
नई दिल्ली। देश में अब तक राजनीति आरोप-प्रत्यारोंप की दौर से गुजर रही थी। लेकिन, बदलते समय के साथ इसकी परिभाषा भी बदलने लगी है। भारतीय राजनीति अब आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर अनशन और उपवास का चोला ओढ़ने लगी है। तभी तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने सांसदों और मंत्रियों के साथ विपक्ष के अलोकतांत्रिक रवैये के खिलाफ गुरुवार को उपवास कर रहे हैं।
हालांकि, भारतीय राजनीति से अनशन का पुराना सरोकार रहा है। चाहे वह महात्मा गांधी हों, जतिन दास हों, भगत सिंह हों या फिर पोट्टी श्रीरामलू हों, जिन्होंने अपनी बात मनवाने और विरोध जताने के लिए अनशन का सहारा लिया था। लेकिन, बदलते समय के साथ आज के राजनेताओं ने विरोध जताने के लिए अनशन की जगह उपवास का सहारा लेना शुरू कर दिया।
चाहे मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान हों, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हों, बिहार के ही पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी हों, कांग्रेस पार्टी हो या फिर वर्तमान में भाजपा की सरकार, इन सबने हाल के दिनों में विरोध जताने और अपनी बात मनवाने के लिए उपवास का सहारा लिया है।
कहीं अनशन का नया रूप तो नहीं उपवास?
भारतीय राजनीति से लेकर देश की राजनीति के बदलाव में अनशन और उपवास ने काफी अहम भूमिका निभाई है। राजनीति में अनशन को सरकार पर दबाव बनाने का सबसे मजबूत प्रयोग महात्मा गांधी ने किया था। फिनिक्स आश्रम से शुरू हुई अनशन की यात्रा का अगला पड़ाव अहमदाबाद मिल मजदूरों के समर्थन में था।
तीन दिन के इस उपवास से भारतीय राजनीति में अनशन के एक नए दौर की शुरुआत हुई थी। लेकिन, अनशन में जिस तरह से धन, बल और इंसान की क्षति होती है। ठीक उससे अलग उपवास सिर्फ व्यक्ति विशेष या पार्टी तक ही सीमित रहता है। उपवास में न तो काम प्रभावित होता है, न धन का क्षय होता है और न ही समय की बर्बादी होती है। बस शांत तरीके से व्यक्ति या पार्टी अपना विरोध प्रदर्शन करते हैं। हाल के दिनों में कई राजनेताओं ने अपनी बात मनवाने और विरोध जताने के लिए अनशन की जगह उपवास का सहारा लिया है।
जानिए अनशन और उपवास का फायदा-नुकसान
समाजसेवी अन्ना हजारे ने जनलोकपाल बिल को लेकर दिल्ली के रामलीला मैदान में अनशन शुरू किया था। इस अनशन में देशभर से लोग पहुंचे थे। हाल यह था कि पूरी दुनिया और मीडिया की नजर इस अनशन पर टिक गई थी। हालांकि, अन्ना का यह अनशन सफल भी रहा। लेकिन, इसमें समय, धन और सरकारी तंत्र का काफी नुकसान हुआ। इस दौरान अन्ना की लहर में पूरे देश में लोगों ने रैलियां निकालीं और अनशन किए। इतना ही नहीं विपक्षी पार्टियों सहित विदेशों से भी अन्ना को समर्थन मिला था। इस अनशन की वजह से जगह, समय और अर्थ का काफी नुकसान हुआ था।
हालांकि, अब राजनेताओं ने अनशन की जगह उपवास को अपना हथियार बनाया है। हाल के दिनों में मंदसौर फायरिंग मामले में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने तीन का उपवास रखा था। वहीं, इससे पहले बिहार में भूमि अधिग्रहण कानून के खिलाफ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 24 घंटों का उपवास रखा। उनसे पहले बिहार के ही पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी ने अपने कैबिनेट के फैसले को बदले जाने के विरोध में ही उपवास किया।
इसके अलावा आम आदमी पार्टी से बर्खास्त हुए पूर्व मंत्री कपिल मिश्रा भी उपवास पर बैठे थे। कुछ दिन पहले कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने उपवास रखा तो अब प्रधानमंत्री स्वयं एकदिवसीय उपवास पर बैठे हैं। ये सब उपवास के जरिए कहीं न कहीं अपनी बात मनवाने का काम या विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। लेकिन, इस उपवास से न तो धन का नुकसान है, न समय का और न ही किसी व्यक्ति विशेष या समुदाय का। हालांकि, यह कहना गलत नहीं होगा कि उपवास आज राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को हासिल करने के लिए सबसे सटीक फॉर्मूला बनता जा रहा है।
Published on:
12 Apr 2018 02:26 pm
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