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Chunav: उत्तर प्रदेश की वो सीट जहां स्वभाव में है ‘बगावत’, शाह ने किया डैमेज कंट्रोल लेकिन क्या करेंगे अखिलेश

Baliya Lok Sabha Chunav: गठबंधन ने ब्राह्मण प्रत्याशी से भाजपा को तो बसपा ने यादव प्रत्याशी से सपा को दी टेंशन, बलिया संसदीय क्षेत्र, मोदी मैजिक और पूर्व पीएम चंद्रशेखर की विरासत के सहारे ताल ठोंक रहे बेटे नीरज शेखर, अमित शाह ने सपा के बागी और भूमिहारों के बड़े नेता पूर्व मंत्री नारद राय को भाजपा में शामिल कराकर किया डैमेज कंट्रोल, पढ़ें बलिया से नवनीत मिश्र स्पेशल रिपोर्ट..

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Baliya Uttar Pradesh Lok Sabha Seat: बलिया के स्वभाव में बगावत है। यहां के रहन-सहन से लेकर राजनीति में बगावत घुसी हुई है। देश की आजादी की लड़ाई के दौरान भी यहां के लोगों के विद्रोही तेवर के कारण इसे बागी बलिया के नाम से भी जाना जाता है। अंग्रेजों के खिलाफ बंगाल की बैरकपुर छावनी से विद्रोह का प्रथम बिगूल फूंकने वाले और 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की पहली गोली चलाने वाले मंगल पांडेय भी इसी जिले के रहने वाले थे। आपातकाल के बाद देश में हुई संपूर्ण क्राति के जनक और महान स्वतंत्रता सेनानी जयप्रकाश नारायण का सिताबदियारा गांव भी इसी जिले और बिहार की सीमा पर पड़ता है तो पूर्व प्रधानमंत्री स्व. चंद्रशेखर और 'छोटे लोहिया' के नाम से चर्चित रहे जनेश्वर मिश्र भी यहीं के रहने वाले थे। बलिया जिला मुख्यालय से लेकर ग्रामीण इलाकों में घूमने पर पता चलता है कि पिछली बार की तरह इस बार भी यहां भाजपा और सपा के बीच ही मुख्य मुकाबला है।

बलिया सीट पर भाजपा ने वर्तमान सांसद वीरेंद्र सिंह मस्त का टिकट काटकर पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के बेटे नीरज शेखर को उतारा है तो सपा ने पिछली बार 15 हजार वोटों से हार जाने वाले सनातन पांडेय पर फिर से भरोसा जताया है, जबकि बसपा ने लल्लन सिंह यादव को उतारकर मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की कोशिश की है। मजे की बात है कि इस सीट पर जहां सपा ने ब्राह्मण प्रत्याशी उतारकर भाजपा के कोर वोटों में सेंधमारी की कोशिश की है तो बसपा ने यादव प्रत्याशी उतारकर सपा के कोर वोटों में बंटवारे की कोशिश की है।

बलिया बस स्टॉप के पास मिले राजेंद्र प्रसाद कहते हैं कि तीन तरफ से गंगा और सरयू नदी से घिरे बलिया में लगभग हर वर्ष बाढ़ आती है। कटान से जिला जूझता है। हर साल मोटा बजट आता है, अफसर बजट का अधिकतर हिस्सा डकार जाते हैं। डबल इंजन सरकार भी कोई हल नहीं ढूंढ पाई है।

पेशे से अधिवक्ता विजेंद्र कहते हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर का जिला होने के बावजूद बलिया आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए झूझ रहा है। यहां का जिला अस्पताल भी गंभीर मरीजों के लिए रेफरल सेंटर ही साबित हो रहा है। सिर्फ जुकाम, बुखार का ही इलाज होता है। संदीप गुप्ता कहते हैं कि मेडिकल कॉलेज का मुद्दा हवा-हवाई साबित हुआ है।

