
Muhammad Ali in India
यूं तो तो गणतंत्र दिवस समारोह के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से लेकर रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन मुख्य अतिथि रहे हैं, पर दक्षिण अफ्रीका के मुक्ति योद्धा नेल्सन मंडेला और मुक्केबाज मुहम्मद अली का कर्तव्य पथ पर सबसे गर्मजोशी से उपस्थित अपार जनसमूह ने स्वागत किया था। मंडेला 1995 में गणतंत्र दिवस परेड के मुख्य अतिथि थे। मंडेला जब तक परेड का आनंद ले रहे थे, तब वहाँ मौजूद दर्शक मंडेला-मंडेला के नारे लगा रहे थे। कहने वाले कहते हैं कि गणतंत्र दिवस पर राजपथ पर किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष का मंडेला से ज़्यादा उत्साह से स्वागत नहीं हुआ है।
मंडेला की ही तरह कर्तव्य पथ पर उपस्थित अपार जनसमूह ने मुक्केबाज मुहम्मद अली का भी करतल ध्वनि से अभिनंदन किया था। वह 1976 के गणतंत्र दिवस समारोह में खास अतिथि थे। उस समय वह अपने करियर के पीक पर थे। कर्तव्यपथ (तब राजपथ) पर आने की सूचना लाउड स्पीकर से होते ही वहाँ पर मौजूद हजारों लोगों ने हर्षध्वनि से उनका अभिनंदन किया। मशहूर कमेंटेटर जसदेव सिंह उस साल परेड का आँखों देखा हाल सुना रहे थे। उन्होंने बताया कि अली अपने चाहने वालों के अभिवादन का उत्तर अपने मुक्के को हवा में घुमाकर दे रहे थे। उनके इस तरह के करतब दिखाते ही दर्शक झूमने लगते थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी अली को देख-देखकर मुस्कुरा रही थीं।
संसद पर 13 दिसंबर, 2001 को हुए हमले के बाद साल 2002 की गणतंत्र दिवस परेड के रूट को सरकार ने बदल दिया था। इस तरह से पहली बार परेड का रूट बदला गया था। परेड के रूट को छोटा कर दिया गया था। तब से परेड इंडिया गेट से आईटीओ, दरियागंज होते हुए लाल किले पर समाप्त होने लगी। इस तरह परेड ने कनॉट प्लेस जाना बंद कर दिया। इस कारण दिल्ली के दिल से कनॉट प्लेस से गणतंत्र दिवस परेड को देखने से लोग वंचित हो गए। इससे पहले गणतंत्र दिवस परेड कर्तव्यपथ से इंडिया गेट होते हुए कस्तूरबा गांधी मार्ग का रुख कर लेती थी। कस्तूरबा गांधी मार्ग से परेड कनॉट प्लेस के आउटर सर्किल का पूरा चक्कर लगाने के बाद मिन्टो रोड, थॉमसन रोड,अजेमरी गेट होते हुए लाल किले पर खत्म होती थी। इस रूट पर हजारों लोग भोर से ही अपनी जगह पर बैठ जाते। सारे रूट पर देश भक्ति के गीत सुनाई देते। कई जगहों पर परेड का आँखों देखा हाल भी सुनाया जा रहा होता था। जब परेड कनॉट प्लेस में होती तो एक अलग तरह का उत्सव का माहौल बन जाता। कदम से कदम मिलाकर चल रहे सेना और अर्ध सैनिक बलों के दस्तों का दर्शक तालियाँ बजाकर स्वागत करते। कनॉट प्लेस आते-आते परेड में भाग लेने वाले जवान कुछ रीलेक्स भी होने लगते।वो भी दर्शकों का मुस्कुरा कर अभिवादन करते। परेड को सिर्फ सड़कों पर बैठकर ही नहीं देखा जा रहा होता था। कनॉट प्लेस की इमारतों की छतों पर भी लोग होते।
