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बर्दाश्त के बाहर है यह हैवानियत

इन दिनों बच्चों की हत्याओं और बलात्कार की ऐसी घिनौनी घटनाएं सामने आई हैं जिन्हें देखकर लगता है

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Sunil Sharma

Sep 18, 2017

College degree only in village

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- कैलाश सत्यार्थी, नोबेल शांति पुरस्कार विजेता, बाल अधिकारों के लिए लंबे समय से संघर्षरत

इन दिनों बच्चों की हत्याओं और बलात्कार की ऐसी घिनौनी घटनाएं सामने आई हैं जिन्हें देखकर लगता है कि बच्चों को अपनी हैवानियत का शिकार बनाने वाले दरिंदे तो बेखौफ घूम रहे हैं और पीडि़तजन डर के साये में जीने को मजबूर हैं। क्या उठेगी दरिंदगी के विरुद्ध सशक्त आवाज? क्या इस आवाज से हो सकेगा आसमान में सुराख?

हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं, जहां लगातार बहुत सारे मुद्दों पर चिल्ला-चिल्ला कर बहस होती है। लेकिन, मैंने देखा है कि हम लोग बच्चों के मामलों में सामूहिक रूप से चुप्पी साधे रहते हैं। पिछले कुछ महीनों के दौरान मैं दर्जनों मासूम बच्चों से मिला, जो यौन शोषण जैसी हैवानियत के शिकार हुए थे। मैं उन किशोर बच्चों के परिजनों से मिला हूं, जिनके बच्चों का न केवल बलात्कार किया गया बल्कि उनकी हत्या भी कर दी गई। मैंने उन माताओं-पिताओं को धीरज बंधाने की कोशिश की, जो मानव तस्करों की वजह से अपने बच्चों को खो चुके हैं। उनका दर्द हमारे समाज के लिए केवल एक अभिशाप नहीं है बल्कि इसी पीड़ा ने मुझे यह अहसास कराया कि बाल अधिकारों के लिए मेरा जिंदगीभर का संघर्ष अभी अधूरा है। यही वजह है कि मैंने भारत के बच्चों के भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए फिर से यात्रा करने की ठानी है।

मुझे यह कतई बर्दाश्त नहीं कि बच्चों को अपनी हैवानियत और हवस का शिकार बनाने वाले बेखौफ होकर आजाद घूमें और पीडि़त डर के साये में जीएं। मैं इन बेबस पीडि़तों की आवाज को जन-जन तक पहुंचाने के लिए यह अभियान चला रहा हूं ताकि देश की सोई हुई अंतरात्मा को जगाया जा सके। हमें बाल यौन शोषण का खात्मा करना ही होगा। यह यात्रा बच्चों के खिलाफ होने वाली हिंसा की एक सामूहिक तथा सशक्त आवाज बनेगी। दिल्ली की पांच साल की गुडिय़ा को चार साल पहले उसी के घर के सामने दरिदों ने अपनी हैवानियत का शिकार बनाया था। वह नन्हीं सी जान आज भी उस सदमे से उबरने की कोशिश कर रही है। उसके पिता ने बच्चों के साथ होने वाली यौन हिंसा के खिलाफ हमारी मुहिम को समर्थन देने की शपथ ली है।

