
हिंदू धर्म के अनुसार जब किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, तो परिवार जन उसका विदि-विधान से पिंडदान करते हैं। माना जाता है कि पिंडदान का अधिकार उसके बेटे का होता है। लेकिन आजकल के बदलते दौर में लड़कियां भी पिंडदान कर अपना फर्ज निभा रही हैं। यदि हम आज के दौर को सदियों पुराने दौर से जोड़े तो भगवान श्री राम ने भी अपने पिता दशरथ का पिंडदान नहीं किया था।
वाल्मिकी रामायण के अनुसार दशरत का पिंडदान माता सीता ने किया था। माता सीता के पिंडदान के बाद ही राजा दशरथ की आत्मा को मोक्ष प्राप्त हुआ था। माता सीता ने गया में फल्गु नदी की बालू का पिंड देकर पिंडदान किया था। इसलिए गया में पिंडदान का विशेष महत्व माना जाता है। लेकिन आश्चर्य की बात यह है की जब माता सीता ने महानदी वरदान स्वरूप फल्गु नदी की बालू का पिंड देकर अमर, बहुव्याप्त और अपरम्पार बना दिया था। तो आज महानदी व्यर्थ, बेकार और सार शून्य क्यों हो गई। आइए जानते हैं इसके पीछे की रोचक कथा के बारे में...
पौराणिक कहानी के अनुसार इसलिए माता सीता ने किया पिंडदान
दरअसल, वनवास के दौरान भगवान राम, लक्ष्मण और सीता पितृ पक्ष में राजा दशरथ का श्राद्ध करने गया धाम पहुंचे। वहां श्राद्ध कर्म के लिए आवश्यक सामग्री जुटाने के लिए श्री राम और लक्ष्मण नगर चले गए थे। उसी दौरान सीता जी ने दशरथ का पिंडदान कर दिया था। वहीं स्थल पुराण की एक पौराणिक कहानी के मुताबिक राजा दशरथ की मौत के बाद भरत और शत्रुघ्न ने अंतिम संस्कार की हर विधि को पूरा किया था। लेकिन राजा दशरथ को सबसे ज्यादा प्यार अपने बड़े बेटे राम से था इसलिए अंतिम संस्कार के बाद उनकी चिता की बची हुई राख उड़ते-उड़ते गया में नदी के पास पहुंची।
उस वक्त राम और लक्ष्मण वहां मौजूद नहीं थे और सीता नदी के किनारे बैठी विचार कर रहीं थी। तभी सीता को राजा दशरथ की छवि दिखाई दी पर सीता को यह समझने में ज़रा सी भी देर नहीं लगी कि राजा दशरथ की आत्मा राख के ज़रिए उनसे कुछ कहना चाहती है। राजा ने सीता से अपने पास समय कम होने की बात कहते हुए अपने पिंडदान करने की विनती की। उधर दोपहर हो गई थी और पिंडदान का कुतप समय निकलता जा रहा था। इसलिए सीता जी नें फल्गु नदी के बालू से पिंड बनाए और पिंडदान कर दिया।
इसलिए मिला फल्गु नदी को श्राप
सीता ने राजा दशरथ की राख को मिलाकर अपने हाथों में उठाया और इस दौरान उन्होने वहां मौजूद फल्गु नदी, गाय, तुलसी, अक्षय वट और एक ब्राह्मण को इस पिंडदान का साक्षी बनाते हुए राजा दशरथ का पिंडदान कर दिया। पिंडदान करने के बाद जैसै ही श्रीराम और लक्ष्मण सीता के करीब आए, तब सीता ने उन्हें ये सारी बात बताई। लेकिन राम को सीता की बातों पर यकीन नहीं हुआ। जिसके बाद सीता ने पिंडदान में साक्षी बने पांचों जीवों को बुलाया।
लेकिन राम के गुस्से को देखकर फल्गु नदी, गाय, तुलसी और ब्राह्मण ने झूठ बोलते हुए पिंडदान की बात से इंकार कर दिया। लेकिन वहां मौजूद अक्षय वट ने माता सीता का साथ देते हुए सच बोलते बताया। इस वाक्या के बाद सीता जी ने गुस्से में आकर झूठ बोलने वाले चारों जीवों को श्राप दे दिया। और अक्षय वट को वरदान देते हुए कहा कि तुम हमेशा पूजनीय रहोगे और जो लोग भी पिंडदान करने के लिए गया आएंगे। उनकी पूजा अक्षय वट की पूजा करने के बाद ही सफल होगी।
Published on:
15 Sept 2019 11:39 am
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