
Nuclear Weapons Prohibition Treaty
एन.के. सोमानी, (अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार)
परमाणु हथियारों के घातक प्रभाव से दुनिया को बचाने तथा उनके परीक्षण, उत्पादन, भंडारण, उपयोग व स्थानांतरण पर रोक लगाने के लिए दुनिया की पहली संधि संयुक्त राष्ट्र से अनुमोदित होने के बाद लागू हो गई है। न्यूक्लियर डील को लेकर ईरान तथा अमरीका के बीच चल रही तनातनी के माहौल में एक ओर इस वैश्विक संधि का अस्तित्व में आना काफी अहम माना जा रहा है, तो संधि का विरोध कर रहे देशों को कहना है कि संधि अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा माहौल की हकीकत से कोसों दूर है।
इन देशों का मानना है कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा अनुमोदित संधि के जरिए परमाणु निरस्त्रीकरण पर एक व्यापक विश्व व्यवस्था कायम नहीं की जा सकती, क्योंकि संधि में ईरान व उत्तर कोरिया जैसे देशों के परमाणु कार्यक्रम को लेकर कोई समाधान पेश नहीं किया गया है। इन राष्ट्रों का यह भी तर्क है कि जब परमाणु हथियारों पर नियंत्रण के लिए परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) 1970 से प्रभावी है, तो नई संधि की आवश्यकता क्यों महसूस हुई। दूसरी ओर, भारत का कहना है कि जिनेवा स्थित निरस्त्रीकरण पर सम्मेलन (सीडी) निरस्त्रीकरण पर चर्चा के लिए एकमात्र बहुपक्षीय मंच है, तथा परमाणु हथियारों पर समग्र सम्मेलन (सीएनडब्ल्यूसी) में प्रतिबंध और विलोपन के अलावा सत्यापन भी शामिल है। परमाणु हथियारों के वैश्विक विलोपन के लिए अंतरराष्ट्रीय सत्यापन को जरूरी बनाया जाना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र की हाल ही लागू संधि में सत्यापन के पहलू को नहीं जोड़ा गया है।
भारत जोर दे रहा है कि परमाणु हथियारों पर अंकुश और पूर्ण निरस्त्रीकरण के लिए क्षेत्रीय नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रयास होने चाहिए। दुनिया के कुछ हिस्सों में बड़ी शक्तियों के हस्तक्षेप के चलते जिस तरह से हर वक्त युद्ध की संभावना बनी रहती है, उसमें यह आशंका भी भयभीत करती है कि कब कोई संघर्षरत राष्ट्र परमाणु हथियारों का उपयोग कर बैठे। कहने को भले ही नई संधि प्रभावी हो गई हो, लेकिन परमाणु हथियारों का इस्तेमाल आतंकवादी समूहों या साइबर अपराधियों द्वारा नहीं किया जा सकता, इसकी गांरटी किसी राष्ट्र ने नहीं दी है। फिलहाल संधि के विरोध को देखते हुए दुनिया को परमाणु हथियारों से मुक्त करने का सपना फिलहाल पूरा होता दिखाई नहीं दे रहा है।
Published on:
27 Jan 2021 07:13 am
