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लक्ष्यों पर आत्ममंथन का खास अवसर बने ‘अमृत महोत्सव’

राष्ट्रीय गौरव बोध के लिए ज्यादा जरूरी है कि इस मौके को गहन आत्ममंथन के लिए खास अवसर बनाया जाए। हमें इन मूलभूत प्रश्नों पर विचार करना होगा कि हमारे लक्ष्य क्या होंगे और हम कौन-सा रास्ता अपनाएंगे? आज अर्थ की स्वतंत्र और सर्वोच्च प्रतिष्ठा से उपजी लिप्सा अपराध, धोखा, जन-धन की हानि आदि के रूपों में जिस तरह प्रकट हो रही है, वह मूल्यहीनता और सामाजिक संवेदनशीलता के अभाव के संकट की ओर संकेत करती है।

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Patrika Desk

May 17, 2022

प्रतीकात्मक चित्र

प्रतीकात्मक चित्र

गिरीश्वर मिश्र
(पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा)

भारत की स्वतंत्रता के 'अमृत महोत्सव' मनाने के ऐतिहासिक मौके पर इस वर्ष देश के सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक अतीत के पुनरावलोकन की कोशिशों में त्याग, बलिदान की कीर्ति-कथाओं के स्मरण के दौर चलते रहे हैं। यह कटु सत्य है कि देश के वर्तमान ढांचे की शुरुआत अखंड भारत के विभाजन और उसके साथ हुए भीषण रक्तपात के साथ हुई। कुछ भूलें भी हुईं, जिनका दंश देश की नियति बन चुकी है। यह इतिहास का विषय है और इसके बावजूद कि इतिहास तथ्य पर टिका रहना चाहिए वह कभी निरपेक्ष नहीं हो सकता। अंतत: इतिहासकार की इतिहास-दृष्टि से रंजित ही रहता है। इसलिए देश और समाज की चर्चाओं में उन कमियों की ओर भी इशारा किया गया जिनसे देश की मुश्किलें बढ़ीं और जवाबदेही तय करने के बीच विभिन्न दलों व मतों के अनुयायियों के बीच तल्खी भी सामने आती रही। इसके साथ ही शताब्दी वर्ष यानी 2047 के भारत को शक्तिशाली राष्ट्र का स्वप्न देखने-दिखाने के उपक्रम भी शुरू हो गए हैं।

राष्ट्रीय गौरव बोध के लिए ऐसा होना भी जरूरी है पर कहीं ज्यादा जरूरी है कि इस मौके को औपचारिक रस्म अदायगी से आगे बढ़ कर गहन आत्ममंथन के लिए खास अवसर बनाया जाए। हमें इन मूलभूत प्रश्नों पर विचार करना होगा कि हमारे लक्ष्य क्या होंगे और हम कौन-सा रास्ता अपनाएंगे? इन प्रश्नों पर विचार करते हुए भारतीय उप महाद्वीप की भू-राजनीतिक हलचलों, देश की आधार-संरचना और बढ़ती जनसंख्या की जरूरतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उल्लेखनीय है कि यह देश आज विश्व के ऐसे देशों में गिना जाता है जहां युवा वर्ग का अनुपात अधिक है और उसका उत्पादन और आर्थिक विकास की दृष्टि से बड़ा लाभ मिल सकता है। कृषि के क्षेत्र में देश आत्मनिर्भर हो रहा है। कुछ तकनीकी क्षेत्रों में भी उल्लेखनीय उपलब्धियां दर्ज हैं। दूसरी ओर व्यवस्था की दृष्टि से हमारे कानून, लालफीताशाही और चुनावी राजनीति, तीनों सब पर भारी हो रहे हैं।

विश्व के सबसे बड़े प्रजातंत्र को एक संघीय ढांचे में एकजुट रखना समाज की आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए कितना मुश्किल है, यह स्वतंत्रता के बाद हुए प्रदेशों के पुनर्गठन और देश के संविधान में हुए शताधिक संशोधनों से पता चलता है। स्थानीय, क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दायरों में हो रहे समकालीन आर्थिक-राजनीतिक बदलावों से समाज का वैचारिक रुझान अप्रभावित नहीं रह सकता। साथ ही सामाजिक विविधताओं के साथ चलने के लिए गतिशील संतुलन की जरूरत पड़ती है जो मीडिया और संचार की अति सक्रियता के दौर में अक्सर अपेक्षित और अनपेक्षित ढंग से जटिल रूप ले लेते हैं। इन सबसे उपजती गहमागहमी के बीच अब देश और राष्ट्र की सहज एकता अक्सर पृष्ठभूमि में जाती देखी जा रही है।

कभी स्वतंत्रता संग्राम में 'वन्दे मातरम्' की मानसिकता के साथ एक भारत की प्रतिज्ञा के रूप में स्वदेशी, सर्वोदय और स्वावलंबन जैसी आचरणमूलक प्रतिबद्धताएं मुख्य थीं और चरखा तथा खादी जैसे आर्थिक उपक्रम और बुनियादी शिक्षा को वरीयता दी जा रही थी। इनके साथ तादात्मीकरण बड़ा प्रखर रूप से अभिव्यक्त था। यह सब इस देश की मिट्टी और संस्कृति में अपने स्रोत तलाश रहा था और पा रहा था। स्वाधीनता के लक्ष्य को देश के लिए, देश के द्वारा और देसी ढंग से आकार देने की कोशिश स्वाधीनता मिलने के बाद पलट गई। आर्थिक विकास देश की रीढ़ है पर आर्थिक विकास समाज और संस्कृति से परे नहीं है। आचार्य कौटिल्य धर्म का मूल यदि अर्थ में देखते हैं तो उनका आशय दोनों की पारस्परिक संगति से है। आज अर्थ की स्वतंत्र और सर्वोच्च प्रतिष्ठा से उपजी लिप्सा अपराध, धोखा, जन-धन की हानि आदि के रूपों में जिस तरह प्रकट हो रही है, वह मूल्यहीनता और सामाजिक संवेदनशीलता के अभाव के संकट की ओर संकेत करती है। यदि आर्थिक दृष्टि से समृद्ध कल्याणकारी राज्य का लक्ष्य हमें पाना है तो चरित्रवान और कुशल उद्यमशील समाज का निर्माण जरूरी होगा।