
कश्मीर घाटी में शांति और जम्मू में आतंक…ये नए दौर का बदला हुआ जम्मू-कश्मीर है। दरअसल इसके पीछे एक नहीं कई कारण साफ नजर आ रहे हैं। पहला कि सबसे बड़ा कारण कश्मीर की तुलना में जम्मू में भारतीय सुरक्षाबलों की संख्या कम है। 2020 में हुए घटनाक्रम के बाद सुरक्षाबलों की स्थानांतरण हुआ था।
दूसरी बात जम्मू-कश्मीर में लोकसभा चुनाव शांति से हो चुका है। सिंतबर में विधानसभा चुनाव कराने की तैयारी है। दुनिया की निगाह यहां के चुनाव पर होगी। ऐसे में आतंकी और इनके आका यह पैगाम देना चाहते हैं कि कश्मीर ही नहीं जम्मू के लोग भारत के खिलाफ हैं। यही वजह है कि आतंकी नए नाम से नए क्षेत्र में नए तरीके से हमला कर रहे हैं।
आतंकी संगठनों के नाम ऐसे रखा गया है कि धर्म निरपेक्ष और स्थानीय लगे। इसी तरह वह दिखाना चाहते हैं कि पूरे राज्य की हालत ठीक नहीं है। यह अलग बात है कि जम्मू -कश्मीर की आवाम की चादर ओढ़े पाकिस्तानी यहां आतंक फैला रहे हैं। श्री अमरनाथ यात्रा शांति से हो रही है और आतंकी कुछ भी नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे में हरकत का दबाव है। जम्मू आतंकियों के लिए आसान निशाना है।
कर्नल मनीष ओझा (सेवानिवृत्त) कहते हैं कि जम्मू क्षेत्र में आतंकवाद की घटनाओं में बढ़ोतरी इस और इशारा करती है कि पाकिस्तानी आतंकवादी अब कश्मीर घाटी मे कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के चलते अपने कदम नहीं जमा पा रहे हैं, तो इसलिए वह अब जम्मू एवं डोडा क्षेत्र की भौगोलिक दुर्गमता का लाभ उठाकर इस क्षेत्र में आतंकवाद फैलाने का प्रयास कर रहे हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व डीजीपी एसपी वैद्य जम्मू में लगातार हो रहा हमला आतंकियों की एक खास रणनीति का हिस्सा है। पैटर्न देखिए इस बार आतंकी क्षेत्र हिंदू आबादी वाले बने हैं। आतंकी सुरक्षाबलों के शक का दायरा हिंदुओं पर लाना चाहते हैं। इतना ही नहीं आतकीं नए संगठन के माध्यम से यह दिखाना चाहते हैं कि आतंक की नई लहर नए इलाके में नए तरह से उठी है। इसका मुस्लिम नहीं लोकल कनेक्शन है।
पूर्व डीजीपी वैद्य कहते हैं कि जम्मू में आतंकी हमले इसलिए बढ़ गए हैं क्योंकि यह क्षेत्र 15 साल से शांत था। 2019 में 370 हटने और फिर 2020 में गलवान तनाव के बाद जम्मू से आरआर और एसओजी की फोर्सेज कश्मीर और लददाख स्थानांतरित कर दी गईं। लददाख में चीन के सामने भारत आंख में आंख मिलाए हुए हैं और कश्मीर में पाकिस्तान की दाल गल नहीं रही है। ऐसे में आतंकी चाहते हैं कि फोर्सेज का बिखराव हो तो उन्हें अपनी करतूतों को अंजाम देने की जगह मिले। इसलिए यह हमले जम्मू में हो रहे हैं।
कठुआ, डोडा, पुंछ और राजौरी दक्षिण पीर पंजाल 90 के दशक से ही आतंकियों के घुसपैठ और सेफ हाउस का क्षेत्र है। आतंकी यहां आते तो थे लेकिन वह बिना किसी हरकत के यहां से कश्मीर जाते थे। अब कश्मीर में दबाव बढ़ा है तो आतंकियों ने यहां भी हमले कर रहे हैं। यह एक पैटर्न है। आतंकी वहां, दबाव कम जहां।
भारत में शांति रहे यह पाकिस्तान कभी नहीं चाहता है। दूसरा परोक्ष रूप से अमरीका का भी साथ मिलता रहता है। इसके अलावा जनरल आसिफ मुनीर तुलनात्मक रूप से आक्रामक है। वहीं अमरीका भारत को रूस के साथ पसंद नहीं करता है तो वह समय समय पर प्रयोग करता रहता है।
आतंकी मरने के लिए ही आते हैं और वह ऐसी घातक ऊंचाई पर बैठते हैं जहां से उन्हें सैन्य बल की हर हरकत दिखाई दे। यही वजह है कि उनकी फायरिंग रेंज में आते ही नुकसान हो रहा है। ऐसी ऊंचाई वाली जगह होती हैं...जहां न तो सीधे चढ़ा जा सकता है और न ही पीछे से हमला किया जा सकता है। लड़ाई हमेशा ही आमने सामने होती है। यही वजह है कि एक आतंकी कई बार बड़ी संख्या में नुकसान पहुंचा देता है।
कश्मीर से आतंक की खुराक बंद हो गई है। अब पंजाब के रास्ते आतंकियों को पोषण मिल रहा है। फिर चाहे हथियारों की बात हो या धन की। बीएसएफ हर दिन कुछ न कुछ बरामद करती है। इसी गठजोड़ को तोड़ने के लिए बीते सप्ताह ही जम्मू कश्मीर के डीजीपी ने पंजाब के डीजीपी के साथ बैठक की है।
जम्मू में भारतीय वायुसेना के ट्रक पर हुए हमले में एक पाकिस्तानी आतंकी मारा गया था। वह आतंकी पाकिस्तानी सेना का भूतपूर्व सैनिक निकला। जिस तरह से घातक हमले योजनाबद्ध तरीके से हो रहे हैं। ऐसे में पाकिस्तानी पूर्व सैनिक आतंकी बनकर हमलावर हों कोई बड़ी बात नहीं है। कई पाकिस्तानी सैनिक आतंकी रह चुके हैं और गाहे बगाहे उनकी हरकत सामने आते रहती है।
Updated on:
17 Jul 2024 10:01 am
Published on:
17 Jul 2024 10:00 am
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