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संदर्भ: सबरीमला प्रकरण- आचरण, निष्ठा और पवित्रता

संदर्भ: सबरीमला प्रकरण - लौकिक व्यवहार सभी देश, काल और पात्रगत अवस्थाओं की मर्यादा में होते हैं, जो कभी समान नहीं हो सकते हैं। दृष्टि का सम्बन्ध आत्मा से है, भीतर से है और वही समान हो सकती है। यह पूर्णत: वैज्ञानिक उत्पत्ति है। यही वैज्ञानिक दृष्टि दुर्भाग्य से आज लुप्त है।

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sabarimala context

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पत्रिका समूह के संस्थापक कर्पूर चन्द्र कुलिश की पुस्तक 'वेद विज्ञान' से।

वर्ण व्यवस्था से भी अधिक गूढ़ विज्ञान आशौच का है। आशौच पर वेद विज्ञान में विस्तार से प्रकाश डाला गया है। वेद-विज्ञान का आधार समदर्शन-विषम वर्तन है। वर्तमान में कितने ही विवादों का आधार तो यह सिद्धांत ही है। अभी जितने भी राजनीतिक, आर्थिक या सामाजिक सिद्धांत प्रचलित हैं, उन सबका आधार व्यवहार की समानता है, जिससे वेद-विज्ञान का सीधा टकराव हो जाता है। वेद की यह निश्चित मान्यता है कि समानता केवल दृष्टि में ही संभव है। व्यवहार में समानता संभव नहीं। हम जितने भी व्यवहार करते हैं, वे लौकिक आधार पर होते हैं।

लौकिक व्यवहार सभी देश, काल और पात्रगत अवस्थाओं की मर्यादा में होते हैं, जो कभी समान नहीं हो सकते। दृष्टि का सम्बन्ध आत्मा से है, भीतर से है और वही समान हो सकती है। यह पूर्णत: वैज्ञानिक उत्पत्ति है। यही वैज्ञानिक दृष्टि दुर्भाग्य से आज लुप्त है। प्रकारान्तर में जिस आशौच की चर्चा की जा रही है, उसका सम्बन्ध सृष्टि के, अन्त: शरीर रचना के मूलभूत तत्त्वों से है। सृष्टि की रचना में दो प्रमुख तत्त्व अग्नि और सोम का उल्लेख बार-बार हुआ है। इन दोनों का उद्भव परमेष्ठिलोक है। यही सूर्य और असुर प्राणों का उद्भव है। अग्नि और सोम के बीच एक योजक प्राण और है जो इसी परमेष्ठिलोक से उद्भूत है। यह प्राण, अग्नि और सोम के मिश्रण से उत्पन्न नए भाव को पदार्थ स्वरूप प्रदान करता है। इस प्राण को अत्रि प्राण कहते हैं।

शरीर में अत्रि प्राण की यही भूमिका है। स्त्री के शोणित से इस प्राण का अन्तर्याम सम्बन्ध होता है। संतानोत्पत्ति में शुक्र-शोणित का मुख्य योग रहता है। यह वैज्ञानिक सत्य है कि अत्रि प्राण के बिना शुक्र शोणित मिलकर भी गर्भ का रूप धारण नहीं कर सकते। शोणित में शुक्र आहुत होता है, परंतु वह तभी संभव है जबकि शुक्र को धारण करने वाला अत्रि प्राण विद्यमान हो। एक अन्य राक्षस प्राण शोणित में आहुत शुक्र की रक्षा करता है। असुरों के सम्बन्ध में हमारी पौराणिक धारणा अलग तरह की है, परंतु उनका वैज्ञानिक स्वरूप सर्वथा भिन्न है।

उदाहरण के लिए, राक्षस, पिशाचादि प्राणों को देखें। राक्षस प्राण की प्रतिष्ठा रुधिर है तो पिशाच प्राण मांस का निर्माण करते हैं। जिस स्त्री के शरीर में राक्षस प्राण शिथिल हो जाता है वह गर्भ धारण करने में असमर्थ हो जाती है। जिस शरीर में पिशाच प्राण क्षीण हो जाता है, वह सूखा रोग से ग्रस्त हो जाता है। ऐसी ही भूमिका अत्रि प्राण की है। यह प्राण मुख्यत: स्त्री के रज में होता है जो आगे जाकर जन्माशौच एवं ऋतुकाल शौच का कारण बनता है। अत्रि प्राण स्त्री के शोणित में अन्तर्याम सम्बन्ध से रहता है। दिन-प्रतिदिन शोणित के प्रवाह के साथ-साथ अत्रि प्राण दग्ध होता रहता है और नियतकाल में प्रतिमास शरीर से बाहर निकलता रहता है।