राजधानी दिल्ली में हर साल जनवरी का महीने आते ही गणतंत्र दिवस की तैयारियां अपने चरम पर पहुंच जाती हैं। यहाँ गणतंत्र दिवस की तैयारियां बाकी जगहों से अधिक व्यापक पैमाने पर होती हैं क्योंकि राजधानी दिल्ली में ही गणतंत्र दिवस परेड निकलती है। परेड का हिस्सा वो बालवीर भी होते हैं, जिन्हें देश उनके साहस, सूझबूझ और शौर्य के लिए सम्मानित कर रहा होता है। वो जब राष्ट्रपति को सलामी देते हुए आगे बढ़ते हैं, तो कर्तव्य पथ में उपस्थित जनसमूह उनका हर्षध्वनि से स्वागत करता है। 1959 से बालवीर पुरस्कार विजेता गणतंत्र दिवस परेड का हिस्सा है। यह कुछ साल से खुली जीप में निकलने लगे हैं। हालांकि लंबे समय तक यह हाथियों पर सवार होते थे। बालवीर गणतंत्र दिवस परेड से दस दिन पहले राजधानी में आकर परेड की रिहर्सल में शामिल होते हैं। इसके अलावा, ये दोपहर और शाम को कभी राष्ट्रपति कभी, प्रधानमंत्री, रक्षामंत्री, कभी दिल्ली के मुख्यमंत्री और उपराज्यपाल वायुसेना नौसेना और थलसेनाध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण व्यक्तियों से मिलते हैं। कभी लालकिला, पुराना किला, कुतुब मीनार, हुमायूं का मकबरा जैसी ऐतिहासिक इमारतें और कभी फन एंड फूड विलेज जैसे मनोरंजक स्थल घूमते हैं।
गणतंत्र दिवस से कुछ दिन पहले तक तो यह बालवीर खबरों में रहते हैं। ये अपने इंटरव्यू देते हैं और फिर ओझल हो जाते हैं। यह स्थिति कोई आदर्श नहीं मानी जा सकती।
गणतंत्र दिवस परेड का श्रीगणेश कर्तव्य पथ से ही क्यो होता है? दरअसल कर्तव्यपथ भारत के औपनिवेशिक काल से लेकर स्वतंत्र और गणतंत्र होने के सफर का महत्वपूर्ण प्रतीक है। इंडिया गेट भारत के उन शहीदों की याद दिलाता है, जिन्होंने देश के लिए अपनी जानों के नजराने पेश किए। चूंकि राजपथ से गणतंत्र दिवस परेड का श्रीगणेश होता है, इसलिए इसे आप देश की सर्वाधिक महत्वपूर्ण सड़क मान सकते हैं। राजपथ शुरू होता है रायसीना हिल पर स्थित राष्ट्रपति भवन से। राजपथ से इंडिया गेट के बीच में विजय चौक आता है। ये परेड का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र है। इसके बीच में परेड राष्ट्रपति जी को सलामी देते हुए राजधानी की सड़कों से होते हुए लाल किले पर समाप्त होती है।
आमतौर पर नई दिल्ली की खासमखास इमारतों के डिजाइनरों की बात हो जाती है, पर किसी को याद नहीं रहा उस अनाम शख्स का नाम जिसकी देखरेख में कर्तव्यपथ का निर्माण हुआ था। उस शख्सियत का नाम था सरदार नारायण सिंह। जब नई दिल्ली की प्रमुख इमारतों के डिज़ाइन बनने लगे, तो सवाल आया कि यहाँ बनने वाली सड़कों के निर्माण के लिए ठेकेदार कहां से आएंगे? तब सरदार नारायण सिंह ने सड़कों को बनाने का दावा पेश किया। उस समय के लिहाज से उन्होंने कर्तव्यपथ और नई दिल्ली को बेजोड़ सड़कें दीं। तब सड़कों के नीचे भारी पत्थर डाल दिए जाते थे। फिर रोढ़ी और चारकोल से सड़कें बनती थीं। अब सारे देश के शहरी इलाकों में बिटुमिनस तकनीक से सड़कें बन रही हैं। गणतंत्र दिवस परेड में घोड़े, हाथी, मोटसाइकिल,सेना के ट्रक से लेकर भारी-भरकम टैंक तक निकलते रहे हैं। पर मजाल है कि राजपथ को कोई नुकसान हो। यह सब बिटुमिनस तकनीक का कमाल है।
Updated on:
25 Jan 2026 01:56 pm
Published on:
25 Jan 2026 01:49 pm
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