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इस राज्य में कांग्रेस रच सकती है इतिहास, केसीआर का तीसरी बार सीएम बनने का सपना टूटेगा!

तेलंगाना के मुख्यमंत्री पद पर 3 दिसंबर के बाद क्या के.सी.आर. बने रहेंगे? या फिर साढ़े नौ साल बाद कोई दूसरा मुख्यमंत्री राज्य की बागडोर संभालने जा रहा है? ये सवाल राजनीतिक दलों के साथ राजनीतिक पंडितों को भी उलझाए हुए हैं। विधानसभा चुनाव के लिए वोट पड़ने के बाद सबकी नजरें कल होने वाली मतगणना पर टिकी हैं।

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एग्जिट पोल आने के बाद सभी राजनीतिक दलों के दावे अपनी जगह हैं, लेकिन तमाम राजनीतिक विश्लेषक इस बात पर एक राय हैं कि इस बार फाइट टाइट है। पिछले विधानसभा चुनाव में तीन चौथाई बहुमत से सत्ता हासिल करने वाले केसीआर की राह में कांग्रेस सबसे बड़ी बाधा बनकर उभरी है। अगर कांग्रेस यहां चुनाव जीत जाती है तो यह बहुत बड़ी बात होगी। भाजपा ने यहां मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने के पूरे प्रयास किए, लेकिन यहां मुख्य मुकाबला बीआरएस और कांग्रेस के बीच ही सिमटा नजर आया। एग्जिट पोल की कहानी भी मतदाताओं की जुबानी सामने आईं बातों को ही दोहराती लगती है।

सबसे बड़ा सवाल कि क्या बीआरएस हार सकती है?

इसके बावजूद पिछले विधानसभा चुनाव में 73 फीसदी मतदान की तुलना में इस बार 64 फीसदी मतदान से भी नतीजों का सार समझने की जरूरत है। चुनाव में नतीजों से पहले और बाद में तमाम सवाल उठते हैं, पर उनके जवाब हमेशा एक जैसे नहीं होते।

सबसे बड़ा सवाल कि क्या बीआरएस हार सकती है? दूसरा सवाल कि अगर कांग्रेस सत्ता में आई तो मुख्यमंत्री कौन बनेगा? एक और सवाल कि अगर नतीजे त्रिशंकु हुए तो भाजपा किसके साथ जाएगी? बहरहाल, त्रिशंकु विधानसभा की हालत में भाजपा के कांग्रेस को समर्थन देने की संभावना तो गले नहीं उतरती।

भाजपा ने अलग-अलग राज्यों में अनेक बार ऐसे दलों से हाथ मिलाया है, जिससे उसकी विचारधारा मेल नहीं खाती, पर भाजपा ने कभी कांग्रेस से हाथ नहीं मिलाया। ये सच है कि अगर भाजपा कुछ सीटें जीतती है तो त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में वह किसी भी हालत में कांग्रेस का साथ नहीं देगी। सवाल में से फिर एक सवाल यह कि क्या ऐसे में कांग्रेस को रोकने के लिए भाजपा केसीआर की बीआरएस को समर्थन देगी।

ये सवाल इसलिए महत्त्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि असदुद्दीन ओवैसी की एआइएमआइएम पार्टी राज्य की 9 सीटों पर चुनाव लड़ी है। वहीं शेष 110 सीटों पर बीआरएस को समर्थन दिया है। ऐसे में भाजपा के भावी कदम पर सबकी निगाहें रहेंगी। तेलंगाना के गठन के बाद राज्य में यह दूसरा विधानसभा चुनाव है। साढे़ नौ साल से सत्तारूढ़ केसीआर समय-समय पर कांग्रेस व भाजपा का विरोध करते नजर आए हैं।

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