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प्रत्यक्ष : संग्राम

पितामह को मनाना आवश्यक है। द्रोण तो वहीं होंगे, जहां भीष्म हैं। दुर्वासा को भी तो मनाया ही था। सोच लंूगा कि एक बार फिर से वही व्यायाम कर रहा हूं।Ó 'पर अंगराज कर्ण को क्या हुआ है?Ó दु:शासन बोला, 'कहीं ये प्रधान सेनापति न बनाए जाने के कारण तो रुष्ट नहीं हैं?Ó 

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Moti ram

Jul 07, 2015

पितामह को मनाना आवश्यक है। द्रोण तो वहीं होंगे, जहां भीष्म हैं। दुर्वासा को भी तो मनाया ही था। सोच लंूगा कि एक बार फिर से वही व्यायाम कर रहा हूं।Ó 'पर अंगराज कर्ण को क्या हुआ है?Ó दु:शासन बोला, 'कहीं ये प्रधान सेनापति न बनाए जाने के कारण तो रुष्ट नहीं हैं?Ó

'नहीं!Ó कर्ण ने हंसने का प्रयत्न किया, 'मैं तो अभी कृष्ण में ही उलझा हूं। उन्होंने क्या किया कि हस्तिनापुर के सारे कुलवृद्ध तक एक ही वाणी बोलने लगे और सब ने युवराज को राज्य पांडवों को दे देने का उपदेश दे दिया। तुम्हें नहीं लगता कि कृष्ण का वह प्रचंड रूप देखकर कोई भी डर सकता है। वस्तुत: उन्होंने सारे हस्तिनापुर को डरा दिया है।Ó

मैं तो नहीं डरा।Ó दुर्योधन निर्भीक स्वर में बोला, 'यदि मैं डर गया होता तो मैं उसे बंदी करने की बात कैसे सोचता?Ó 'तुम डरे नहीं क्योंकि तुम अचेत हो गए थे। तुमने देखा ही नहीं कि कृष्ण का क्रोध कैसा था।Ó'अरे, एक मनुष्य का क्रोध हो ही कैसा सकता है।Ó

दुर्योधन बोला, 'भीम से अधिक भयंकर था क्या वह?Ó 'हां युवराज!Ó दु:शासन बोला, 'भीम क्रुद्ध होता है तो लगता है कि एक व्यक्ति क्रुद्ध हुआ है, कृष्ण क्रुद्ध होता है तो लगता है कि प्रकृति ही क्रुद्ध हो गई है। भीम का क्रोध आंखें देखती हैं और शरीर डरता है, कृष्ण का क्रोध तो मन देखता है और आत्मा डर जाती है।Ó 'यह भी किसी आश्रम में जाने की तैयारी में है।Ó

दुर्योधन हंसा, 'युद्ध में कृष्ण को सामने देखकर भाग तो नहीं जाओगे?Ó'उसके हाथ में सुदर्शन देख लूं तो कदाचित् भाग ही जाऊं।Ó दु:शासन के चेहरे पर सचमुच त्रास था, 'पर उसने तो युद्ध में शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा की है न! इसलिए पलायन की कोई संभावना नहीं है।Ó

'अच्छा अब तुम जाओ और सेनाओं के प्रस्थान का प्रबंध करो।Ó दुर्योधन बोला, 'तुम ठहरो अंगराज!Ó दुर्योधन का अभिप्राय समझकर दु:शासन और शकुनि उठकर चले गए। 'कहो, क्या हुआ है।Ó दुर्योधन ने उसकी ओर देखा।

'होना क्या है।Ó कर्ण हंसा, 'जीवन में न जाने कब किसकी आंख खुल जाए और उसकी समझ में आए कि उसने जब अपने जीवन की दिशा निश्चित की थी, तब वह कितना अज्ञानी था। पर जीवन जी चुकने के पश्चात् न तो अपनी की जा चुकी यात्रा में संशोधन किया जा सकता है,न उसे फिर से आरंभ किया जा सकता है।Ó
दुर्योधन उसकी ओर देखता रहा और सोचता रहा।

क्या यह अपनी पत्नी से इतना दुखी है कि सोच रहा है कि उसने विवाह ही न किया होता तो यह अधिक सुखी रहता? यही जीवन पुन: एक बार जीने को मिले और फिर से विवाह करने का अवसर आए तो यह वृषाली से विवाह नहीं करेगा? संभव है, यह झगड़ा वृषाली से न हो, किसी और पत्नी अथवा उपपत्नी से हो।

पर वह इस चिंता को छोड़ क्यों नहीं देता? जो पत्नी अधिक प्रिय हो, उसके साथ समय बिताए। जो अप्रिय लगने लगी हो, उससे दूर रहे। न जाए उसके पास। कोई भी प्रिय न लगती हो तो और विवाह कर ले। पत्नियों से न पटती हो तो गणिकाएं हैं, रक्षिताएं हैं, दासियां हैं।

इसमें इस प्रकार मेढक का सा चेहरा बनाए रखने की क्या आवश्यकता है. 'तुम अपनी पत्नियों की चिंता छोड़कर युद्ध के विषय में क्यों नहीं सोचते? पत्नियों का महत्त्व मैं समझता हूं, किंतु युद्ध उससे अधिक महत्त्वपूर्ण है।Ó दुर्योधन ने उसे समझाने का प्रयत्न किया।

'कौन-सी पत्नियां?Ó कर्ण कुछ अटपटा कर बोला, किंतु वह तत्काल ही दुर्योधन की बात समझ गया। अच्छा है कि यह वही मानता रहे, उसने सोचा और बोला, 'युद्ध की ही बात सोचता हूं। जीवन भी तो एक संग्राम ही है।

युद्ध के शस्त्रों और व्यूहों के विषय में मनुष्य सोचता है तो जीवन के शस्त्रों और व्यूहों के विषय में भी सोचना पड़ता है। सैन्य संधियों के समान अपने जीवन में भी तो अपने मित्रों और शत्रुओं का चुनाव करते हैं। मैं तो एक व्यापक युद्ध की बात सोच रहा हूं।Ó

'तुम उसे कितना भी व्यापक युद्ध बना लो, रहेगा वह रति-युद्ध के अवरोध के भीतर ही।Ó दुर्योधन मुस्कराया, 'अपनी पत्नियों के विषय में सोचने से तो अच्छा है कि तुम पांडवों के विषय में ही सोचो। उनसे कैसे मुक्ति पाई जाए।Ó

'ठीक कहते हो मित्र!Ó कर्ण बोला, 'बड़ी समस्या तो पांडवों से मुक्ति की है, पत्नियों का क्या है। जब तक नहीं मिलती, तब तक पुरुष उसे पाने के लिए तड़पता है। मिल जाए तो उससे मुक्त होने को व्यग्र रहता है। हम पांडवों को पाने को तो नहीं तड़पे थे। वे ही बार-बार आकर हमारे कंठ में लटक जाते हैं। उनसे तो मुक्ति ही चाहिए।Ó

दुर्योधन संतुष्ट हो गया... कोई बहुत गंभीर बात नहीं लगती थी। 'पर यह कृष्ण!...Ó 'उसकी चिंता तुम मत करो। उसे मैं संभाल लूंगा।Ó दुर्योधन बोला और उठ खड़ा हुआ।

क्रमश: - नरेन्द्र कोहली