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नीति का अर्थ है येन-केन-प्रकारेण अपनी स्वार्थ सिद्धि। इसके लिए किसी का भी अहित होता हो, कर दो। किसी की भी बलि चढ़ानी हो, चढ़ा दो। लोकतंत्र या तानाशाही, मलाई तो सत्ता के साथ रहती है। सारा ताण्डव इसी मलाई के लिए, सारा भ्रष्टाचार भी इसी मलाई के लिए। और यह युगों से होता आ रहा है। जनसेवा के लिए, प्रजापालन के लिए जाना जाने वाला राजतंत्र अन्तत: आसुरी ही प्रमाणित होता है। अत: अंकुश अनिवार्य है। निरंकुशता तंत्र का प्रवाह पतित कर देती है। तब नैतिकता और देश की प्राथमिकताएं रसातल में जाने लगती हैं। शासन ही देश की आत्मा कहलाता है। निर्विरोध (विरोधहीनता) और निरंकुशता ही जनता को त्रस्त और अपमानित करते हैं। स्वयं सत्ता देश से बड़ी बनकर राज करती है।
राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे तीन बड़े प्रदेशों में चुनाव सिर पर हैं। केन्द्र के साथ इन तीनों प्रदेशों में भी भाजपा सत्ता में है। अर्थात जो वोट पड़ेंगे, वे भाजपा के पक्ष या विरोध में पड़ेंगे। ‘पत्रिका’ ने जब बड़ा सर्वे करवाया, जिसमें कुल दो लाख, बासठ हजार लोगों से बात की, सरकारों के कामकाज पर बात की, अजा-जजा प्रकरण पर बात की, जनता के मानस को टटोलने का प्रयास किया तो एक बात बहुत स्पष्ट थी कि किसी भी सरकार को जनता की सुख-दु:ख की अभिव्यक्ति से कोई सरोकार नहीं है।
अत: पहली बार यह तथ्य प्रकट हुआ कि जनता इस बार दलों से ज्यादा अच्छे प्रत्याशी को प्राथमिकता देगी। लगभग एक लाख, बीस हजार (४६ फीसदी) लोगों का यह स्पष्ट मत था। यह किसी भी दल के लिए चिन्ता का विषय नहीं है। मुझे लगा कि ‘पत्रिका’ का चेंजमेकर अभियान जनता के इस चिन्तन में सहयोगी अवश्य होगा। नेतृत्व का अहंकार भी तब प्रतिलक्षित होता है जब लोग वर्तमान नेतृत्व का साथ छोड़ते दिखाई देते हैं। इसी प्रकार अजा-जजा एक्ट मुद्दे पर लोग (५२ फीसदी) नोटा का विकल्प चुनने को तैयार नहीं। वे जानते हैं उनको क्या करना है। प्रसार-प्रचार शायद उनको प्रभावित न कर पाए। सरकारों की अपनी अलग धुन है।
सरकारों को यह भी लगता है कि यदि सरकारी कर्मचारी प्रसन्न रहेंगे तो चुनाव आसानी से जीते जा सकते हैं। वेतन-भत्तों की बरसात होती रहती है। अजा-जजा एक्ट का मुद्दा, आरक्षण का विरोध, यह भी सरकारी सेवाओं के मद्देनजर ही अधिक महत्वपूर्ण है। उदाहरण के तौर पर राजस्थान में आठ लाख कर्मचारी हैं। इनमें अजा-जजा-ओबीसी आधे (करीब चार लाख) हैं। आबादी का लगभग आधा प्रतिशत। और इस कानून की मार पड़ेगी ९९.५ फीसदी आबादी को। सर्वे के आंकड़े इसका प्रमाण हैं। कौन सी मार? ७२ फीसदी सवर्ण मानते हैं कि आरक्षण नहीं होना चाहिए। वहीं ७४ फीसदी आरक्षित वर्ग इसके पक्ष में हैं, किन्तु इनमें भी ५० फीसदी क्रीमीलेयर को आरक्षण देने के पक्ष में नहीं हैं।
क्या आर्थिक स्तर ही जीवन का एकमात्र लक्ष्य होना चाहिए? सामाजिक वैमनस्यता बढ़े और आर्थिक स्तर भी अधिकांश का नहीं बढ़े, तब समाज व्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ेगा? सर्वे में ६४ फीसदी सवर्णों ने और ४५.७१ फीसदी आरक्षित वर्ग के लोगों ने स्वीकार किया है कि आरक्षण ने जातिगत वैमनस्यता बढ़ाई है। ४६.६ फीसदी सवर्ण और ४१.६ फीसदी आरक्षित वर्ग स्वीकारता है कि दोनों के बीच आपसी सम्बन्ध बिगड़े हैं। जीवन की सच्चाई तो यही मानी जाएगी। कानून अपनी जगह होता है। समाज और राष्ट्र सौहार्द से चलते हैं। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का यही तो अर्थ है। सम्बन्ध बिगड़ गए तो सौहार्द लुट जाएगा।
आज न तो सरकार और न ही कानून रोजमर्रा के जीवन में दिखाई पड़ते हैं। इनका साथ छूट गया तो क्या हो सकता है, यह किसी नेता, अधिकारी या न्यायाधीश की चिन्ता का विषय नहीं। आजादी के बाद का इतिहास तो अभी सामने ही है। साम्प्रदायिक दंगों का स्वरूप कौन नहीं जानता? आर्थिक स्तर से मानव का आत्मिक धरातल पोषित नहीं होता। आप चुनाव में होने वाले खर्च को गरीबों में बांटकर देख लें। एक भिखारी को रात में कोई नया कम्बल ओढ़ा दें, तो वह उसे सुबह बाजार में बेच देता है जबकि उसे गरीब मानकर ही लोग धन देते हैं।
आज देश के इतने टुकड़े हो गए, कानून ने भी किए, धर्म-सम्प्रदायों ने भी किए, राजनीति ने भी किए, कि एक ही समुदाय में एक से अधिक धड़े हो गए। एक-दूसरे के सामने तनकर खड़े हैं। राजनेता इसी से प्रसन्न हैं। देश को आज ऐसे संगठनों की आवश्यकता है जो स्वयं राजनीति से बाहर सामाजिक सौहार्द के लिए नए सिरे से वातावरण तैयार करे। ‘मुंह में राम, बगल में छुरी’ वाले वातावरण से मुक्ति दिला सके। अभी तो कोई दिखाई नहीं पड़ता। सम्पन्न वर्ग चाहे तो इसकी शुरुआत कर सकता है। वह गरीब परिवारों के एक-एक व्यक्ति को ऊपर उठाने की जिम्मेदारी ले सकता है। युवा चाहें तो देश को नेतृत्व दे सकते हैं, क्रान्ति ला सकते हैं। वरना तो विष्णु के दसवें अवतार ‘कल्कि’ के आने की ही प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। तब तक क्या यह देश हमारे हाथ में रह पाएगा?

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