
बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस के चीन दौरे के दौरान दिए गए एक बयान ने भारत में राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है। यूनुस ने पूर्वोत्तर भारत के सात राज्यों, जिन्हें 'सेवन सिस्टर्स' के नाम से जाना जाता है, को लैंडलॉक्ड बताते हुए एक ऐसा संकेत दिया, जिसे भारत ने अपनी संप्रभुता और सुरक्षा के लिए खतरे की घंटी माना। इस बयान की गूंज न केवल राजनयिक हलकों में सुनाई दी, बल्कि भाजपा और कांग्रेस जैसे प्रमुख राजनीतिक दलों ने भी इसे गंभीरता से लिया। दोनों दलों ने न सिर्फ यूनुस की टिप्पणी की कड़ी निंदा की, बल्कि 'चिकन नेक' कॉरिडोर के रणनीतिक महत्व को बचाने और बांग्लादेश को सबक सिखाने के लिए कड़े कदमों के सुझाव भी दिए। यूनुस का यह बयान, जिसमें उन्होंने चीन को बांग्लादेश में निवेश और व्यापार के लिए आमंत्रित किया, भारत के लिए एक चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है।
त्रिपुरा की प्रभावशाली क्षेत्रीय पार्टी टिपरा मोथा के नेता प्रद्योत देबबर्मन ने इस मुद्दे पर सबसे साहसिक रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि चिकन नेक की भौगोलिक कमजोरी को दूर करने के लिए इंजीनियरिंग परियोजनाओं में अरबों रुपये खर्च करने की बजाय बांग्लादेश को खंडित कर देना चाहिए। उनका तर्क है कि इससे पूर्वोत्तर भारत को समुद्री पहुंच मिलेगी, जो क्षेत्र की आर्थिक और रणनीतिक सुरक्षा के लिए जरूरी है। प्रद्योत ने 1947 में चटगांव बंदरगाह पर भारत के दावे को छोड़ने को ऐतिहासिक भूल करार दिया और इसे सुधारने की वकालत की। उनके इस बयान ने क्षेत्रीय नेताओं के बीच एक नई बहस को जन्म दिया है।
कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने यूनुस के बयान को भारत के लिए खतरे की घंटी बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि बांग्लादेश जानबूझकर चीन को इस क्षेत्र में प्रभाव बढ़ाने के लिए आमंत्रित कर रहा है, ताकि भारत को रणनीतिक रूप से घेरा जा सके। खेड़ा ने कहा कि यह कदम पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा के लिए बेहद खतरनाक है। उन्होंने केंद्र सरकार से इस मामले में तत्काल कूटनीतिक और रणनीतिक कदम उठाने की मांग की, साथ ही बांग्लादेश के इस रवैये को क्षेत्रीय स्थिरता के लिए चुनौती करार दिया।
यूनुस के बयान ने भारत में एकजुटता के साथ-साथ आक्रोश को भी जन्म दिया है। भाजपा और कांग्रेस, जो आमतौर पर एक-दूसरे के खिलाफ खड़े रहते हैं, इस मुद्दे पर एक स्वर में बोलते नजर आए। चिकन नेक कॉरिडोर, जो पूर्वोत्तर भारत को शेष देश से जोड़ने वाला एकमात्र संकरा रास्ता है, लंबे समय से रणनीतिक चिंता का विषय रहा है। अब यह सवाल उठता है कि क्या बांग्लादेश को तोड़कर या वैकल्पिक मार्ग बनाकर इस समस्या का समाधान संभव है? यह विवाद न केवल भारत-बांग्लादेश संबंधों को प्रभावित करेगा, बल्कि क्षेत्र में चीन की बढ़ती मौजूदगी के संदर्भ में भी नई चुनौतियां खड़ी कर सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, बांग्लादेश के कुछ हिस्सों को भारत में शामिल करना चिकन नेक की समस्या का स्थायी समाधान हो सकता है। रंगपुर डिवीजन, जो भारत के उत्तर बंगाल और असम के पास स्थित है, पूरी तरह से भारतीय क्षेत्र से घिरा हुआ है। यदि रंगपुर को भारत में शामिल किया जाता है, तो चिकन नेक कॉरिडोर की संकीर्णता खत्म हो जाएगी और यह कॉरिडोर कम से कम 150 किलोमीटर चौड़ा हो जाएगा। इससे पूर्वोत्तर भारत की मुख्यभूमि से कनेक्टिविटी मजबूत होगी। इसी तरह, चटगांव डिवीजन के कुछ हिस्से, जो त्रिपुरा और मिजोरम की सीमा से सटे हैं, भारत के लिए रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हो सकते हैं। चटगांव बंदरगाह तक पहुंच से न केवल समुद्री व्यापार बढ़ेगा, बल्कि क्षेत्र की सुरक्षा भी सुनिश्चित होगी।
असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने भी इस मुद्दे पर अपनी चिंता जाहिर की। उन्होंने यूनुस के बयान को भड़काऊ करार देते हुए कहा कि इसके पीछे एक गहरी रणनीति और दीर्घकालिक एजेंडा छिपा है। सरमा ने सिलिगुड़ी कॉरिडोर, जिसे 'चिकन नेक' के नाम से जाना जाता है, की भेद्यता पर प्रकाश डाला और इसे मजबूत करने के लिए वैकल्पिक उपायों की वकालत की। उन्होंने सुझाव दिया कि चिकन नेक के नीचे और आसपास मजबूत सड़क और रेल नेटवर्क विकसित किया जाए, ताकि पूर्वोत्तर भारत का संपर्क मुख्यभूमि से कभी न टूटे। सरमा ने इस खतरे को हल्के में न लेने की चेतावनी दी और केंद्र से ठोस कदम उठाने का आग्रह किया।
Published on:
02 Apr 2025 10:24 am

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