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कला-शिक्षा: महत्त्व सौंदर्यबोध का

कला कोई भी हो, उसके लिखे में यदि सौंदर्यान्वेषण नहीं होगा, केवल इतिहास से जुड़े तथ्य ही प्रस्तुत होंगे तो उससे रसिकता पैदा नहीं होगी। कला-शिक्षा से जुड़े पाठ्यक्रम का उद््देश्य इतिहास से विद्यार्थियों को अवगत कराना ही नहीं होता, बल्कि विद्यार्थियों को कलाओं के निकट लाना, उन्हें कलाओं से संपन्न कर सौंदर्यबोध विकसित करना भी होता है। इस दृष्टि से पहले जो सिरजा गया है, उसके भावबोध, उसकी विलक्षणता पर नवीन दृष्टि से विचार क्या जरूरी नहीं है?

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Patrika Desk

Nov 20, 2022

कला-शिक्षा: महत्त्व सौंदर्यबोध का

कला-शिक्षा: महत्त्व सौंदर्यबोध का

राजेश कुमार व्यास
कला समीक्षक

समकालीन विमर्र्श में भारतीय मूर्तिकला की विलक्षणता उपेक्षित प्राय: है। मुझे लगता है, अंग्रेजी शिक्षा-दीक्षा ने सौंदर्य संबंधी हमारी धारणाओं को जैसे लील लिया है। मूर्तिकला का आस्वाद इसीलिए पर्यटन स्थलों की विरासत तक सीमित होकर रह गया है। मूर्तिकला पर हालांकि रायकृष्णदास, वासुदेवशरण अग्रवाल, वाचस्पति गैरोला आदि ने लिखा भी है, परन्तु इस लिखे में बाद में किसी तरह की बढ़त नहीं हुई। इधर एक शोध कार्य से जुड़े लेखन के संदर्भ में जब नया कुछ पढऩे को निरंतर खोज रहा था तो लगा, मूर्तिकला के ऐतिहासिक काल-क्रम को ही पहले के लिखे में थोड़ा-बहुत हेर-फेर कर दूसरों ने भी लिख दिया है। पाठ्यपुस्तकों का हाल तो इस कदर बुरा है कि वहां पंक्तियां दर पंक्तियां हूबहू टीप दी गई हैं। सोचता हूं, इनको पढऩे वाले विद्यार्थियों में अपनी कला के प्रति सौंदर्य बोध फिर कैसे विकसित होगा?
कला कोई भी हो, उसके लिखे में यदि सौंदर्यान्वेषण नहीं होगा, केवल इतिहास से जुड़े तथ्य ही प्रस्तुत होंगे तो उससे रसिकता पैदा नहीं होगी। कला-शिक्षा से जुड़े पाठ्यक्रम का उद््देश्य इतिहास से विद्यार्थियों को अवगत कराना ही नहीं होता, बल्कि विद्यार्थियों को कलाओं के निकट लाना, उन्हें कलाओं से संपन्न कर सौंदर्यबोध विकसित करना भी होता है। इस दृष्टि से पहले जो सिरजा गया है, उसके भावबोध, उसकी विलक्षणता पर नवीन दृष्टि से विचार क्या जरूरी नहीं है?
हमारे यहां मूर्तिकला बाह्य से अधिक आंतरिक भावों की गहराई से जुड़ी रही है। सौंदर्य की दृष्टि से अनुपात और लयताल का जो निर्वहन मूर्तिकला में हमारे यहां हुआ है, वह विश्व में अन्यत्र कहीं नहीं है। संग्रहालयों में संरक्षित विभिन्न कालखण्डों की मूर्तियों पर गौर करेंगे तो पाएंगे कि अनुपात-लय और ताल में मूर्तियां तीव्र और रसमय माधुर्य का आस्वाद कराने वाली हंै। माने किसी मूर्ति को आपने उसकी समग्रता में देखा है, तो एक बार नहीं, बार-बार देखने के लिए वह आपको आमंत्रित करेगी। एक महत्त्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि मूर्तिकला हमारे यहां चित्र, स्थापत्य और वास्तु, इन तीनों का परस्पर समन्वित स्वरूप है। बुद्ध की मूर्ति को ही लें। बुद्ध मूर्तिकला के विरोधी थे, परन्तु सर्वाधिक मूर्तियां उन्हीं की बनी हंै। उनके नेत्रों और ओष्ठों में जो भाव हमारे यहां सिरजे गए हैं, वे विरल हैं। अपरिमेय शांति और संयम के भावों की ऐसी मूर्तियां जगचावी हुईं। अजन्ता, एलोरा, एलिफेंटा की गुफाओं, सांची, सारनाथ, अमरावती के महान स्तूप, सोमनाथ, कोणार्क, खजुराहो, मीनाक्षी मंदिर, उदयपुर के जगत मंदिर के शिल्प वैभव में ऐसे ही अंतर जैसे आलोकित होता है।
कुछ समय पहले एलोरा जाना हुआ था। वहां कैलास मंदिर को देख अनुभूत हुआ, तक्षण और वास्तुकला की यह ऐसी विरासत है जिसे कला शिक्षा प्राप्त करने वाले हर विद्यार्थी को देखनी चाहिए। बहुमंजिला कैलास मंदिर को एक ही चट्टान से शिल्पियों ने उकेरा है। भीमकाय स्तम्भ, विस्तीर्ण प्रांगण, दालान, मूर्तिकारी से भरी छतें और मानवों और विविध जीव-जंतुओं की अद्भुत प्रतिमाएं। ऐसा लगता है जैसे मूर्तिकारों ने अपनी कला का सर्वस्व यहां अर्पण किया है। सोचता हूं, इस तरह की जीवंतता हर कालखंड की मूर्तिकला में हमारे यहां रही है। इस विलक्षणता पर सौंदर्य की दीठ से क्या लिखा और विचारा गया है?