
पत्रकारिता के शलाका पुरुष कर्पूरचन्द्र कुलिश जी की जन्मशती। ( फोटो: पत्रिका)
सर्वकालिक पत्रकारिता के पुरोधा और राजस्थान पत्रिका के संस्थापक कर्पूर चन्द्र कुलिश जी के जीवन और उनके संघर्ष को हम सब अच्छी तरह जानते हैं। एक निडर और सच्चे पत्रकार के रूप में उन पर बहुत कुछ लिखा गया है। आज की तेज रफ्तार डिजिटल न्यूज़ और रोज की भागदौड़ में, हम अक्सर कुलिश जी के उस निजी और गहराई वाले रूप को भूल जाते हैं, जो उनकी किताब 'धाराप्रवाह' में साफ दिखता है। आज हम उनके उस पहलू पर बात करेंगे जिस पर शायद ही कभी ज्यादा चर्चा हुई हो—जैसे उनका एकांत से प्यार, 'जीवन' और 'अस्तित्व' के बीच का फर्क, और साहित्य में 'दुखवाद' (निराशा) का विरोध। उनके ये विचार ही उन्हें सिर्फ एक संपादक या संस्थापक नहीं, बल्कि एक बहुत बड़ा विचारक और जीवन को समझने वाला एक शलाका पुरुष बनाते हैं।
अक्सर लोग कुलिश जी के शुरुआती दिनों को 'संघर्ष के दिन' या 'बुरे दिन' कहते हैं। लेकिन 'धाराप्रवाह' किताब में वे इस बात को बिल्कुल नहीं मानते। उनकी गहरी सोच यहीं से दिखने लगती है, जब वे साफ कहते हैं कि संघर्ष तो मनुष्य खुद चुनता है और जो मुसीबत सामने आ जाए, उसका तो सामना करना ही पड़ता है। उन्होंने कभी अपने मुश्किल समय को 'बुरे दिन' नहीं माना। वे जयशंकर प्रसाद की 'कामायनी' की लाइनों—"अरे… मधुर हैं…. कष्टपूर्ण भी.. जीवन की…. बीती घड़ियां" याद करते हुए कहते हैं कि बीते हुए दिनों का गुजर जाना ही अच्छा है, क्योंकि उन्हीं से अच्छे दिनों की शुरुआत होती है।
कुलिश जी इंसान और जानवर के बीच एक बहुत बड़ा फर्क बताते हैं। उनके अनुसार, पशुओं के लिए जन्म से लेकर मृत्यु तक केवल अपने 'अस्तित्व' (वजूद) को बनाए रखना ही पर्याप्त होता है, लेकिन मनुष्य के लिए केवल 'अस्तित्व' काफी नहीं है; मनुष्य का लक्ष्य 'जीवन' जीना है। जीवन का मतलब है अपने वजूद को बचाने के साथ-साथ कुछ बड़ा और अच्छा करना। जब वे दिल्ली या जयपुर में एक नौकरी या अपनी पहचान बनाने के लिए मेहनत कर रहे थे, तो वे उसे सिर्फ 'अस्तित्व की लड़ाई' मानते थे। उनके हिसाब से वे बुरे दिन नहीं थे, बल्कि 'जीवन के तप के दिन' थे, जब वे अपने वजूद को मजबूत बनाने के लिए डटे हुए थे।
उनका कवि मन और साहित्य को देखने का नजरिया एकदम साफ था। उन्होंने जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पंत और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जैसे बड़े लेखकों को खूब पढ़ा। लेकिन उनका साफ मानना था कि साहित्य का असली मकसद 'आनंद' देना और इंसान को ऊपर उठाना होना चाहिए, न कि निराशा या दुख को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाना।
