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पिछड़े-दलित वर्ग के जिन लोगों को मिल चुका है आरक्षण का लाभ, अब अतिपिछड़ों को दें मौका: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने इस कानूनी सवाल की समीक्षा शुरू कर दी है कि क्या पिछड़ी जातियों में जो लोग आरक्षण के हकदार थे और इसका लाभ भी प्राप्त चुके हैं, उन्हें अब आरक्षण की कैटेगरी से बाहर निकलना चाहिए।

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पिछड़ी जातियों में जो लोग रिजर्वेशन के हकदार थे और इसका लाभ ले चुके हैं, उन्हें अब आरक्षित श्रेणी से बाहर निकालना चाहिए। साथ ही शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि लाभ ले चुके लोगों को अधिक पिछड़ों के लिए रास्ता बनाना चाहिए। सर्वोच्च न्यायलय के 7 न्यायधीशों की बेंच ने इस कानूनी सवाल की समीक्षा शुरू कर दी कि क्या राज्य सरकार को शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश और सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने के लिए अनुसूचित जातियों (एससी) और अनुसूचित जनजातियों (एसटी) में उप-वर्गीकरण करने का अधिकार है?


संविधान पीठ इस सवाल की जांच कर रही

भारत के चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली बेंच में जज बी आर गवई, विक्रम नाथ, बेला एम त्रिवेदी, पंकज मिथल, मनोज मिश्रा और सतीश चंद्र शर्मा शामिल हैं। सुनवाई के दौरान संविधान पीठ की अगुवाई कर रहे चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने साफ कह दिया कि वह सिर्फ मात्रात्मक डेटा से संबंधित तर्कों में नहीं पड़ेंगे, जिसके चलते पंजाब सरकार को कोर्ट के अंदर 50 फीसदी कोटा प्रदान करना पड़ा।

सर्वोच्च अदालत वर्तमान में 23 याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है, जिनमें 2010 में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती दी गई है। इनमें पंजाब सरकार की मुख्य अपील भी शामिल है। सर्वोच्च अदालत की 7 जजों की बेंच अब यह जांच कर रही है कि क्या एससी और एसटी श्रेणियों के अंदर उप-वर्गीकरण की अनुमति देनी चाहिए, जैसा कि पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए है, और क्या राज्य विधानसभाएं इस अभ्यास को करने के लिए राज्यों को सशक्त बनाने वाले कानून पेश कर सकती हैं।

बढ़ना उन लोगों का अधिकार- महाधिवक्ता गुरमिंदर सिंह

बहस की शुरुआत करते हुए महाधिवक्ता गुरमिंदर सिंह ने कानूनी प्रावधानों और दो जातियों के लिए विशेष प्रावधान बनाने के कारणों का जिक्र किया। गुरमिंदर सिंह ने कहा कि 'जाति व्यवस्था और भेदभाव के चलते समाज में गहरे विभाजन हुए और कुछ जातियां हाशिए पर चली गई हैं और निराशा की स्थिति में आ गई हैं। जो लोग हाशिए पर चले गए हैं, उनके पास पिछड़ापन आ गया है। आगे बढ़ना उन लोगों का अधिकार है, जिनके पास यह है और हमें पिछड़ेपन पर ध्यान देने की जरूरत है जो सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक आदि हो सकता है।'

पंजाब सरकार की ओर से महाधिवक्ता गुरमिंदर सिंह ने कहा कि 2006 के कानून में आरक्षण 50 प्रतिशत तक सीमित था और इसका उद्देश्य पिछड़ों में से सबसे पिछड़ों को सबसे आगे लाना था।

[typography_font:14pt;" >क्या बोले चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़

चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने सुनवाई के दौरान कहा, "इस पर पंजाब सरकार को ध्यान देना चाहिए। पहला, यह कि क्या वास्तविक समानता की धारणा राज्य को आरक्षण का लाभ देने के लिए पिछड़े वर्गों के भीतर व्यक्तियों के अपेक्षाकृत पिछड़े वर्ग की पहचान करने की अनुमति देती है। दूसरा, यह कि क्या संघीय ढांचा, जहां संसद ने पूरे देश के लिए जातियों और जनजातियों को नामित किया है, यह राज्यों पर छोड़ देता है कि वे अपने क्षेत्र के भीतर अपेक्षाकृत हाशिए पर रहने वाले समुदायों को कल्याणकारी लाभ के लिए नामित करें।"

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