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ब्रेन डेड की अनदेखी, 10 लाख में सिर्फ एक अंगदाता

केंद्र सरकार ने राज्यों को लिखा पत्र, निगरानी के निर्देश

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नई दिल्ली. कहते हैं कि अंगदान, महादान होता है लेकिन सरकार के लगातार प्रयासों के बाद भी देश में अंगदान करने वालों की संख्या में खास बढ़ोतरी नहीं हुई है। सरकार ने इसके लिए अस्पतालों में ब्रेड डेड के मामलों की अनदेखी को जिम्मेदार माना है। देश में अभी 10 लाख की आबादी पर एक ही अंगदाता मिल रहा है।केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (डीजीएचएस) ने देश में अंगदान की दशा को सुधारने के लिए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पत्र लिखकर प्रत्येक ब्रेन डेड मामले की निगरानी के आदेश दिए हैं। पत्र में कहा गया कि ब्रेन डेड के मामलों में पता करें कि क्या व्यक्ति ने मृत्यु पूर्व अंगदान का वादा किया था। मृतक के परिजनों से काउंसलर के साथ बातचीत करें और उन्हें अंगदान के लिए प्रेरित करें। ब्रेन डेड की दशा में मरीज के शरीर और आंखों की पुतलियों की क्रिया बंद हो जाती है। हालांकि हृदय और बाकी अंग जीवित होते हैं। 1994 में पारित मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम (टीएचओए) के तहत ब्रेन डेड के मरीजों के अंगों को परिवार की मंजूरी के बाद दान किया जा सकता है।

अब 17 बिंदुओं वाला फॉर्म भरना होगा

अंगदान के मामले में राष्ट्रीय अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (नोटो) ने 17 बिंदु का एक फार्म सरकार से साझा किया है, जिसे हर दिन अस्पताल प्रबंधन को भरना होगा और महीने के अंत में इसे साझा करना होगा। फार्म में आइसीयू रोगियों से लेकर मृत्यु, वेंटिलेटर और इस्तेमाल में आने वाले टिश्यू तक की जानकारी शामिल है। अस्पतालों को अब नियमित तौर पर दान में मिलने वाले अंगों में से इस्तेमाल होने वालों की सूचना भी साझा करनी होगी। सरकार जागरूकता के साथ-साथ अंगों को हवाई, रेल, मेट्रो रेल से निर्बाध रूप से लाने जाने का प्रयास कर रही है।

30 साल बाद भी सिर्फ एक हजार दाता

नोटो के मुताबिक भारत में 1994 से टीएचओए लागू है, लेकिन 1994 से 2024 के बीच 30 साल में पहली बार 2023 में 1,092 ब्रेन डेड से अंग प्राप्त हुए । 2013 में 340, 2014 में 408, 2015 में 666, 2016 में 930, 2017 में 773, 2018 में 875, 2019 में 715, 2020 में 351, 2021 में 552 और 2022 में 941 ब्रेन डेड मामलों की सूचना अस्पतालों से मिली।