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पहाड़ों की गोद में पल रही ‘ग्लेशियर सुनामी’, 30 लाख भारतीयों की जान जोखिम में

पहाड़ों की गोद में 'ग्लेशियर सुनामी' पल रही है जो काफी खतरनाक है। क्या है पूरा मामला? आइए जानते हैं।

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भारत

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Tanay Mishra

Feb 21, 2026

Glaciers turning into lakes

Glaciers turning into lakes

हिमालय की चोटियों पर जमी बर्फ अब जीवन देने वाली नदियों के बजाय 'ग्लेशियर सुनामी' की भूमिका बना रही है। आईआईटी रुड़की के वैज्ञानिकों द्वारा 'साइंटिफिक रिपोर्ट्स' में प्रकाशित एक नई रिसर्च के अनुसार पूरे एशिया के ऊंचे पहाड़ी इलाकों में 31,000 से ज़्यादा ग्लेशियर अब झीलों में बदल गए हैं और यह तेज़ी से हो रहा है। एक्सपर्ट्स ने चेतावनी दी है कि अगर इन झीलों के प्राकृतिक बांध टूटते हैं, तो यह 2013 की केदारनाथ त्रासदी जैसी तबाही ला सकते हैं। ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से यह झीलें अब किसी 'टाइम बम' की तरह टिक-टिक कर रही हैं।

'ग्लेशियर सुनामी' का खतरा

जब ग्लेशियर पिघलते हैं, तो अपने पीछे बड़े गड्ढे छोड़ जाते हैं जो पानी से भर जाते हैं। इन्हें 'ग्लेशियल लेक' कहा जाता है। इन झीलों को रोकने वाले कच्चे बांध पत्थर, मिट्टी और बर्फ के मलबे से बने होते हैं, जो बहुत कमज़ोर होते हैं। ऊंचाई पर होने के कारण जब ये बांध टूटते हैं, तो पानी नीचे की ओर तेज़ रफ्तार से गिरता है। गांवों तक पहुंचते-पहुंचते यह सैलाब रास्ते में आने वाले घर, पुल और पावर प्लांट को पल भर में मिटा सकता है। इसे ही 'ग्लेशियर सुनामी' कहते हैं जिसका खतरा काफी बढ़ गया है।

आईआईटी रुड़की का 'सैटेलाइट' खुलासा

पहाड़ों की दुर्गम ऊंचाइयों और बादलों के कारण इन झीलों पर नजर रखना मुश्किल था। लेकिन आईआईटी रुड़की की टीम ने नासा और ईएसए के सैटेलाइट डेटा, रडार सेंसर और हाई-रिजॉल्यूशन मैप्स की मदद से एक 'ऑटोमेटेड इन्वेंट्री' तैयार की है, जो इन झीलों के हर छोटे-बड़े बदलाव को ट्रैक कर रही है।

एक पत्थर भी बन सकता है विनाश की वजह

वैज्ञानिकों का कहना है कि इन झीलों को फटने के लिए किसी बड़े भूकंप की जरूरत नहीं है। पहाड़ी का एक हिस्सा टूटना या भारी बारिश भी दबाव बढ़ाकर इन्हें तोड़ सकती है। अक्सर इन क्षेत्रों में मदद पहुंचने तक बहुत देर हो चुकी होती है और सुरक्षित निकलना नामुमकिन हो जाता है। ऐसे में 30 लाख भारतीयों की जान जोखिम में है।