कुछ हफ्तों पहले, शिमला के पास रहने वाली एक 16 साल की गुडिय़ा के साथ हैवानों ने स्कूल से लौटते वक्त सामूहिक दुष्कर्म किया और फिर उसकी बर्बरतापूर्वक हत्या कर दी गई। आज उसके पिता अंदर से टूट चुके हैं। लेकिन, इस तरह का घिनौनापन किसी और बच्ची के साथ न हो, उसके लिए वह अब कुछ भी करने को तैयार हैं। इस यात्रा में वे भी मेरे साथ चलेंगे। दुखद और कठोर वास्तविकता यह है कि इस देश में बच्चों का यौन शोषण ‘अनैतिकता की महामारी’ का रूप लेती जा रही है। चाहे वे गरीबी से जूझते झुग्गी-झोपडिय़ों के निवासी हों या दौलतमंद समाज में बसने वाले, यौन शोषण के पीडि़त हर जगह मिलेंगे। यह दरिंदे किसी भी रूप में हो सकते हैं - ड्राइवर, शिक्षक, पड़ोसी या करीबी रिश्तेदार। पूरे देश में अभिभावकों को इस खौफ ने जकड़ा हुआ है। बच्चों को घर आने में देर हो जाए तो उन्हें डर लगने लगता है। इस डर को जड़ से हमें मिटाना होगा। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश में रोजाना करीब 50 बच्चे यौन शोषण का शिकार होते हैं। हकीकत तो यह है कि ये आंकड़े इससे काफी अधिक होंगे क्योंकि डर और सामाजिक वर्जनाओं के कारण अधिकांश मामलों में हमारी बेटियां और बेटे इसकी शिकायत नहीं कर पाते या फिर माता-पिता ही ऐसे पाप को छुपा लेते हैं क्योंकि यौन हिंसा करने वाले ज्यादातर लोग जान-पहचान के ही होते हैं।

मेरी यात्रा का मकसद ऐसे अभिभावकों की आवाज बुलंद करना है। फिर चाहे वे दरिंदे उनके करीबी रिश्तेदार ही क्यों ना हों। खोखले सामाजिक सम्मान और परिवार की इज्जत से कहीं अधिक हमारे ये बच्चे कीमती हैं। एक कड़वी सच्चाई यह है कि कानून अब तक इस महामारी का समाधान नहीं ढूंढ पाया है, जबकि पोक्सो (प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्शुअल ऑफेंसेज एक्ट) कानून 2012 से ही लागू है। हालात ऐसे हैं कि दिल्ली में बच्चों के यौन शोषण के सभी मामले निपटाने में ही 12 वर्ष, महाराष्ट्र में 20 और गुजरात में तो 40 साल भी लग सकते हैं। न्याय में देरी का मतलब सिर्फ अन्याय नहीं बल्कि न्याय की हत्या और बलात्कार करना है। इसीलिए मेरी यह यात्रा इसके विरोध में है। बच्चों के अधिकारों के लिए मैं पिछले 36 सालों से भी अधिक समय से लड़ रहा हूं। इसके लिए मैंने कई यात्राएं भी की हैं।

शुरू-शुरू में तो लगभग सभी मामलों में मुझे, हमारे समाज की बदसूरत वास्तविकताओं का खुलासा करने के लिए लोगों की सनक, उदासीनता और यहां तक की निराशा भी झेलनी पड़ी। इतनी ही नहीं समाज का कुरूप चेहरा सामने लाने के कारण मुझे लोगों की शत्रुता का भी सामना करना पड़ा। लेकिन, जब पीडि़तों ने आवाज उठाने का साहस किया और आम आदमी ने उन्हें अपना समर्थन दिया तो समाज के रवैये में बदलाव आया। जब मैंने 1993 में बाल मजदूरी के खिलाफ बिहार से दिल्ली तक यात्रा शुरू की, तो लगभग पूरा भारत वर्ष उस यात्रा को लेकर संशय में था। जब हमने 1998 में वैश्विक स्तर पर ग्लोबल मार्च अगेंस्ट चाइल्ड लेबर नामक यात्रा की तो तकरीबन पूरी दुनिया अचंभित थी।

बाल मजदूरी सामान्य रूप से एक स्वीकार्य प्रथा थी। लेकिन जब दर्जनों बच्चों ने मेरे साथ जेनेवा में इंटरनेश्नल लेबर ऑर्गनाइजेशन (आईएलओ) के मुख्यालय में घुसकर आवाज उठाई तो पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित हुआ। एक साल के भीतर ही आईएलओ ने बाल मजदूरी के सबसे खराब रूपों पर प्रतिबंध लगा दिया। इससे यह साबित होता है कि कमजोर आवाजों का शक्तिशाली प्रभाव भी हो सकता है।