्च?

Lok sabha election 2024: देश में पहली बार जब 1951 में आम चुनाव हुए थे, तब करीब 17 करोड़ मतदाताओं ने चुनाव में भाग लिया था। उस समय प्रति मतदाता 60 पैसे का खर्च आया था। जबकि 2019 का लोकसभा चुनाव देश का सबसे महंगा चुनाव रहा। यह राशि लोकसभा चुनाव 2024 में बढ़ने वाली है। पढ़ें नरेन्द्र सिंह सोलंकी की विशेष रिपोर्ट...

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चुनावों के दौरान राजनीतिक पार्टियां पानी की तरह पैसा बहाती हैं। पिछले लोकसभा चुनाव की तरह इस बार भी भारत का चुनाव दुनिया में सबसे महंगा होने वाला है। इस साल के लोकसभा चुनावों में लगभग 97 करोड़ से ज्यादा मतदाता हिस्सा लेंगे। मतदाताओं की संख्या के हिसाब से यह दुनिया का सबसे बड़ा चुनाव होने वाला है। देश में पहली बार जब 1951 में आम चुनाव हुए थे, तब करीब 17 करोड़ मतदाताओं ने चुनाव में भाग लिया था। उस समय प्रति मतदाता 60 पैसे का खर्च आया था। इस तरह पहले आम चुनाव में सिर्फ 10.5 करोड़ रुपए खर्च हुए थे। वहीं, 2019 तक आते-आते यह खर्च 6500 करोड़ रुपए तक पहुंच गया।

किन कारणों से महंगा हो रहा चुनाव?

लोकसभा चुनाव का खर्च भी कई कारणों से बढ़ा है। एक तो मतदाताओं की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। दूसरा प्रत्याशियों से लेकर पोलिंग बूथ और संसदीय क्षेत्रों की संख्या में भी बढ़ोतरी हुई है। 1951-1952 के लोकसभा चुनाव में 53 पार्टियों के 1874 उम्मीदवार 401 सीटों से मैदान में उतरे थे। 2019 में यह संख्या काफी बढ़ गई। पिछले आम चुनाव में 673 पार्टियों के 8054 उम्मीदवारों ने 543 सीटों पर अपनी किस्मत आजमाई थी। देशभर में कुल 10.37 लाख पोलिंग बूथ बनाए गए थे। भारतीय चुनाव आयोग की ओर से लोकसभा क्षेत्रों के उम्मीदवारों के लिए खर्च की सीमा राज्यों के आधार पर 54 लाख से 70 लाख रुपए से बढ़ाकर 70 लाख से 95 लाख रुपए कर दी गई थी।

खर्चों के अध्ययन के लिए EC ने किया था समिति का गठन

इसी तरह, विधानसभा क्षेत्रों के लिए खर्च की सीमा राज्यों के आधार पर 20 से 28 लाख रुपए से बढ़ाकर 28 से 40 लाख रुपए कर दी गई थी। वर्ष 2020 में चुनाव खर्च की सीमा का अध्ययन करने के लिए चुनाव आयोग ने एक समिति का भी गठन किया था।