नलवा गांव में घरों के बीच का रास्ता पूरी तरह कीचड़ से लबरेज है। गांव के पशुओं को जब खेतों पर ले जाया जाता है तो तस्वीर देखते बनती है। बकरियां भी कीचड़ को टालकर घरों के चबुतरों पर होकर निकलती है। लोगों को तो इस कीचड़ में पैदल चलने के लिए सर्कस के कलाकार की तरह संतुलन बनाना पड़ता है। ढाणी और नलवा को जोडऩे वाले मार्ग की दशा कभी नहीं सुधर सकी। बीच में एक नाले पर पुलिया है, जो बरसों से खराब है। पिछले वर्ष मनरेगा में इसे सुधारा गया था लेकिन कच्चा काम होने के कारण स्थिति फिर से बिगड़ गई। ग्रामीण बताते हैं कि ढाणी से किसी प्रसुता को अस्पताल ले जाने के लिए पलंग का सहारा लेना पड़ता है। इसी मार्ग पर आगे चलकर श्मसान घाट है किसी के निधन हो जाने पर लोग अर्थी को श्मसान घाट तक ले जाने में परेशान हो जाते हैं। बच्चे घुटनो तक कीचड़ में होकर जैसे तैसे जाते हैं।