
हल्की फुहार हो, आंखों में प्यार और चेहरे पर खुमार हो तो कुछ पीने-खाने का मन करने लगता है। यानी चाय पीने और समोसा खाने का। सो ऐसे मल्हार मौसम में दिल किया कि चौराहे पर अपनी चटोकड़ी जुबान को संतुष्ट करें। टूटे स्कूटर को किक मारी और पहुंच गए चटपटी चाट भंडार। वहां बड़ी-बड़ी कारें खड़ी थी, हमने भी अपना स्कूटर उनके बीच खड़ा कर दिया।
पांच मिनट बाद हमारे हाथ में खट्टी-मीठी चटनी से सराबोर गरम-गरम समोसे का दोना आया ही था कि चौराहे पर हलचल मची। देखा कि चार-पांच मुस्टण्डे हमारे स्कूटर को उठा हाफ बॉडी ट्रक में डाल ले उड़े। हम हाथ में दोना लिये 'ओ भाईसाब, ओ भाईसाबÓ कहते हुए भागे पर इतनी देर में वे रफूचक्कर हो गए। हम समझ गए कि ये ट्रैफिक के उठाईगीरे ठेकेदार हैं।
उन्होंने हमारे स्कूटर का अपहरण ऐसे किया जैसे फिल्मों में विलेन के गुंडे हीरोइन को कार में पटक के ले जाते हैं। हम लुटे-पिटे मिनी बस में लद कर स्कूटर मोटर साइकिलों के 'कांजी हाउसÓ में पहुंचे। हमने 'इंचार्ज साबÓ से बात करनी चाही। दस मिनट तो फुरसत ही नहीं मिली। घड़ी-घड़ी उनके पास फोन आ रहे थे और वे झुंझला कर कह रहे थे- अरे ओ छोरे! वो नीली कार को जाणे दे, वो साहब के साले की साली की है। वो मोटर साइकिल छोड़, पीए साब का फोन है।
फिर हमारी तरफ देखकर बोला, क्या करें, हमारे तो हाथ ही बंधे हुए हैं। आप तो जुर्माना भरो जी। हमने थोड़े गरम होकर कहा- ये तो कोई बात नहीं। कानून तो सबके लिए बराबर है। वो फिर बोला- बात तो ठीक कहते हो जी पर हमारे तो हाथ बंधे हुए हैं। इतने में एक जीप आकर रुकी और उसमें से साब निकल कर बोले- आपका नाटक देखा था 'एक था गधाÓ। आपने गधे का जोरदार रोल किया था। आप यहां कैसे। माजरा सुनते ही बोले- अजी डिप्टीसाब। इनको तो छोड़ो। अपने आदमी हैं। थानेदार फिर बोला- मैं तो पहले ही छोड़ देता पर हमारे तो हाथ बंधे हुए हैं।
व्यंग्य
राही की कलम से
Published on:
18 Jul 2016 03:29 am
बड़ी खबरें
View Allओपिनियन
ट्रेंडिंग