फल विक्रेता सरोजा देवी कहतीं हैं कि कहीं भी जाने पर बहू-बेटियों को सुरक्षा का अहसास होता है। चोरी-छिनैती, लूट की घटनाएं कम हुईं हैं। मोदी-योगी की सरकार अच्छा कार्य कर रही है। अशोक सरोज कहते हैं कि मोदी का चेहरा और चंद्रशेखर का बेटा होने का फायदा नीरज शेखर को चुनाव में मिलेगा और उनकी राह आसान है।

बलिया में अब तक हुए 18 लोकसभा चुनाव में 14 बार राजपूत ही जीते हैं। रिकॉर्ड 8 बार पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर सांसद रहे। 1977 से 2007 के बीच में सिर्फ एक बार 1984 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सहानुभूति की लहर में ही कांग्रेस प्रत्याशी के हाथों हार का सामना करना पड़ा था। 2007 में चंद्रशेखर के निधन के बाद 2008 में हुए उपचुनाव और फिर 2009 के लोकसभा चुनाव में उनके बेटे नीरज शेखर समाजवादी पार्टी से सांसद हुए। मोदी लहर में 2009 में भाजपा से हारने पर नीरज शेखर को सपा ने राज्यसभा भेजा था। बाद में नीरज शेखर ने दलबदल किया तो फिर भाजपा ने भी उन्हें राज्यसभा भेजा।

बलिया का जातीय समीकरण

बलिया में सर्वाधिक करीब 3 लाख ब्राह्मण तो ढाई लाख राजपूत हैं। 2.75 लाख दलित, ढाई लाख यादव, एक लाख मुस्लिम, भूमिहार सवा लाख, तो राजभर करीब डेढ़ लाख हैं। दो लाख से ज्यादा अति पिछड़ा वोटर हैं। बलिया संसदीय क्षेत्र में कुल 5 विधानसभा सीटें हैं जिनमें गाजीपुर की मोहम्मदाबाद और जहूराबाद विधानसभा सीट भी शामिल है। इस समय बलिया नगर विधानसभा सीट भाजपा तो जहूराबाद सीट एनडीए सहयोगी ओम प्रकाश राजभर के पास है। 2022 का विधानसभा चुनाव में ओम प्रकाश राजभर सपा के साथ थे।

शाह ने किया डैमेज कंट्रोल

भाजपा को इस सीट पर भूमिहारों की नाराजगी का सामना करना पड़ रहा था, लेकिन गृहमंत्री अमित शाह की सपा के बागी नारद राय से वाराणसी में हुई एक मीटिंग ने पार्टी की मुश्किलें दूर कर दी हैं। अब नारद राय भूमिहार मतदाताओं के बीच भाजपा के लिए वोट मांगने निकल पड़े हैं। दरअसल, बलिया लोकसभा सीट से भूमिहार समुदाय के ही भाजपा के विधायक उपेंद्र तिवारी और पूर्व विधायक आनंद स्वरूप शुक्ला टिकट मांग रहे थे, वहीं वर्तमान सांसद वीरेंद्र सिंह मस्त भी दावेदारी से पीछे हटने को तैयार नहीं थे। जिस पर पार्टी ने बीच का रास्ता निकालते हुए राज्यसभा सांसद नीरज शेखर को टिकट देने का निर्णय किया। जिसके बाद भूमिहारों के एक वर्ग में नाराजगी की खबरें थीं।

दो चुनावों का हाल

भाजपा इस सीट पर हैट्रिक लगाने की तैयारी में है। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के भरत सिंह को 359,760 वोट मिले थे, जबकि सपा के नीरज शेखर को 2,20,324 वोट मिले थे। भाजपा ने सपा को 1.39 लाख से अधिक वोटों से हराया था। वहीं 2019 के लोकसभा चुनाव की बात करें तो भाजपा के वीरेंद्र सिंह मस्त ने 469,114 वोट पाकर सपा-बसपा गठबंधन प्रत्याशीसनातन पांडेय को 15 हजार से अधिक वोटों से हराया था। सपा प्रत्याशी सनातन पांडेय को 4,53,595 वोट मिले थे।