
प्रो. आर.एन. त्रिपाठी
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी में समाजशास्त्र के प्रोफेसर और उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के सदस्य
किसी भी समाज में जब हम उसके सामाजिक विघटन के मूल तत्वों की तरफ देखते हैं तो इसमें मुख्य वैयक्तिक विघटन होता है। आज व्यक्ति में विभिन्न तरीकों से उसके व्यक्तित्व का क्षरण हो रहा है। इन सबमें सबसे बड़ा क्षरण मादक द्रव्यों के व्यसन से हो रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन इसी को देखते हुए 26 जून को 'नशा मुक्त संसार' का नारा दे रहा है तथा इस बार उसकी मुख्य थीम है कि 'सबूत स्पष्ट हैं, रोकथाम में निवेश करें।' अंतरराष्ट्रीय 'नशा निषेध दिवस' इसलिए मनाया जा रहा है ताकि नशा मुक्त विश्व बन सके और नशे की तस्करी बंद हो सके। अंतरराष्ट्रीय नशा निषेध दिवस पूरे विश्व में मनाया जाना चाहिए, 1987 के दिसंबर माह में संयुक्त राष्ट्र महासभा में इसका जिक्र किया गया था। नशीली पदार्थों और उनकी गैर कानूनी तस्करी के विरुद्ध हर साल 26 जून को अंतरराष्ट्रीय नशा निषेध दिवस मनाया जाना चाहिए, इसका आह्वान किया गया था। इसके बाद पहला अंतरराष्ट्रीय नशा निषेध दिवस 26 जून 1989 को मनाया गया। इसका मुख्य उद्देश्य नशीले पदार्थों के सेवन से होने वाली हानि से लोगों को अवगत कराना और उनकी गैरकानूनी तस्करी का विरोध करना था। अब इस दिन हर वर्ष विश्वभर में नशे के खिलाफ जागरूकता से जुड़े कार्यक्रम किए जाते हैं।
सामाजिक तौर पर विश्लेषण करें तो देखेंगे यह अवगुण हर वर्ग में बढ़ता ही चला जा रहा है। इतना ही नही सामाजिक परंपराओं की तरह व्यसनी व्यक्ति इसे पीढ़ी दर पीढ़ी आगे भी बढ़ा रहे हैं। इसका परिणाम यह है कि नई पीढ़ी के जिस व्यक्ति को समाज के लिए नवाचार करना चाहिए था, वह पुरानी पीढ़ी के किसी व्यसनी व्यक्ति से जुड़कर इस दलदल में फंस जाता है। तकनीकी और मेडिकल शिक्षा से जुड़े बड़े-बड़े संस्थानों में भी कई विद्यार्थी नशे में लिप्त नजर आते हैं। व्यसन पहले व्यक्ति के व्यक्तित्व को तोड़ता है। फिर वह सामाजिक ताने-बाने को तोड़ता है, संस्था और परिवार को तोड़ता है। इसके बाद प्रदेश और देश को नुकसान पहुंचाता है।
नशे की गिरफ्त में आए व्यक्ति अपना एक अलग समाज बना लेते हैं, व्यसनी सामाजिक झंझावात से मुक्ति नशे में खोजता हैै। नशाखोरी की समस्या किसी एक राष्ट्र या देश प्रदेश तक सीमित नहीं है, बल्कि विश्वव्यापी है। इसके पीछे के कारणों की चर्चा करें तो बात स्पष्ट हो जाता है कि नशे की तस्करी और बिक्री का बहुत ही लाभकारी व्यापार है। सीमित समय तथा अल्प संसाधन से व्यक्ति खूब पैसा बना लेता है। इसलिए मादक द्रव्य की तस्करी में बड़े-बड़े पूंजीपति तथा ऊंचे तबके के लोग भी शामिल हैं। साथ ही नितांत गरीब तथा बेरोजगार युवा भी पैसा कमाने के लिए इस तरह के अपराध में लिप्त हो जाते हैं। संयुक्त राष्ट्र व्यसन की परिभाषा में कहता है कि जिसकी लत लग जाए वही नशा है। अवैध नशीली दवाएं संपन्न-विपन्न व्यक्ति दोनों प्रयोग कर रहे हंै। संपन्न वर्ग में नशे के लिए हेरोइन, चरस, इंजेक्शन, सर्प विष, नशीली दवाइयों का प्रयोग बढ़ रहा है। गरीब तबका गांजा, अफीम, देशी शराब जैसे नशे का इस्तेमाल ज्यादा करता है। भारत की समुद्री सीमा कई देशों से लगी हुई है। पड़ोस के कुछ देशों में मादक द्रव्यों की तस्करी के लिए माहौल है। इस हालत में भारत के लिए नशे के अवैध व्यापार को रोकना बड़ी चुनौती है।
लोगों को नशे की गिरफ्त से बचाने के लिए हमें वैयक्तिक और सामाजिक स्तर पर काउंसलिंग की आवश्यकता है। समाज का जो प्रबुद्ध वर्ग है, उसका दायित्व बनता है कि वह समाज के प्रति विशेष चेतन हो और आगे आए। नवयुवकों में फैशन और दिखावे के कारण भी नशे की प्रवृत्ति बढ़ रही है। इसको रोकना चाहिए, उन्हें समझाना होगा। परिवार, मनोवैज्ञानिक सलाहकार, डॉक्टर, अध्यापक, सभी लोगों को एक साथ समन्वय टीम बनाकर व्यसनी व्यक्ति तक पहुंचना होगा। मानवाधिकार संगठनों, जागरूकता में लगी संस्थाओं, कानूनविदों, समाजशास्त्रियों, धर्मगुरुओं को भी आगे आना होगा। कानूनी तौर पर दुकानों के निरीक्षण, डॉक्टरी पर्चों का हिसाब, आधार कार्ड पर ही नशे वाली दवाइयों की खरीद-फरोख्त, सीसीटीवी कैमरों के विस्तार, समय-समय पर ड्रग पॉलिसी में परिवर्तन करने जैसे कदम उठाकर इस समस्या पर प्रहार किया जा सकता है।
विकसित भारत के लक्ष्य को या विकसित विश्व के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए नशे से मुक्ति आवश्यक है। समय रहते अगर इस समस्या पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया तो यह समस्या दिन दूनी रात चौगुनी बड़ी होती जाएगी। अपने अगल-बगल के जो भी व्यक्ति नशे की गिरफ्त में हैं, उनको इससे मुक्त कराने के लिए सभी को प्रयास करना चाहिए। विकसित भारत का लक्ष्य पाने के लिए यह शुरुआत जरूरी है।
Published on:
26 Jun 2024 06:56 pm
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