अत्रि प्राण स्वभावत: ज्योति का अवरोधक है। इसी स्वभाव के कारण वह शुक्र-शोणित से उत्पन्न चेतन को स्थूल गर्भ का रूप प्रदान करने में समर्थ होता है। यही निरंतर दग्ध होता हुआ प्रति मास दग्ध रज के रूप में स्त्री शरीर से बाहर निकलता रहता है। इसे रुधिर का मल भी कहा जा सकता है, इसीलिए इसे मलीमस की संज्ञा दी गई है। इसी के कारण स्त्री को प्रतिमास चार दिन रजस्वला कहा जाता है। इसी के सम्बन्ध से स्त्री को आत्रि भी कहा जाता है। चूंकि अत्रि प्राण ज्योति का अवरोधक है, सौर प्राणों का विरोधी है, इससे आक्रान्त स्त्री शरीर को चार दिन अस्पृश्य माना गया है। यह अत्रि प्राण की स्वभावगत वैज्ञानिक आवश्यकता है। अत्रि प्राण के संक्रमण से बचने के लिए ही इस आशौच का प्रादुर्भाव किया गया है। इसके तात्त्विक स्वरूप को न जानकर हम इसे हेय समझने लगे हैं। बहुत लोग इस तात्त्विक अर्थ को न जानकर इस आशौच की उपेक्षा करते हैं।

वस्तुस्थिति तो यह है कि अत्रि प्राण का महत्त्व एक बीज को शरीर रूप देने में है तो दूसरी ओर वह आशौच भी उत्पन्न करता है। यह भी वैज्ञानिक तथ्य है कि जिन चार दिनों में स्त्री शरीर अत्रि प्राण के निर्गमन से अत्यधिक आक्रान्त हो जाता है, उन दिनों उसकी शारीरिक-मानसिक अवस्था शिथिल भी रहती है। अत्रि प्राण एक अन्य रूप में भी शरीर में प्रकट होता है और वह 'माताÓ के रूप में प्रकट होता है। जिसे हम शीतला माता के रूप में जानते हैं, वह अत्रि प्राण की ही महिमा है। स्त्री रज में अन्तर्याम सम्बन्ध से प्रविष्ट अत्रि प्राण जब अपत्य (संतान) में भी प्रविष्ट हो जाता है तो वह 'माता' के रूप में प्रस्फुटित हो जाता है।

प्रसंगवश यह भी जान लिया जाए कि इस रोग को शीतला माता क्यों कहा जाता है। माता रोग का कारण स्त्री रज का मलिन रज है। मलिन रज अग्नि रहित, मृत, दग्ध या उच्छिष्ट तत्त्व है। अत: वह शीत है। इधर इस रोग का समय भी वसंतोत्तर दिनों में होता है। वसंत के बाद शीत प्रधान सोम उत्तरोत्तर क्षीण होने लगता है और अग्नि की मात्रा बढऩे लगती है। प्राय: इन्हीं दिनों शीतला माता का प्रकोप होता है। इन्हीं दिनों शीतलाष्टमी पर माता पूजने का पर्व भी मनाया जाता है। इस अवसर पर खाना-पीना भी ठण्डा होता है। आज इस रोग की रोकथाम के अन्य उपाय भी उपलब्ध हैं। परंतु इसका उपाय मुख्यत: शीतल पदार्थ सेवन ही माना गया है।

अग्नि रहित मलिन कीटाणुओं के संक्रमण से ही रासभ तत्त्व का उद्भव होता है। यह अनुष्ण, अरस तत्त्व है। पशुओं में यह तत्त्व गर्दभ या रासभ में प्रभूत मात्रा में होता है। इसी से रासभ के लिए शतपथ ब्राह्मण में कहा गया है द्ग 'यदरसदिव स रासभोऽभवत्'। गर्दभ को पशुओं में शूद्र कहा गया है द्ग 'शूद्रंचानुरासभ:'। यह पशु इतना अनुष्ण या जड़ भावोपन्न होता है कि प्रचण्ड गर्मी भी इसे व्याप्त नहीं होती। परिहास में इसे वैशाखनन्दन भी कदाचित् इसीलिए कहा जाता है। मादा गर्दभ का दूध भी अतीव शीतल माना गया है। कदाचित् इसीलिए नैदानिक रूप में गर्दभ को शीतला माता का वाहन बनाया गया है। शीतला माता को सौम्य शक्ति का प्रतीक भी इसीलिए कहा गया है क्योंकि सौमगत तत्त्व ही शक्ति तत्त्व है और अग्निगत तत्त्व ही रुद्र तत्त्व है। 'माता' रोग से उत्पन्न अशुचि के निवारण के लिए जब दूसरे उपाय नहीं थे, इन्हीं उपायों का आश्रय लिया गया। यह तो आज भी सत्य है कि शीत-प्रधान उपचार ही प्रभावशाली उपचार है। निदान और उपचार के तत्त्व आज भी वही हैं, उपकरण अवश्य बदल गए हैं। माता के निरोध में आज हमें बहुत कुछ सफलता प्राप्त हो गई है।
अत्रि प्राण से उत्पन्न आशौच का एक अन्य रूप हमारे सामने है। सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण के समय जब ज्योति क्षीण हो जाती है तो अत्रि प्राण सर्वत्र उत्कर्ष पर होता है। चृूंकि यह प्राण ज्योति का अवरोधक है, अत: इसकी व्याप्ति होने पर हमें सौर प्राण सीधे रूप में अथवा चन्द्रमा के माध्यम से प्राप्त नहीं होते। ऐसी दशा में भोजनादि कर्म करने का निषेध किया है। इसीलिए दृष्टि दोष की आशंका भी प्रकट की गई है। ग्रहण के समय जो आशौच माना गया है, वह अत्रि प्राणों के प्रभाव से बचने के लिए ही माना गया है।

