
Hindi Diwas 2024
विनोद अनुपम
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त कला समीक्षक
...........................................................................
हिंदी सिनेमा के सबसे प्रतिष्ठित लेखक माने जाने वाले सलीम जावेद पर केंद्रित वृत्तचित्र शृंखला ‘एंग्री यंगमैन’ के अंग्रेजी शीर्षक पर चौंकने वाले के लिए यह भी गौरतलब है कि शृंखला की भाषा मूलत: अंग्रेजी रखी गई है। विवरण से लेकर अधिकांश साक्षात्कार तक अंग्रेजी में हैं। जाहिर है पिछले दिनों मुंबई में आयोजित इस शृंखला के समारोह में हिंदी फिल्म उद्योग के लगभग तमाम बड़े नाम उपस्थित थे, पर समारोह की भाषा अंग्रेजी थी। एक सलीम खान और सलमान खान के अलावा सभी लोगों ने अपनी बातें अंग्रेजी में रखीं। हिंदी सिनेमा के बाहर के लोगों को ये बातें थोड़ी अटपटी लग सकती हैं, पर हिंदी सिनेमा के लिए यही स्वाभाविक है। आमिर खान ने कभी कहा था, ‘मैं अंग्रेजी के साथ अधिक कंफर्टेबल रहता हूं।’ सैफ अली खान जैसे अभिनेता तो हिंदी पढ़ ही नहीं सकते, उन्हें संवाद भी रोमन में चाहिए। आश्चर्य नहीं कि हिंदी सिनेमा लेखन के दो सबसे बड़े नाम गुलजार साहब और जावेद साहब को आज तक देवनागरी सीखने की जरूरत महसूस नहीं हुई। हाल ही में गुलजार साहब पर जब यतींद्र मिश्र ने पुस्तक लिखी तो गुलजार साहब के पाठ के लिए उन्हें उर्दू अनुवाद उपलब्ध कराना पड़ा। जावेद अख्तर यह कहने में संकोच नहीं करते कि उन्होंने हिंदी कभी पढ़ी नहीं और वह इसे लिख नहीं सकते। वह कहते हैं, ‘पटकथा मूलरूप से तो अंग्रेजी में ही लिखी जाती है, बाद में संवादों का हिंदी या उर्दू में तर्जुमा किया जाता है।’
वास्तव में किसी भी भाषा और संस्कृति को ‘जानने’ से अधिक महत्त्वपूर्ण उसे स्वीकार करना है। हिंदी सिनेमा के लोगों के साथ मुश्किल यह है कि वे न तो हिंदी जानना चाहते हैं, न ही उसे स्वीकार करना चाहते हैं। आश्चर्य नहीं कि फिल्म के शीर्षक से शुरू हुई अंग्रेजी हिंदी सिनेमा के संवादों पर भी हावी हो चुकी है। शायद हिंदी सिनेमा पर बढ़ते अंग्रेजी के इसी दबाव को देखते हुए 2018 में सूचना प्रसारण मंत्रालय ने हिंदी सिनेमा उद्योग के लिए एक सलाह पत्र जारी किया जिसमें फिल्मकारों से ‘आग्रह’ किया गया था कि वे हिंदी फिल्म में क्रेडिट सिर्फ हिंदी में, या दो भाषाओं में जिनमें से एक अनिवार्य रूप से हिंदी हो, में दिया करें। पत्र में कहा गया था कि अधिकांश हिंदी फिल्मों के क्रेडिट अंग्रेजी में दिए जा रहे हैं, जो तार्किक रूप से सही नहीं है। क्रेडिट उसी भाषा में हों, जिस भाषा की फिल्म है ताकि अंग्रेजी न जानने वाले दर्शक फिल्म के कास्ट और क्रू के बारे में सूचना पाने से वंचित न रहें। पर इस सलाह को पूरी तरह अनसुना कर दिया गया, और एक भी दिन, एक भी फिल्म में इस सलाह को महत्त्व देने की कोशिश नहीं दिखी। अंग्रेजी के प्रति हिंदी सिनेमा के ‘आक्रामक प्यार’ को इसी से समझ सकते हैं कि इस सलाह पत्र के बाद हिंदी सिनेमा ने अपने पोस्टरों को पूरी तरह हिंदी विहीन कर दिया। ‘मैं अटल हूं’ जैसी फिल्म का पहला पोस्टर सिर्फ अंग्रेजी में जारी किया गया। 70-80 के दशक तक पोस्टर पर कोने में हिंदी और उर्दू अनिवार्य रूप से दिख जाती थी। अब सिर्फ 2024 की फिल्मों पर ही गौर करें तो शायद ही किसी फिल्म के पहले पोस्टर पर हिंदी दिख सकी। हिंदी के प्रचार-प्रसार में बार-बार हिंदी सिनेमा की सराहना की जाती है, पर क्या वाकई हिंदी सिनेमा इस सराहना के लायक है?
Published on:
15 Sept 2024 10:30 pm
बड़ी खबरें
View Allओपिनियन
ट्रेंडिंग
