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संभाली नहीं तो समाप्त हो जाएगी अमूल्य विरासत

हाड़ौती के पठार पर बूंदी व भीलवाड़ा जिले के 13 गांवों में मौजूद हैं शैलचित्र

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हजारों वर्षों पहले मानव सभ्यता कैसे विकसित हुई, उस काल का मनुष्य कैसे प्रकृति से जुड़ा था और किस तरह जीविकोपार्जन करता था ? इसे जानने और समझने का एकमात्र जरिया उस युग के मानव के बनाए शैलचित्र और पुरा अवशेष हैं। प्रदेश के बूंदी व भीलवाड़ा जिले के तेरह गांवों में मौजूद शैल चित्र पुरा पाषाण काल की अमूल्य विरासत है। लेकिन प्राकृतिक एवं मानवीय कारणों से इनके नष्ट होने की शुरुआत हो चुकी है। इंटेक की ओर से करीब दो साल तक किए गए अध्ययन में यह िस्थति पाई गई है।

भारतीय सांस्कृतिक निधि (इंटेक) के उदयपुर चेप्टर की ओर से वर्ष 2022 से 2024 के बीच यह अध्ययन किया गया। जिसमें सामने आया कि यह शैलचित्र अत्यधिक बहुमूल्य होने के साथ ही मानव के आदिकाल के ऐसे प्रमाण हैं, जिनको नष्ट होने से बचाया जाना अत्यंत आवश्यक है। सुदूरवर्ती क्षेत्र, जो अब तक सुरक्षित माने जाते थे, अब मानवीय गतिविधियों के कारण असुरक्षित हो गए हैं। निरंतर बढ़ती जा रही असीमित और बेतरतीब प्रगति के कारण आदि मानव के निवास के स्थलों नदी, नाले और घाटियां नष्ट होने के कगार पर हैं।

समाप्त होने के प्राकृतिक एवं मानवीय कारण

अध्ययन कर्ताओं का कहना है कि पुरा महत्व के कुछ स्थानों पर जहां दीमग लगी पाई गई तो कहीं मधुमिक्खयों के छत्ते बन गए। प्राचीन शैलचित्रों पर लोगों ने अपने नाम लिख दिए। कहीं प्राकृतिक रूप से वर्षा जल एवं पानी के प्रवाह से यह आकृतियां नष्ट होने लगी है।

इन गांवों में मौजूद हैं शैलचित्र

भीलवाड़ा जिले में भोजियाबाडी़, बिजौलियां, गोपीचंद का छज्जा, लोड़दा तथा बूंदी जिले के पलकां, बांका, भीमलत, गरड़दा, धारावन, बेवडिया, सुई का नाका, गोलपुर, केसरिया में यह शैल चित्र मौजूद है। जिनका अध्ययन बूंदी के स्थानीय पुरा अन्वेषक ओम प्रकाश कुक्की के सहयोग से पुरातात्विक विशेषज्ञ प्रो. ललित पांडेय, विनोद अग्रवाल व डॉ. हेमंत सेन ने किया।

मानव इतिहास की कहानी बताते हैं चित्र

अध्ययन के दौरान तत्कालीन प्रारंभिक मानव की समयावधि लगभग 40000 से 3000 वर्ष के मध्य आंकी गई है। जो मुख्य रूप से सांड, हिरण, बालों वाले भारी भरकम भालू, तेंदुआ, कूबड़ वाले बैल, नीलगाय, जंगली गर्दभ, चीता, जंगली भैंसा, कछुआ तथा काले हिरण से परिचित थे। वे सामूहिक जीवन शैली में विश्वास करते थे। शैलचित्रों में स्त्री-पुरुष के चित्र, जो कहीं शिशु को गोद में उठाए हैं तो कहीं दो पशु एक रस्सी से बंधे हैं, उन्हें ले जाने की मुद्रा में हैं। कहीं शिकार के लिए हाथों में धनुष लिए हैं तो एक स्थान पर खेत की जुताई करते दिखाए गए हैंं। अन्य स्थान पर दो महिलाएं नृत्य मुद्रा में हैं। जो खुशी के पलों का प्रतिनिधित्व करते हैं। चित्रों में पोशाक का अंकन भी प्रभावी है। एक शैल चित्र में कमल का फूल उकेरा दिखाया गया है। वहीं एक अन्य चित्र में व्यक्ति को पक्षी पर बैठे हुए उड़ने की मुद्रा में दर्शाया गया है।

इनका कहना ...

मानव इतिहास के साक्ष्याें के प्रलेखन के उद्देश्य से यह अध्ययन किया गया है। जिसमें पाया कि आदि मानव के विकास समझने के लिए उपलब्ध यह साक्ष्य अब नष्ट होने लगे हैं। इन्हें बचाया जाना अत्यंत आवश्यक है। इंटेक की ओर से इनका डिजिटल प्रलेखन किया जा रहा है। वहीं सरकार को भी इनके संरक्षक के बारे में कदम उठाने चाहिए।

प्रो. ललित पांडेय, पुरातात्विक विशेषज्ञ एवं संयोजक इंटेक उदयपुर चेप्टर

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