अत्रि प्राण की तरह अघ नामक एक अन्य तत्त्व भी महत् तत्त्व के साथ संलग्न रहता है। महत् या महान् तत्त्व ही प्राणियों के बीच का प्रवर्तक है और सर्वत्र व्याप्त है। सृष्टि का कोई भी अंश इसके बिना नहीं बन सकता। यह तत्त्व चंद्रगत पितर प्राणों के माध्यम से अन्न में होता हुआ शुक्र में प्रविष्ट होता है। तदनन्तर यह संतानोत्पत्ति का कारक बनता है।

महान् में निरन्तर मल रूप अघ का निर्माण होता रहता है। एक प्रकार से महान् के साथ अन्तर्याम सम्बन्ध रहता है। अघ भी अत्रि की भांति दोषयुक्त प्राण है। 'अ' अभ्युदय का वाचक है और 'घ' घातक अथवा घालक है। अभ्युदय का घातक होने के कारण ही इसे 'अघ' माना गया है। यह जन्म-मरण दोनों में प्रभाव रखता है। इसी कारण जन्माशौच एवं शावशौच या मरणाशौच उत्पन्न होता है। इसमें घर वालों, कंधा देने वालों और अंत्येष्टि क्रिया करने वालों के आशौच का भिन्न-भिन्न अर्थ होता है।

जन्माशौच को हमारे यहां सूतिकाशौच भी कहा जाता है। जन्माशौच एवं शावाशौच दोनों ही अघाशौच समान रूप से व्याप्त रहता है। सपिण्ड सम्बन्धों के कारण भी आशौच माना गया है और मल प्रभाव के कारण भी। जन्म के समय माता के गर्भ से उत्पन्न कितने मलयुक्त द्रव्यों के कारण घर में आशौच उत्पन्न होता है और माता का शरीर भी आशौच पूर्ण रहता है। हमारे यहां सद्य: प्रसूता को दस दिन स्नान से वंचित रखा जाता है। अत: उसके स्पर्श से भी आशौच उत्पन्न होता है। सपिण्ड सम्बन्ध के कारण पिता और उसकी अन्य संतानों में भी आशौच माना जाता है।

पिण्ड की उपस्थिति हमारे यहां सातवीं पीढ़ी तक मानी जाती है। सूतिकाशौच में एक महत्त्वपूर्ण क्रिया यह मानी गई है कि यह आशौच नालच्छेद के बाद ही उत्पन्न होता है। नालच्छेद पर्यन्त सद्य: प्रसूत शिशु माता के शरीर का ही अंग बना रहता है। उसका स्वतंत्र अस्तित्व नालच्छेद के बाद ही बनता है। वैज्ञानिकों के लिए यह गहन स्वाध्याय का विषय है। आशौच का यही सिद्धांत मरणावस्था पर लागू होता है। जन्म और मरण दोनों ही अवस्थाओं में उत्पन्न आशौच के कई पहलुओं पर हमारे यहां भिन्न-भिन्न अवधियां और सम्बन्ध निर्धारित हैं। पिण्डगत आशौच के अतिरिक्त मल तत्त्वों के कारण आशौच अन्य देशों में भी माना जाता है। परन्तु आशौच के कई रूप हमारे यहां विशिष्ट हैं। पिण्डगत आशौच ऐसा ही आशौच है। अत्रि और अघ मूलक आशौच भी केवल हमारे यहीं माना जाता है, जिसका स्पष्ट वैज्ञानिक आधार बताया गया है।

भिन्न-भिन्न प्रकार के आशौच का स्वरूप पं. मोतीलाल शास्त्री ने अपने सापिण्ड्य विज्ञानोपनिषद् में विस्तार से बताया है। आशौच के विशोधन के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार के संस्कार भी बताए गए हैं, जिनमें से कुछेक उदाहरण हैं। द्रव्य शुद्धि संस्कार, शरीर शुद्धि संस्कार, भाव शुद्धि संस्कार, अघ शुद्धि संस्कार आदि अलग-अलग आशौच के लिए अलग-अलग नाम बताए गए हैं। यथा: आशौच, पाप, अभिनिवेश, अपवित्रता और अशुद्धि। व्यापक अर्थों में सभी आशौच हैं, परन्तु रूढिग़त अर्थों में सभी शब्दों के अलग अर्थ हैं।
सम्पूर्ण आशौच विज्ञान का सम्बन्ध आचार निष्ठा से है। इसका जितना विस्तार हमारे शास्त्रों में मिलता है, शायद ही अन्यत्र कहीं मिलता हो और आचार निष्ठा का लोप भी जैसा हमारे समाज में हुआ है, कहीं नहीं हुआ। कहने को भले ही कहा गया है
द्ग 'आचार: परमो धम्र्म: शरीरमाद्यं
खलु धम्र्म साधनम्'।