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सिनेमा में दिखाई जा रही असामान्य हिंसा के हो सकते हैं दुष्परिणाम

परदे पर दिख रही हिंसा को हम निरपेक्ष भाव से ग्रहण करते हैं। आज भले ही हिंसा की पूरी प्रक्रिया वाले दृश्य हमें आनन्दित नहीं करते, लेकिन हम उस वक्त की कल्पना करके बेचैन हो सकते हैं, जब ऐसे दृश्य हमें आनन्दित करने लगेंगे।

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विनोद अनुपम
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त कला समीक्षक
हिंदी सिनेमा में हिंसा का स्वरूप ऐसा नहीं था, जैसा आज दिखाई दे रहा है। समय और तकनीक ने जहां इसकी प्रस्तुति बदली, वहीं इसका प्रभाव भी बदला। सिनेमा को पता है हमें हर बार थोड़ा ज्यादा चाहिए। जहां तक के लिए हमारा मानस कंडीशन्ड हो चुका है, उसे तोडऩे के लिए उसे उससे ज्यादा डिटेल्स दिखाने की जरूरत पड़ती है, थोड़ा और वीभत्स।
हाल ही में आई फिल्म 'किल' की यही विशेषता बताई गई है कि यह हिंदी की सबसे हिंसक फिल्म है। इस फिल्म में आस-पास उपलब्ध शायद ही कोई वस्तु होगी जिसका किसी की हत्या के लिए प्रयोग नहीं हुआ हो। यहां सिर्फ हत्या नहीं दिखाई जाती, हत्या की पूरी प्रक्रिया दिखाई जाती है। फिल्म में एक संवाद भी है,'ऐसे भी कोई किसी को मारता है क्या, तुम आदमी नहीं राक्षस हो राक्षस'। हत्या का ऐसा ही राक्षसी स्वरूप 'मिर्जापुर' के तीसरे सीजन में दिखा।'एनिमल' तो खैर एनिमल की कथा ही थी। ये तो कुछेक उदाहरण हैं, परदे पर हिंसा का असामान्य रूप दिखाने की परम्परा बढ़ती जा रही है।
दारा सिंह और शेख मुख्तार के फिल्मों की एक्शन दृश्यों की याद हमें भले ही न हों, धर्मेन्द्र-अमिताभ बच्चन की फिल्मों के एक्शन दृश्यों की याद तो बार-बार ताजा होती ही रहती है। इन दृश्यों के दौरान संगीतकारों के वाद्य यंत्रों से निकली ढिशुम-ढिशुम की आवाज लोगों को याद होगी। नायक के एक ढिशुम पर दस-दस गुंडे धाराशायी होते नजर आते थे। वाकई आनन्द आता था, तालियां बजाते दर्शक उत्तेजना में अपनी-अपनी सीटों पर खड़े हो जाते थे। मुकाबले लगातार होते रहते थे और परदे पर खून का कतरा भी नहीं दिखता था। एक तरफ गोलियां चलती थीं, दूसरी तरफ गुण्डे गिरते दिखाई देते थे, कभी कुछ खून दिखता था, कभी नहीं भी। देव आनन्द अपने बड़े से बड़े मिशन को अपने थप्पड़ों के सहारे अंजाम तक पहुंचा देते थे। ऐसे एक्शन किसी न किसी तरह हमें आनन्दित करते थे, लेकिन आतंकित नहीं।
वीएफएक्स, सिनेमेटोग्राफी और साउंड की बेहतर तकनीक ने हिंदी सिनेमा को अब इतना समृद्ध कर दिया है कि हिंसा की घटना को अब सिर्फ हम देख ही नहीं रहे होते हैं, बल्कि महसूस भी कर रहे होते हैं। कह सकते हैं कि समाज में जब इतनी हिंसा है तो सिनेमा को उससे कब तक बचा कर रख सकते हैं? वाकई नहीं रख सकते, लेकिन बाकी दृश्यों के यथार्थ चित्रण और हिंसक दृश्यों के यथार्थ चित्रण के प्रभाव में फर्क है। समाज में हिंसक घटनाएं घट रही हंै, हम सुनते हैं, जानते हैं, चिंतित होते हैं, हम मुखर हो सकें या नहीं, लेकिन मन में विरोध की एक भावना तो आती ही है, व्यक्ति सोचता है कि यदि सामने ऐसी घटना हो रही होती तो मैं विरोध करता। परदे पर दिख रही हिंसा को हम निरपेक्ष भाव से ग्रहण करते हैं। आज भले ही हिंसा की पूरी प्रक्रिया वाले दृश्य हमें आनन्दित नहीं करते, लेकिन हम उस वक्त की कल्पना करके बेचैन हो सकते हैं, जब ऐसे दृश्य हमें आनन्दित करने लगेंगे।