
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन । (फोटो: IANS )
Target: तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन ने एक बार फिर केंद्र सरकार और अपने राजनीतिक विरोधियों पर जोरदार निशाना साधा है। मंगलवार को दिए गए उनके एक बयान ने राष्ट्रीय राजनीति में हलचल तेज कर दी है। उन्होंने बेहद स्पष्ट और सख्त शब्दों में चेतावनी दी है कि जो भी तमिलनाडु को धोखा देगा या राज्य की प्रगति में बाधा बनेगा, उसके लिए वह स्वयं एक बड़ा 'खतरा' साबित होंगे।
सीएम का यह आक्रामक रूप अकारण नहीं है। इसके पीछे एक गहरी राजनीतिक और क्षेत्रीय चिंता छिपी है। स्टालिन का यह बयान मुख्य रूप से केंद्र सरकार की उन नीतियों के खिलाफ है, जिन्हें वे राज्यों के अधिकारों का हनन मानते हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि तमिलनाडु जैसी तेजी से विकास करने वाली और आर्थिक रूप से मजबूत अर्थव्यवस्था को उसके बेहतरीन प्रदर्शन का इनाम मिलने की बजाय परोक्ष रूप से 'सजा' दी जा रही है।
इस पूरे सियासी बवाल की सबसे बड़ी जड़ 'परिसीमन' की सुगबुगाहट है। स्टालिन ने सीधे तौर पर आरोप लगाया है कि केंद्र सरकार परिसीमन लागू करने के लिए जो आक्रामक रुख अपना रही है, उसका सीधा और बड़ा नुकसान दक्षिण भारत के राज्यों को उठाना पड़ेगा। दरअसल, तमिलनाडु और अन्य दक्षिणी राज्यों ने दशकों तक परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण के मामले में देश में सबसे बेहतरीन काम किया है। अब भविष्य में परिसीमन के जरिए लोकसभा सीटों का निर्धारण यदि जनसंख्या के आधार पर होता है, तो आबादी बढ़ाने वाले उत्तर भारत के राज्यों की सीटें बढ़ जाएंगी और दक्षिण के राज्यों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व और ताकत घट जाएगी।
स्टालिन की चिंता सिर्फ संसद की चंद सीटों तक सीमित नहीं है; यह द्रविड़ स्वाभिमान और राज्य की स्वायत्तता से जुड़ा एक बड़ा भावनात्मक मुद्दा भी है। उनका कहना है कि जिन राज्यों ने शिक्षा, स्वास्थ्य और जनसंख्या नियंत्रण जैसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय लक्ष्यों को सफलतापूर्वक हासिल किया है, उन्हें इस नई परिसीमन व्यवस्था के तहत राजनीतिक हाशिए पर धकेल दिया जाएगा। स्टालिन ने इसे सीधे तौर पर एक अन्यायपूर्ण कदम बताया है, जिसे तमिलनाडु की जनता कभी स्वीकार नहीं करेगी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि स्टालिन का यह कड़ा बयान भविष्य की राजनीति की दिशा तय कर रहा है। जैसे-जैसे परिसीमन की समय सीमा नजदीक आ रही है, उत्तर बनाम दक्षिण का यह राजनीतिक टकराव और भी ज्यादा उग्र होने की संभावना है। मुख्यमंत्री स्टालिन ने अपने तेवरों से साफ कर दिया है कि वह अपने राज्य के अधिकारों और हितों की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं और इस गंभीर मुद्दे पर वह मूकदर्शक बनकर नहीं बैठेंगे।
सीएम स्टालिन का बयान दक्षिण भारतीय राज्यों की उस गहरी चिंता को दर्शाता है, जिसमें उन्हें अपने घटते राजनीतिक वजूद का डर सता रहा है। यह एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति भी है, जिसके जरिए स्टालिन न केवल तमिलनाडु में अपनी स्थिति मजबूत कर रहे हैं, बल्कि पूरे दक्षिण भारत में खुद को क्षेत्रीय अधिकारों के सबसे बड़े रक्षक के रूप में पेश कर रहे हैं।
आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या केरल, कर्नाटक और तेलंगाना जैसे अन्य दक्षिणी राज्य भी परिसीमन के मुद्दे पर स्टालिन के साथ मिलकर केंद्र के खिलाफ कोई 'संयुक्त मोर्चा' बनाते हैं? इसके अलावा, केंद्र सरकार इस बढ़ते असंतोष को शांत करने के लिए क्या राजनीतिक या संवैधानिक विकल्प पेश करती है।
इस विवाद का एक बड़ा आर्थिक पहलू भी है। दक्षिणी राज्य देश की जीडीपी और कर संग्रह में बहुत बड़ा योगदान देते हैं। ऐसे में उनकी यह पुरानी शिकायत रही है कि उन्हें उनके द्वारा दिए गए टैक्स के अनुपात में केंद्र से फंड नहीं मिलता। अब अगर परिसीमन से उनकी राजनीतिक ताकत भी कम होती है, तो यह 'आर्थिक और राजनीतिक अलगाव' की भावना को और हवा दे सकता है। ( इनपुट: IANS )
Updated on:
21 Apr 2026 02:47 pm
Published on:
21 Apr 2026 02:11 pm
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