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दिमाग का दही

एक देसी डॉन को उसके गुर्गे ऎसे छुड़ा ले गए जैसे "जौहर-महमूद इन गोवा" फिल्म का कोई हिट दृश्य चल रहा हो

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Shankar Sharma

Sep 06, 2015

Sheena Bora

Sheena Bora

पिछले कुछ दिनों से दिमाग का दही हो चुका है। यह
सुनते-सुनते दो हफ्ते हो गए कि तीसरे पति की दूसरी पत्नी बनी करोड़पति सुदरी ने
पहले पति की बेटी को, जिसे वह बहन बताती थी, दूसरे पति के साथ मिलकर इसलिए मरवा
दिया कि वह तीसरे पति की पहली पत्नी के बेटे से प्रेम करती थी।

दिन-रात टीवी चैनलों
पर यही खबर बार-बार सुनने के बाद हमारा मन करने लगा है कि एकमात्र पत्नी जो एकमात्र
बेटे और एकमात्र बेटी की घरेलू मां हैं, को बुद्ध की तरह छोड़ कर किसी जंगल में
धूणी रमा लें। जहां ऎसे चैनल तो नहीं देखने पड़े जो बता रहे हैं कि आज उस तीन
पतियों की बेवफा ने जेल में पिज्जा/बर्गर खाया।

दिमाग के दही होने का एकमात्र कारण
यही नहीं कई और भी हैं। मसलन मुर्गी और दाल का बराबर हो जाना। स्कूली जीवन में एक
कहावत सुनी थी "घर की मुर्गी दाल बराबर"। उसे चरितार्थ होते अब देखा है। मार्केट
में जाइए तो मुर्गी भी उसी भाव मिलेगी जिस भाव तुअर दाल पहुंच रही है। इधर जोर का
झटका धीरे से प्याज ने दिया है। मोदी सरकार के नसीब से पेट्रोल प्याज से सस्ता हो
गया है। भारतीय अर्थव्यवस्था में ऎसा आश्चर्य पहली बार हुआ है।

पेट्रोल चौसठ रूपए
लीटर है तो प्याज सत्तर रूपए किलो मिल रहे हैं। बस यह सोच-सोच कर ही हमारा दिमाग
दही की तरह जम चुका है कि हे भगवान क्यों न प्याज की जगह और सस्ती चीजों का सेवन
करने लगे। इधर जब देखो तब चुनाव पीछा नहीं छोड़ रहे। राम कह-कह कर अपने सूबे में
सारे चुनाव निपटे तो बिहार चुनाव आ गए। बेचारे प्रधानमंत्री को विदेश यात्राओं से
थोड़ी फुरसत भी न मिली थी कि चुनाव सभाएं गले आ पड़ीं। बिहार में दोनों पक्ष
"पैकेज" को लेकर भिड़ रहे हैं। लाखों करोड़ की बातें हो रही हैं। इधर मोदी जनता को
पांच लाख करोड़ का हिसाब समझा रहे हैं तो उधर नीतीश कुमार अपना गणित बता रहे हैं।
लग रहा मानो चुनाव न हों बजट सत्र चल रहा हो। अब आप ही बताइएगा ऎसे में एक आम आदमी
का दिमाग कैसे सही रह सकता है। उसका दही तो होगा ही।

थोड़ा बाबाओं के चैनल देख
आध्यात्म में तैरने की कोशिश करते हैं तो खबर आती है कि एक देसी डॉन को उसके गुर्गे
ऎसे छुड़ा ले गए जैसे "जौहर-महमूद इन गोवा" फिल्म का कोई हिट दृश्य चल रहा हो। सच
कहें अब इस हाहाकारी समय में हमारा तो मन लगना ही कम हो गया है। क्या करें? उपवास
कर लें। लेकिन हमारे जैसा भुक्खड़ यह भी नहीं कर सकता। वक्त पर रोटी न मिले तो
आंखों में अंधेरा छाने लगता है। करें तो क्या करें। हार कर गाने लगते हैं- ऎ दिल
कहीं ऎसी जगह ले चल जहां कोई न हो। लेकिन ज्ञानी कहते हैं कि जहां कोई नहीं है वहां
भी वह त्रिनेत्री जरूर है।
राही