14 जनवरी 2026,

बुधवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

होम

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

चौपाल का नया रूप

आजादी से पहले 'चौपाल' होती थी अब 'क्लब' बन गए। एक क्लब जिसका नाम 'भेडिय़ा क्लब' था, न जाने क्या सोचकर उन्होंने हमें एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का संयोजक बना दिया

2 min read
Google source verification

image

Shankar Sharma

Jul 07, 2016

opinion news

opinion news


व्यंग्य राही की कलम से
आजादी से पहले 'चौपाल' होती थी अब 'क्लब' बन गए। एक क्लब जिसका नाम 'भेडिय़ा क्लब' था, न जाने क्या सोचकर उन्होंने हमें एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का संयोजक बना दिया। कहने को तो 'अध्यक्षजी' ने तीन पुरुषों और दो-दो स्त्रियों को लेकर कई कमेटियां बनाईं लेकिन ये कमेटियां ऐसी ही थीं जैसी सदनों के सदस्यों की कमेटियां जो खाने-पीने, घूमने और भत्ता लेने का काम बड़ी संजीदगी से करते हैं। खैर हमने भी अपने पुराने ताल्लुकातों की बदौलत सारे इंतजाम कर दिए लेकिन मुख्य कार्यक्रम के दिन तो हमारे दिमाग का दही हो गया।

जिसे देखो वही ससुर हमें काम बताने लगा जैसे हम ईसबगोल की भुस्सी हो, जिसे दस्त न होने पर भी और तेज दस्त हो जाने पर भी लिया जा सके। हमारे कानों में गूंजने लगा- अजी कव्वालों के लिए जर्दे का पान नहीं आया अभी तक,वो गायिका इमरती देवी के सिर में दर्द है, बाजार से सेरीडोन मंगवा दें। ये सारी मालाएं गेंदे की क्यों मंगाई, मंत्रीजी तो सूत की माला ही पहनते हैं। वो नेताजी एक कार्यक्रम में फंसे हैं पौने आठ बजे तक पहुंचेंगे।

अजी कार्ड में सात बजे का लिखा है सवा सात हो गए कार्यक्रम शुरू कराओ ना। संयोजकजी, दो-तीन बोतल तो मंगाओ वरना कवि लोग ढंग से चुटकुले नहीं सुना पाएंगे। हम इतनी सारी फरमाइशें सुन कर लगभग बेहोश होने वाले थे तभी 'भेडिय़ा क्लब' के अध्यक्ष चिल्लाकर बोले- आपने मेरा 'धन्यवाद भाषण' बाद में क्यों रखा है। मैं तो कार्यक्रम की शुरू में धन्यवाद दूंगा आप अपना स्वागत भाषण लास्ट में दे देना।

कसम से यह सुन कर हमें इतना गुस्सा आया कि अपने मुंह पर तौलिया लपेट हॉल में पीछे जाकर बैठ गए और मजे की बात कि हमारे छिपते ही सारी समस्याएं अपने आप हल हो गई। भेडिय़ा क्लब का पहला कार्यक्रम हिट रहा जिसका श्रेय क्लब के अध्यक्ष ने लूटा। हां, हम बेवजह बीस-बाईस हजार की चपेट में आ गए।