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विश्व मौसम विज्ञान दिवस : अमरकंटक का बदलता प्राकृतिक संतुलन, 3000 फीट ऊंचाई पर भी 40 डिग्री पारा

आस-पास औद्योगिक गतिविधियों का संचालन व पेड़ों की कटाई सबसे बड़ा कारण, तापमान बढऩे के साथ घट रही बारिश

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शहडोल. प्रदेश का सबसे इनवेटेड एरिया अमरकंटक भी जलवायु परिवर्तन की चपेट में है। विशेषज्ञों की माने तो लगभग 15-20 वर्ष पहले यहां गर्मी के दिनो में भी तामपान सामान्य रहता था। बदलते दौर आस-पास के क्षेत्रों में औद्योगिक गतिविधियों व हो रहे अधाधुंध निर्माण कार्यों की बदौलत धीरे-धीरे इस क्षेत्र में भी जलवायु परिवर्तन का असर देखने मिल रहा है। इससे जैव विविधता भी प्रभावित हो रही है। इसका असर पर मानव के साथ ही जीव जंतु व वानिकी में भी देखने मिल रहा है। जानकारों की माने तो प्रदेश का पहला क्षेत्र अमरकंटक है जो कि समुद्र तल से लगभग 3000 फीट ऊंचाई पर है। यही कारण है कि यहां का तापमान गर्मी के दिनो में भी 25-30 डिग्री सेल्सियस से अधिक नहीं रहा है। पिछले कुछ वर्षो में प्राकृतिक असंतुलन की स्थितियां बन रही हैं, जो कि पूरे वायुमण्डल को प्रभावित कर रही हैं। पहले कभी तापमान में इतने बढ़ोतरी नहीं होती थी।

शिफ्ट हो रही वन संपदा, घट गया घनत्व

विशेषज्ञों का कहना है कि पौधों की अधाधुंध कटाई की वजह से वानिका प्रभावित हो रही है। इसका असर वायुमण्डल पर देखने मिल रहा है। वनों का क्षेत्रफल तो कम नहीं हुआ लेकिन घनत्व कम हो गया है। वन संपदा लगातार शिफ्ट हो रही है। घने वन संपदा हैं, वह परिवर्तित हो रही है। यहीं वजह है कि बेमौसम बारिश, अचानक तापमान में बढ़ोतरी जैसी स्थितियां निर्मित हो रही हैं।

प्राकृतिक जलवायु परिवर्तन में असंतुलन

प्राकृतिक जलवायु परिवर्तन की गति बहुत धीमी होती है, लेकिन मानवीय हस्तक्षेप ने इसे पूरी तरह से असंतुलित कर दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में ठंड के समय में काफी कमी आई है, अचानक तापमान में बढ़ोत्तरी हो रही है, ऐसा ही असंतुलन बारिश के दिनो में भी देखने मिल रहा है। पांच से 10 वर्ष पूर्व रुक-रुक कर बारिश का जो क्रम देखने मिलता था वह अब देखने नहीं मिल रहा है। अचानक तेज बारिश हुई और कुछ समय के बाद थम गई। इससे ग्राउण्ड वॉटर रिचार्ज नहीं हो पा रहा है और मृदा के जो पोषक तत्व हैं वह भी बह जा रहे हैं।
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वायुमण्डल में तैयार हो रही लेयर, बढ़ रहा तापमान

कृ षि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक बीके प्रजापति का कहना है कि जलवायु परिवर्तन दो कारणों से होता है। प्राकृतिक रूप से जलवायु परिवर्तन काफी धीमी गति से होता है। मानवीय हस्तक्षेप के चलते तो परिवर्तन हो रहा है वह पूरी जैव विविधता को प्रभावित कर रहा है। क्षेत्र में प्रदूषण का लेवल बढ़ गया है। अत्यधिक ईंधन का उपयोग, फैक्ट्री से निकलने वाली गैस, एसी की क्लोरो फ्लोरो सहित अन्य गैस वायुमण्डल में एक लेयर तैयार करती है। यह लेयर पृथ्वी पर आने वाली सूर्य की किरणों को वापस जाने से रोक देती हैं। इससे वायुमण्डल का तापमान बढ़ता है और क्लाइमेंट चेंज का कारण बन रहा है।

जलवायु परिवर्तन: प्री-मेच्योर फसलें, सब्जियां भी प्रभावित

आईजीएनटीयू के प्राध्यापक प्रो. तरुण ठाकुर का कहना है कि अमरकंटक समुद्र तल से सबसे ऊंचाई वाला क्षेत्र है। यहां का तापमाल 25-30 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा नहीं बढ़ता था, लेकिन वर्तमान में यहां का तापमान भी 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच रहा है। यह स्थितियां जलवायु परिवर्तन की वजह से निर्मित हो रही है। तापमान बढऩे के चलते समय से पहले फसलें तैयार हो जा रही हैं, इससे उत्पादन प्रभावित हो रहा है। इसके अलावा मानवीय जीवन में भी इसके प्रभाव देखने मिल रहे हैं। अमरकंटक क्षेत्र में अचानक बारिश का भी वायुमण्डल में घुल रहा प्रदूषण सबसे बड़ा कारण है।