कुलिश जी मानते थे कि 'साहित्य' शब्द का मतलब ही है—"सहितस्य भावं साहित्यम्" अर्थात जिसमें सबका 'भला' या 'हित' छिपा हो। वे याद दिलाते हैं कि हमारे पुराने साहित्य में आनंद ही आखिरी लक्ष्य होता है। वे भवभूति के नाटक 'उत्तर रामचरित' को दुखद अंत वाली कहानी मानने वालों को गलत बताते हैं, क्योंकि सीता का धरती में समा जाना दुखवाद का प्रतीक नहीं है। कुलिश जी की नजर में तुलसीदास, सूरदास और मीराबाई इसलिए महान और हमेशा याद रखे जाने वाले कवि हैं, क्योंकि उनके लिखे हुए में 'लीला भाव' और 'आनंद भाव' है। उन्होंने 'स्वान्तः सुखाय' यानि अपनी आत्मा की खुशी के लिए) लिखा न कि सिर्फ तालियां बजवाने या अपना गुस्सा निकालने के लिए।
कम ही लोग जानते हैं कि कुलिश जी ने सिर्फ 19 साल की उम्र में कविता लिखना शुरू किया था और करीब 22-23 साल तक आते-आते कविता लिखना छोड़ भी दिया। यह उनकी कोई हार नहीं थी, बल्कि उनकी सच्ची सोच का सुबूत था। जब उन्हें कविता का असली मतलब समझ में आया, तो उन्हें लगा कि कविता लिखकर वे नाम, पैसा और इज्जत तो कमा रहे हैं, लेकिन क्या वे समाज को तुलसी या सूरदास की तरह अपना सब कुछ देकर कुछ ऐसा दे पा रहे हैं, जो हमेशा रहे? उन्हें सिर्फ मनोरंजन, मजे या पैसों के लिए कविता लिखना मंजूर नहीं था। जब उन्हें इस बड़ी सच्चाई का एहसास हुआ, तो उन्होंने कविता लिखना छोड़ दिया और अपनी ताकत को दूसरे सामाजिक व राष्ट्रीय सरोकारों में लगा दिया।
कुलिश जी अपने स्वभाव का जो सबसे खास पहलू बताते हैं, वह है एकांत से प्यार। वे कहते हैं, "एकांत और लीला भाव का सम्मिलित स्वरूप है मेरा व्यक्तित्व।" हमेशा भीड़भाड़, बैठकों और महफिलों में रहने के बावजूद, उनकी असली दौलत उनका एकांत ही था। उन्होंने सिर्फ पढ़ने और उस पर विचार करने (मनन करने) के बीच एक बड़ा फर्क बताया। उनका मानना था कि सिर्फ किताबें पढ़ लेना ज्ञान नहीं है। ज्ञान और असली समझ (बोध) में फर्क होता है; भगवान बुद्ध को सच का 'बोध' हुआ था, जिसके बाद वे बुद्ध कहलाए।
कुलिश जी का मानना था कि जो कुछ भी पढ़ा गया है, उसका असली मतलब गहराई से मनन करने पर ही समझ में आता है। वे घंटों अकेले लेटे रहते थे, जिसे लोग उनका आराम करना समझते थे, लेकिन असल में वह उनका मानसिक 'तप' होता था। दिमाग के अंदर चलने वाले उनके ये विचार ही उनके लिए तपस्या थे। इसी एकांत ने उन्हें वह साफ नजर दी, जिससे वे पत्रकारिता, समाज और जीवन की गहरी बातों को आसानी से समझ पाए।
कुल मिलाकर, कुलिश जी के जीवन की सीख हमें बताती है कि भीड़ में अपनी पहचान कैसे बचाए रखें और कैसे अपने दिल की आवाज को बाहर के शोर में न दबने दें। वे सिर्फ एक अखबार शुरू करने वाले व्यक्ति नहीं थे, बल्कि विचारों को गढ़ने वाले ऐसे इंसान थे जिन्होंने जीवन के हर हिस्से को 'आनंद' और 'भलाई' के तराजू पर तौला। खबरों की इस तेज दुनिया में उनका 'आनंद' और सबके 'हित' का विचार हमें हमारे असली काम की याद दिलाता है। उनके जीवन और विचारों की इसी गहराई को समेटते हुए, उन्हीं का यह वाक्य हमारे लिए हमेशा एक सही रास्ता दिखाने वाला है:
"मंजिल तय करना सबसे मुश्किल कार्य है… जो मंजिल मिल गई वह बात इतिहास की हो गई…… वर्तमान यात्रा भावी मंजिल की ओर होनी चाहिए।"
Updated on:
01 Mar 2026 07:46 pm
Published on:
01 Mar 2026 07:15 pm
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