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शहादत दिवस पर विशेष: राष्ट्रव्यापी आंदोलन से टल सकती थी फांसी

अंग्रेज शासन की दमनात्मक नीतियों के खिलाफ आक्रामक तेवर अपनाने वाले भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु को वर्ष 1931 में फांसी दी गई। क्या टाली जा सकती थी देश के इन सपूतों की फांसी? - शहादत दिवस (23 मार्च) पर विशेष

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Rajeev sharma

Mar 23, 2017

वर्ष 1931 में जब भगतसिंह, राजगुरु व सुखदेव को ब्रिटिश शासन ने फांसी की सजा सुनाई तो ये युवा क्रांतिकारी देश की आंख के तारे बन चुके थे। लोग दिलोजान से चाहते थे कि इनका मृत्युदंड रोका जाए।

स्वतंत्रता सेनानी व कांग्रेसी नेता पट्टाभि सीतारामय्या ने स्वयं लिखा है कि उस समय भगतसिंह का नाम सारे देश में गांधीजी की तरह लोकप्रिय हो गया था। भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को 23 मार्च को फांसी दिए जाने से कुछ समय पहले तक महात्मा गांधी की ब्रिटिश वायसराय लार्ड इरविन से बातचीत चल रही थी।

इस बातचीत का एक महत्वपूर्ण मुद्दा उन राजनीतिक बंदियों की सजा निरस्त करना या कम करना था जिन्हें विशेष अध्यादेश के तहत हिंसक कार्रवाइयों के लिए कठोर सजाएं मिली थी। भगत सिंह व उनके साथियों का मृत्युदंड रोकने का मामला इसमें अति महत्वपूर्ण था।

गांधीजी की इस बात के लिए आलोचना होती रही है कि उन्होंने लार्ड इरविन से भगतसिंह व उनके साथियों का मृत्युदंड रोकने के लिए समुचित प्रयास नहीं किए। इस मुद्दे पर जन-भावनाएं उमड़ रही थीं।

तब जनभावनाओं को देखते हुए भगत सिंह व उनके साथियों का मृत्युदंड रोकने के लिए एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। उम्मीद यह भी थी कि गांधी खुद इस आंदोलन की अगुवाई करते।

गांधीजी व कांग्रेस जनभावनाओं को समझने में असमर्थ रहे। जिन क्रांतिकारियों ने अंग्रेज शासकों के विरुद्ध हिंसात्मक आंदोलन किए थे, उनके प्रति इस आंदोलन की अहिंसक धारा में आदर-सम्मान होते हुए भी कुछ अनिश्चय की स्थिति थी।

अनिश्चय इस बात को लेकर था कि अहिंसक आंदोलन हिंसा कर चुके क्रान्तिकारियों के बचाव में कहां तक आगे आया जा सकता है। अहिंसा की राह को छोड़े बिना ही मृत्युदंड को रोकने की मांग की जा सकती थी। दुनिया में जो शांति आंदोलन हुए हैं उनमें कई बार मृत्युदंड पर रोक लगाने की मांग की है क्योंकि वे मृत्यु दंड को भी एक तरह की हिंसा ही मानते हैं।

भगतसिंह, राजगुरु व सुखदेव तो भारत माता के ऐसे सपूतों के रूप में ख्याति अर्जित कर चुके थे जो देश प्रेम व उच्च आदर्शों के लिए बड़े से बड़ी कुर्बानी देने को तत्पर रहते थे।

ऐसा राष्ट्रव्यापी आंदोलन जनवरी-मार्च 1931 के बीच चलाया होता, तो उससे सभी धाराओं के राष्ट्रीय आंदोलन में एकता स्थापित हो जाती व आजादी की लड़ाई इतनी मजबूत हो जाती कि लगभग पांच वर्षों के भीतर ही देश को आजादी मिल जाती और बंटवारे की त्रासदी से भी देश शायद बच सकता था।

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