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दया, अहिंसा, करुणा और प्रेम का महापर्व है चातुर्मास

चातुर्मास महापर्व के दौरान दशलक्षण, रक्षाबंधन, दीपावली, गुरुपूर्णिमा आदि पर्व आते हैं। चातुर्मास का उद्देश्य भी दयाभाव है। वर्षाकाल में जीवों की उत्पत्ति अधिक होती है। इसलिए संत चातुर्मास करते हैं, ताकि हिंसा न हो। साथ ही गृहस्थ और संत को जोडऩे का काम करता है चातुर्मास।

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Patrika Desk

Jul 12, 2022

दया, अहिंसा, करुणा और प्रेम का महापर्व है चातुर्मास

दया, अहिंसा, करुणा और प्रेम का महापर्व है चातुर्मास

पूज्य सागर
जैन संत, धर्म और समाज के विषयों के मार्गदर्शक

चातुर्मास महापुण्य अर्जन करने का साधन है। यह समय अधिक से अधिक 165 दिन और कम से कम 100 दिन का होता है। इसमें संत प्रवचनों के द्वारा आमजन में धार्मिक भावना का प्रसार करते हैं। यह है अध्यात्म का पर्व, आत्म-उत्थान का पर्व, अपने आप को समझने का पर्व। यह दया, अहिंसा, करुणा और प्रेम का महापर्व है। धर्म का मतलब भी यही होता है। चातुर्मास में त्याग, संयम, तप और ध्यान किया जाता है। चातुर्मास महापर्व के दौरान दशलक्षण, रक्षाबंधन, दीपावली, गुरुपूर्णिमा आदि पर्व आते हैं। चातुर्मास का उद्देश्य भी दयाभाव है। वर्षाकाल में जीवों की उत्पत्ति अधिक होती है। इसलिए संत चातुर्मास करते हैं, ताकि हिंसा न हो। साथ ही गृहस्थ और संत को जोडऩे का काम करता है चातुर्मास।
जैन धर्म में चातुर्मास का अत्यधिक महत्व है। जैन धर्म में इसकी शुरुआत आषाड़ शुक्ल चतुर्दशी से शुरू होती है तथा कार्तिक कृष्ण १४ को यह चतुर्मास समाप्त होता है। तीर्थंकर भगवंतों की दिव्य ध्वनि अनुसार मूलाचार में इसका वर्णन किया गया है। मुनियों के लिए विहार को विराम देकर एक स्थान पर स्थिर रहकर साधना करने का प्रावधान है वर्षायोग। इसमें चार माह तक एक ही स्थान पर रहकर साधना करनी होती है। वे साधना से प्राप्त आत्म-अनुभव का ज्ञान बांटते हैं।
हिन्दू धर्म में चार विशेष महीने होते हैं, जिनमें उपवास, व्रत और जप-तप का विशेष महत्त्व होता है। वे महीने हैं सावन, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक। देवशयन एकादशी से ही चातुर्मास की शुरुआत होती है, जो कार्तिक के देव प्रबोधिनी एकादशी तक चलती है। इस समय में श्रीहरि विष्णु योग निद्रा में लीन रहते हैं। इसलिए किसी भी शुभ कार्य को करने की मनाही होती है।
आलस्य, प्रमाद छोड़ो, वरना आलस्य तुम्हारी साधना को समाप्त कर देगा। सावन मास कहता है, संतों से श्रवण करो, श्रम करो, श्रावक बनो। भाद्रपद मास के अनुसार सरल बनें, परिणामों को निर्मल रखें। क्वार, आश्विन मास कहता है यदि आलस्य नहीं छोड़ा, संतों को सुनकर श्रावक नहीं बने, भद्र परिणामी नहीं बने, तो सुख-पुण्य जैसी सभी चीजों से तुम वंचित रह जाओगे। जीवन व्यर्थ चला जाएगा। स्वर्ण अवसर तुम्हारे हाथ में है, उसका सदुपयोग करो। यदि आठ माह कुशल रूप से गुजारना है, तो पुरुषार्थ करो। धर्म से भाग्य बनेगा। भाग्य से अर्थ मिलेगा। अर्थ से काम जगेगा। तीनों तृप्त हों तो मुनि बन साधना करोगे, मोक्ष मिलेगा। तृप्ति से अर्थ है संसार, शरीर भोग से उदास हो जाना, इससे मोक्ष का मार्ग खुल जाता है।
चार मासों में कोई भी मंगल कार्य- जैसे विवाह, नवीन गृहप्रवेश आदि नहीं किया जाता है। इसके पीछे कारण यह है कि आप इस दौरान सिर्फ ईश्वर की पूजा-अर्चना करें। देखा जाए, तो बदलते मौसम में जब शरीर में रोगों का मुकाबला करने की क्षमता यानी प्रतिरोधक शक्ति बेहद कम होती है, तब आध्यात्मिक शक्ति प्राप्ति के लिए व्रत करना, उपवास रखना और ईश्वर की आराधना करना बेहद लाभदायक माना जाता है। चातुर्मास ही एक ऐसा समय है, जब संत एक जगह इतने समय तक रहता है, नहीं तो संत बहती हुई नदी के समान होते हैं। जिस तरह से पाप के बिना पुण्य, रात के बिना दिन, सुख के बिना दुख का अस्तित्व नहीं हो सकता, ठीक उसी प्रकार संत के बिना श्रावक का अस्तित्व नहीं हो सकता। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। देव वंदना, गुरु वंदना, स्वाध्याय-संयम, तप-दान आदि श्रावक की आवश्यक क्रियाएं हैं। ये सभी साधु के बिना नहीं हो सकतीं। श्रावक की आवश्यक क्रिया नहीं होगी, तो वह पुण्य का अर्जन कैसे करेगा? इसलिए चातुर्मास महापुण्य का अर्जन करने का साधन है।

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