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‘हम सुधरेंगे तो जग सुधरेगा।’ जाहिर है कि हमें दूसरों से अपेक्षा करने से पहले खुद को बदलना होगा। छोटे-छोटे गांव-कस्बों से सामूहिक संकल्प का भाव लिए जब बदलाव की ध्वजा थामने वाली खबरें आती हैं तो वे मन को सुकून देने वाली होती हैं। तमिलनाडु के मदुरै जिले के गांवों में राजनीतिक पोस्टरों, बैनरों व झंडों पर पूरी तरह से रोक का फैसला हो या फिर मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले के छोटे से गांव बोरसर को गालीमुक्त बनाने का ग्रामीणों का संकल्प। दोनों में ही सुधार की पहल घर से करने के प्रयासों में ग्रामीणों की भागीदारी स्वागत योग्य है। आज के दौर में जब भ्रष्टाचार, प्रदूषण, नशाखोरी और हिंसा का माहौल हर कहीं बड़ी समस्या के रूप में सामने आता है, स्थानीय स्तर पर ऐसे संकल्प सामाजिक जागरूकता बढ़ाने के ठोस उपाय ही कहे जाने चाहिए।
सब जानते हैं कि चुनावों के दौर में राजनीतिक दल और उम्मीदवार मतदाताओं को लुभाने के तमाम हथकंडे अपनाने से नहीं चूकते। चुनावों में धनबल और बाहुबल का इस्तेमाल राजनीति में खत्म नहीं होने वाली बुराई के रूप में सामने आने लगी है। जबकि लोकतंत्र का आधार जनता की स्वतंत्र इच्छा है। जब गांवों की गलियों और चौपालों पर राजनीतिक प्रचार के रंग-बिरंगे पोस्टर और बैनर छा जाते हैं, तो वातावरण अक्सर पक्षपातपूर्ण और दबावपूर्ण हो जाता है। ऐसे में मतदाता भी कहीं न कहीं प्रभावित होता है। ऐसे माहौल में जब तमिलनाडु के कुछ गांवों ने अपने यहां प्रचार सामग्री के इस्तेमाल पर रोक व प्रलोभनों को स्वीकार नहीं करने का संकल्प लेने का जो कदम उठाया है,वह राजनीति में शुचिता के प्रयासों को बल देने वाला ही कहा जाएगा। मध्य प्रदेश के बोरसर गांव में तो ग्रामीणों ने गाली देने वालों पर जुर्माना अथवा झाड़ू लगाने की सजा मुकर्रर कर दी है। सामाजिक समरसता बनाए रखने तथा बेवजह विवादों को बढऩे से रोकने की दिशा में गांववालों ने यह कदम उठाया है। पिछले दिनों ही महाराष्ट्र के एक गांव से खबर आई थी कि वहां पंचायत गांव की प्रत्येक कन्या के विवाह पर उसका कन्यादान करेगी। नशे पर रोक लगाने के लिए स्थानीय स्तर पर शराबबंदी और मादक पदार्थों के सेवन पर रोक तथा दहेज तथा मृत्युभोज जैसी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ भी स्थानीय व सामाजिक स्तर पर प्रतिबंधात्मक फैसले लिए जाने लगे हैं।
आज आवश्यकता है कि हम अपने घर, विद्यालय, कार्यस्थल और समाज में आत्म-सुधार की संस्कृति को बढ़ावा दें। बच्चों को ईमानदारी व अनुशासन का पाठ पढ़ाएं, युवाओं को जिम्मेदारी और परिश्रम का महत्व समझाएं। यह भी तय है कि सामाजिक बुराइयों को एक झटके में दूर नहीं किया जा सकता। इनसे कानून के जरिए भी निपटना भी अधिक आसान नहीं होता। वस्तुत: जब तक व्यक्ति स्वयं अपने भीतर अनुशासन, ईमानदारी और संवेदनशीलता का विकास नहीं करेगा, तब तक स्थायी परिवर्तन की उम्मीद बेमानी है।
Published on:
13 Apr 2026 03:54 pm
