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शिक्षक की गरिमा प्रतिष्ठित हो तो ही पूरा होगा अमृतकाल का स्वप्न

शिक्षक दिवस पर विशेष: जीवन, जीविका और जन-कल्याण हर संदर्भ में आज हमारी शिक्षा व्यवस्था ही सवालों के घेरे में है अध्यापक को नए सांचे में ढाला जाने लगा है और बदलती सामाजिक जलवायु के बीच उसका कायापलट होता गया है। अब अध्यापक-छात्र का रिश्ता औपचारिक हो गया है।

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Nitin Kumar

Sep 06, 2023

शिक्षक की गरिमा प्रतिष्ठित हो तो ही पूरा होगा अमृतकाल का स्वप्न

शिक्षक की गरिमा प्रतिष्ठित हो तो ही पूरा होगा अमृतकाल का स्वप्न

गिरीश्वर मिश्र
पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विवि, वर्धा
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विद्याध्ययन के संदर्भ में एक शिक्षक की भूमिका निर्विवाद रही है और उसकी महिमा का बखान सदा-सदा से होता आया है । वह एक मार्गदर्शक के रूप में विद्यार्थी को ज्ञान के नए-नए क्षेत्रों में प्रवेश दिलाता है और उसकी कुशलताओं का विकास करते हुए जीवन की चुनौतियों के समाधान के लिए दक्ष बनाता है । व्यावहारिक स्तर पर ज्ञान का हस्तांतरण एक स्थान से दूसरे स्थान तक सूचना के सम्प्रेषण की तकनीकी प्रक्रिया जैसा ही लगता है पर यह दो जीवित मनुष्यों के बीच मानवीय संबंध (ह्यूमन रिलेशन) के जरिए घटित होता है। इस रूप में शिक्षा बेहद सोद्देश्य, सार्थक व अनोखी प्रक्रिया हो जाती है। उसमें ज्ञान के साथ-साथ सीखने और सिखाने वाले दोनों के भाव, संवेग, रिश्ते व सीखने का संदर्भ आदि भी स्वत: शामिल हो जाते हैं। यानी इसमें देश, काल व पात्र तीनों की सक्रिय भूमिका होती है। समय के साथ तीनों बदलते रहे हैं।

भारत में शिक्षा के लिए गुरु-शिष्य की बड़ी सुदृढ़ परम्परा रही है। पहले शिक्षक गुरुकुल में रहता था और अपने अंतेवासी छात्रों के समग्र विकास के लिए उत्तरदायी होता था। शिक्षा के अभ्यास कैसे हो, उसे पूरी छूट थी। गुरु स्वायत्त था और क्या शिक्षा देनी है? कैसे देनी है? विद्यार्थी की पात्रता कैसे सुनिश्चित होगी? उसकी प्रगति की जांच कैसे करनी है? इन सबके लिए मानदंड भी वही तय करता था। गुरु के विवेक पर भरोसा रख कर समाज और राजसत्ता गुरु को जरूरी संसाधन उपलब्ध करा देती थी। शेष दायित्व गुरुकुल का था। शिक्षक के पास जीवन में ढलते हुए विद्यार्थी सचमुच में समग्रता में परिपक्व (होलिस्टिक डवलपमेंट) होता था।

आज के दौर में शिक्षा दिलाने का काम वर्षों तक युद्ध जैसा चलता रहता है। आस-पास नजर दौड़ाएं तो पाएंगे कि जिस घर में नर्सरी या स्कूल जाने वाले बच्चे होते हैं वहां का माहौल मोर्चे पर जाने की तैयारी जैसा ही होता है। आशय सिर्फ यह संकेत करना है कि ज्ञानार्जन केवल बौद्धिक कार्यकलाप नहीं है। वस्तुत: संदर्भ से काट कर (अमूर्त!) शिक्षा की बात निरर्थक हो जाती है। यह संदर्भविहीनता तेजी से बढ़ती जा रही है। जीवन, जीविका और जन-कल्याण हर संदर्भ में शिक्षा प्रश्नांकित हो रही है। इस सबका सूत्रधार कौन है यह तो कठिन प्रश्न है पर कर्णधार तो अध्यापक ही है।

सरकारी शिक्षा संस्थानों के सिमटते संसार के बीच निजी क्षेत्र के बढ़ते व्यापार के रूप में विद्यालय और उच्च शिक्षा के संस्थान अकूत धन-उगाही के सम्मानजनक स्रोत के रूप में तेजी से पनप रहे हैं। ‘प्रोफेशनल’ होते जा रहे अध्यापक के लिए विद्यार्थी ‘क्लाइंट’ होता जा रहा है। एक छोटा-सा उदाहरण लें - समान कक्षा की शिक्षा के लिए आज एक ही शहर में सरकारी और निजी शिक्षा संस्थानों की फीस में कई-कई गुने का फर्क है। तब शैक्षिक माहौल में भी गंभीर अंतर दिखाई पड़ता है। आज अध्यापकों की वर्ग व्यवस्था (क्लास सिस्टम) बन गई है। उनके रुतबे, वेतन और सुविधा में बड़ा फर्क है। हालांकि योग्य-अयोग्य दोनों ही ओर मिलेंगे।

अध्यापक समुदाय की जीवन-दशा में बड़े अंतर दिखते हैं। उनके कौशल, शिक्षण में संलग्नता, विद्यार्थी के चरित्र-निर्माण के प्रति संवेदनशीलता और अकादमिक मनोवृत्ति में भी बड़ा अंतर दिखता है। आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है सुरक्षित शैक्षिक परिवेश का निर्माण जो समावेशी हो, जहां छात्र मन में उद्वेलन न हो और कुंठा से मुक्त हो कर जहां स्वस्थ मन से अध्ययन संभव हो। चिंता की बात यह भी है कि प्राइमरी स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय तक स्थिति विकट है। व्यवस्था और कायदे-कानून आज योग्यता और गुणवत्ता की जगह कागजी खानापूर्ति में विश्वास करते हैं, जिससे अध्यापन और अध्यापक की गरिमा लगातार घट रही है। सार्थक और जीवनोपयोगी शिक्षा के लिए शिक्षक की गरिमा को प्रतिष्ठित कर के ही अमृत काल का स्वप्न पूरा हो सकेगा।