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कुदरत की मेहरबानी पर माफिया की नजर: अधिक बारिश से नदी-नालों में आई भरपूर रेत बनी अवैध कारोबार का जरिया, शहर में बेखौफ सज रही अवैध मंडियां

अब इस प्राकृतिक संसाधन पर माफिया की नजर गड़ गई है। जिले भर में छोटे जल स्रोतों का सीना चीरकर अवैध उत्खनन का खेल बड़े पैमाने पर शुरू हो गया है, जिसे रोकने में प्रशासन पूरी तरह नाकाम नजर आ रहा है।

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गायत्री मंदिर मार्ग पर अवैध रेत से भरे ट्रैक्टर

प्रशासनिक सुस्ती का फायदा उठा रहे रेत माफिया

इस वर्ष जिले में हुई औसत से डेढ़ गुना बारिश जहां किसानों और जलस्तर के लिए वरदान साबित हुई है, वहीं रेत माफियाओं के लिए यह कुदरत की मेहरबानी बनकर आई है। भारी बारिश के चलते जिले की छोटी नदियों, नालों और यहाँ तक कि तालाबों में भी बहकर भारी मात्रा में रेत जमा हो गई है। अब इस प्राकृतिक संसाधन पर माफिया की नजर गड़ गई है। जिले भर में छोटे जल स्रोतों का सीना चीरकर अवैध उत्खनन का खेल बड़े पैमाने पर शुरू हो गया है, जिसे रोकने में प्रशासन पूरी तरह नाकाम नजर आ रहा है।

छोटे नदी-नालों को बना रहे निशाना

आमतौर पर रेत माफिया बड़ी नदियों पर सक्रिय रहते थे, लेकिन इस बार अधिक बारिश के कारण छोटे नदी-नाले और ग्रामीण तालाब भी रेत से लबालब हो गए हैं। माफियाओं ने अब इन छोटे स्रोतों को अपना नया ठिकाना बना लिया है। बिना किसी डर के, ग्रामीण इलाकों से ट्रैक्टर-ट्रॉली भरकर अवैध रेत शहर तक पहुंचाई जा रही है। अधिकारियों की सुस्ती का आलम यह है कि उन्हें इन छोटे जल निकायों से हो रहे उत्खनन की भनक तक नहीं है, या फिर जानबूझकर इस ओर से आंखें मूंद ली गई हैं।

शहर के बीचों-बीच सजी अवैध रेत मंडियां'

हैरानी की बात यह है कि अवैध उत्खनन से भरी ये ट्रैक्टर-ट्रॉलियां केवल सडक़ों पर दौड़ ही नहीं रही हैं, बल्कि शहर के प्रमुख रिहायशी और सार्वजनिक स्थलों पर इनकी बाकायदा मंडियां सज रही हैं।गायत्री मंदिर मार्ग- हाईवे से लेकर मंदिर तक दर्जनों ट्रैक्टर ग्राहकों का इंतजार करते देखे जा सकते हैं।सटई रोड और देरी रोड- यहां सडक़ों के किनारे और खाली मैदानों में अवैध रेत की दुकानें खुलेआम संचालित हो रही हैं।प्रमुख चौक-चौराहे- बस स्टैंड के पास नारायणपुरा रोड, हनुमान टौरिया के पीछे, ब्रम्हकुमारी आश्रम और के पास भी रेत का काला कारोबार फल-फूल रहा है।

ट्रैक्टरों पर नंबर तक नहीं

जिले में माफिया ने अपने अवैध कारोबार को छिपाने के लिए एक खतरनाक तरीका अपनाया है। ट्रैक्टर-ट्रॉलियों पर रजिस्ट्रेशन नंबर तक दर्ज नहीं है। यदि कोई हादसा या अपराध होता है, तो नंबर न होने के कारण इन वाहनों को ट्रेस करना नामुमकिन हो जाता है। मोटर व्हीकल एक्ट के अनुसार, बिना नंबर के वाहन चलाने पर जुर्माने और जब्ती का प्रावधान है, लेकिन प्रशासनिक उदासीनता के चलते ये बिना नंबर के बेखौफ वाहन सडक़ों पर मौत बनकर दौड़ रहे हैं।

परिवहन टैक्स की बड़ी चोरी और कमर्शियल उपयोग

शहर में प्रतिदिन 400 से अधिक ट्रैक्टर-ट्रॉलियों के जरिए रेत और ईंट का अवैध कारोबार हो रहा है। ये वाहन कृषि प्रयोजन के लिए रजिस्टर्ड हैं, लेकिन इनका उपयोग धड़ल्ले से कमर्शियल (व्यावसायिक) कार्यों में किया जा रहा है। इससे शासन को लाखों रुपए के परिवहन टैक्स का चूना लग रहा है। परिवहन विभाग केवल चेक पॉइंट्स के भरोसे बैठा है, जबकि शहर की मुख्य सडक़ों पर खुलेआम नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।

मुनाफे का खेल

शहर में इस अवैध रेत की मांग इतनी अधिक है कि गुणवत्ता के आधार पर एक ट्रॉली रेत 3000 से लेकर 10000 रुपए तक में बेची जा रही है। अधिक मुनाफे के लिए चालक ट्रॉली में अतिरिक्त पटिया लगाकर ओवरलोड रेत भर रहे हैं। बिना इंश्योरेंस और बिना फिटनेस के ये वाहन राहगीरों के लिए मौत के सौदागर साबित हो रहे हैं।

संदेह के घेरे में खनिज और राजस्व विभाग

अधिकारियों के बंगलों और कार्यालयों के चंद कदमों की दूरी पर सज रही ये मंडियां सिस्टम की पोल खोलती हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि इन माफियाओं को राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण प्राप्त है। यदि जल्द ही इन छोटे नदी-नालों से हो रहे अवैध उत्खनन पर प्रभावी रोक नहीं लगाई गई, तो आने वाले समय में जिले का पारिस्थितिक तंत्र पूरी तरह तबाह हो जाएगा।

इनका कहना है

अवैध खनन और परिवहन पर लगातार कार्रवाई की जा रही है। ट्रैक्टरों पर हर सप्ताह कार्रवाई की जा रही है। टीमों को निर्देश दिए गए हैं। वे लगातार कार्रवाई करें। मैं भोपाल में हूं, वापस आकर खुद भी फील्ड में जाकर कार्रवाई करुंगा।

अमित मिश्रा, खनिज अधिकारी