
गुरुमीत राम रहीम, गुरविंदर एस ढिल्लों, संत निरंजन दास (फोटो- फाइल फोटो)
Punjab Politics: पंजाब की राजनीति हमेशा से केवल पार्टियों, नेताओं और जातीय समीकरणों तक सीमित नहीं रही है। राज्य में धार्मिक संस्थाओं, डेरों और संत समाज की भूमिका चुनावी नतीजों को प्रभावित करने वाली सबसे महत्वपूर्ण ताकतों में गिनी जाती है। जैसे-जैसे 2027 के विधानसभा चुनाव करीब आ रहे हैं, वैसे-वैसे पंजाब की राजनीति में डेरों का प्रभाव फिर से चर्चा के केंद्र में आ गया है।
हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा डेरा सचखंड बल्लां के प्रमुख संत निरंजन दास को पद्मश्री सम्मान दिए जाने के बाद यह बहस और तेज हो गई है कि पंजाब में धार्मिक प्रभाव अब केवल आस्था तक सीमित नहीं, बल्कि सीधा राजनीतिक गेम चेंजर बन चुका है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह सम्मान केवल आध्यात्मिक योगदान की पहचान नहीं, बल्कि डेरा वोट बैंक को साधने की एक बड़ी राजनीतिक रणनीति भी है। पंजाब में मुख्य रूप से तीन डेरों का प्रभाव सबसे अधिक माना जाता है। इसमें डेरा सचखंड बल्लां, डेरा सच्चा सौदा और राधा स्वामी सत्संग ब्यास शामिल है।
पंजाब के दोआबा क्षेत्र, जिसमें जालंधर, होशियारपुर और कपूरथला जैसे जिले शामिल हैं, वहां डेरा सचखंड बल्लां का प्रभाव बेहद मजबूत माना जाता है। यह डेरा रविदासिया समुदाय का प्रमुख धार्मिक केंद्र है। रविदासिया समुदाय मुख्य रूप से दलित वर्ग से जुड़ा है और दोआबा की लगभग 19 विधानसभा सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाता है।
पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी भी इसी समुदाय से आते हैं और लंबे समय से डेरा सचखंड बल्लां से उनके करीबी संबंध रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि डेरा के समर्थन ने चन्नी को क्षेत्र में मजबूत जनाधार दिलाने में मदद की है। इसी महत्व को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फरवरी में गुरु रविदास जयंती के अवसर पर डेरा मुख्यालय का दौरा किया था। किसी मौजूदा प्रधानमंत्री का यह पहला दौरा था, जिसे चुनावी रणनीति से जोड़कर देखा गया।
प्रधानमंत्री की यात्रा के बाद आम आदमी पार्टी (AAP) सरकार ने भी डेरा को साधने के प्रयास तेज कर दिए। राज्य सरकार ने डेरा गतिविधियों के लिए जमीन आवंटित करने से लेकर संत निरंजन दास का विशेष स्वागत करने तक कई कदम उठाए। पंजाब में लगभग 32 प्रतिशत दलित आबादी है और उसमें दोआबा का वोट बैंक किसी भी पार्टी के लिए सत्ता का रास्ता तय कर सकता है। यही कारण है कि लगभग हर दल डेरा सचखंड बल्लां के साथ अच्छे संबंध बनाए रखने की कोशिश करता है।
पंजाब का मालवा क्षेत्र राज्य की राजनीति का सबसे बड़ा सत्ता केंद्र माना जाता है। 117 विधानसभा सीटों में से लगभग आधी सीटें इसी इलाके में आती हैं। इस क्षेत्र में डेरा सच्चा सौदा का गहरा प्रभाव है, जिसका मुख्यालय हरियाणा के सिरसा में स्थित है। डेरा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह कानूनी मामलों और विवादों के बावजूद आज भी अपने अनुयायियों पर मजबूत पकड़ बनाए हुए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि डेरा सच्चा सौदा का समर्थन किसी भी करीबी मुकाबले में 15 से 20 सीटों का सीधा असर डाल सकता है। यही वजह है कि राजनीतिक दल सार्वजनिक रूप से दूरी बनाकर रखते हुए भी चुपचाप डेरा से संपर्क बनाए रखते हैं। अतीत में डेरा कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी (BJP) और शिरोमणि अकाली दल (SAD) जैसे दलों को समर्थन देता रहा है।
हालांकि, बेअदबी विवाद और राम रहीम से जुड़े गंभीर मामलों के कारण पंजाब में डेरा को लेकर संवेदनशील माहौल बना रहता है। आम आदमी पार्टी ने लगातार डेरा राजनीति का विरोध किया है। पंजाब सरकार ने कई बार यह चिंता भी जताई कि चुनावों से पहले राम रहीम को मिलने वाली पैरोल राज्य के कानून व्यवस्था हालात को प्रभावित कर सकती है। विपक्षी दल अक्सर आरोप लगाते रहे हैं कि चुनावी फायदे के लिए केंद्र सरकार डेरा प्रमुख के प्रभाव का इस्तेमाल करती है।
अमृतसर के पास स्थित राधा स्वामी सत्संग ब्यास पंजाब का एक और बेहद प्रभावशाली धार्मिक केंद्र है। माना जाता है कि इसका असर करीब 19 विधानसभा सीटों पर पड़ता है। इस डेरा की खास बात यह है कि यहां कभी खुलकर किसी राजनीतिक दल के समर्थन की घोषणा नहीं की जाती। इसके बावजूद लाखों अनुयायियों और सभी जातियों में फैले मजबूत नेटवर्क के कारण यह राजनीतिक नेताओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक मंच बना हुआ है।
हाल ही में पंजाब भाजपा के नए प्रदेश अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों ने पद संभालने के तुरंत बाद डेरा प्रमुख बाबा गुरिंदर सिंह ढिल्लों से मुलाकात कर आशीर्वाद लिया। वहीं शिरोमणि अकाली दल के नेताओं के भी डेरा प्रमुख से करीबी संबंध रहे हैं। फरवरी 2026 में बाबा गुरिंदर सिंह ढिल्लों ने नाभा जेल में बंद अकाली नेता बिक्रम मजीठिया से मुलाकात की थी और उन पर लगे आरोपों को गलत बताया था। इस घटना ने राजनीतिक विवाद भी खड़ा कर दिया था। मुख्यमंत्री भगवंत मान ने इस मुलाकात पर परोक्ष टिप्पणी करते हुए एक पंजाबी कविता पोस्ट की थी, जिसे डेरा प्रमुख पर निशाना माना गया। इसे उन दुर्लभ घटनाओं में गिना गया जब किसी मौजूदा मुख्यमंत्री ने खुले तौर पर किसी डेरा प्रमुख के रुख पर सवाल उठाया हो।
पंजाब की राजनीति में डेरा और संत समाज केवल धार्मिक पहचान नहीं हैं, बल्कि यह सामाजिक और चुनावी ताकत भी बन चुके हैं। दलित वोट, पंथक राजनीति और क्षेत्रीय समीकरणों के बीच डेरों की भूमिका लगातार बढ़ती जा रही है। 2027 चुनावों से पहले लगभग सभी प्रमुख दल डेरा समर्थन हासिल करने की कोशिश में जुटे हुए हैं। ऐसे में आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि पंजाब की सत्ता की चाबी आखिर किस डेरा के आशीर्वाद से खुलती है।
Updated on:
26 Jun 2026 01:27 pm
Published on:
26 Jun 2026 01:14 pm
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