18 जनवरी 2026,

रविवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

महामारी कानून लागू लेकिन प्रभावी नियंत्रण कैसे हो?

रामानुजम समिति ने अंग्रेजी राज में बने 2,781 कानूनों का अवलोकन करके 62.6 प्रतिशत कानूनों को शून्य करने की राय दी है। यह महामारी कानून भी इस सूचि में है। एक सर्वांगी और प्रभावी महामारी कानून बनाना और लागू करना जरूरी है, जिस पर गंभीरता से विचार करना होगा।

4 min read
Google source verification
Epidemic Act imposed.jpg

दिलीप जाखड़

कोरोना को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने महामारी (Epidemic) घोषित कर दिया है और केंद्र सरकार ने महामारी अधिनियम 1897 को लागू कर दिया है। यह कानून अंग्रेजी राज के द्वारा लागू किया गया 123 साल पुराना कानून है। यह कानून अंग्रेजी राज के द्वारा हड़बड़ी में बनाया गया था, क्योंकि इस इससे एक साल पहले बंबई प्रांत प्रांत में प्लेग की महामारी फैल गयी थी। इस कानून में 4 धारायें हैं और सिर्फ एक पन्ने में सिमटा है यह कानून! धारा 2 में राज्यों को यह अधिकार दिया गया है कि रेलवे व अन्य परिवहन से यात्रा कर रहे लोगों की चेकिंग की जाये। विरोध कर रहे लोगों को हिरासत में लेने और अस्पताल में भर्ती करने की शक्ति दी गई है। आदेश नहीं मानने वाले लोगों को धारा 188 भारतीय दंड संहिता के तहत 6 महीने की सजा और 1000 रुपए तक जुर्माना किया जा सकता है। धारा 2-ए में केंद्र सरकार को बंदरगाहों में ऐसी की कार्यवाही करने आदी के अधिकार दिए गए हैं। धारा 3 में दंड का प्रावधान है और धारा 4 में सदभावना से काम करने वाले कर्मियों को सुरक्षा दी गयी है।

सवा सौ साल पुराने इस महामारी कानून में हवाई अड्डों व हवाई परिवहन और अंतरराष्ट्रीय सीमा से हवा और मौसम के जरिए संक्रमण को रोकने जैसे प्रावधान नहीं है। यह बात गैर करने लायक है कि ईस्ट इंडिया कंपनी और अंग्रेजी राज अपने गुलाम देशों के लोगों के कल्याण के लिए वचनबद्ध नहीं थे। ईस्ट इंडिया कंपनी कॉलेज में उन्हें जो नीति निर्देश और ट्रेनिंग दी जाती थी, उसका जिक्र करना यहां जरूरी है। राबर्ट माल्थस इस कॉलेज में पॉलिटिकल इकॉनामी विभाग में प्रभावशाली पदों पर रहे। पहले उन्होंने महामारियों में सरकारी मदद की वकालत की थी। मगर बाद में उन्होंने जनसंख्या सिद्धांत पर पुस्तक लिखी और यह दावा किया कि जनसंख्या की वृद्धि की दर फसलों और खाद्य उत्पादन की दर से ज्यादा होती है। बढ़ती जनसंख्या को रोकने के लिए उन्होंने ब्रह्मचर्य और ज्यादा उम्र में शादी जैसी सलाह दी। साथ ही यह अजीब दावा किया कि कुदरती जनसंख्या नियंत्रण के तरीके अकाल और महामारी हैं।अत: सरकार और समाज को इनमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। अब उन्होंने गरीबों को राहत देने के लिए अकाल राहत जैसे कार्य की निंदा की। उनका तर्क था कि इससे मुद्रास्फीति बढ़कर आर्थिक विकास रुकता है।
श्री माल्थस रायल सोसाइटी के सदस्य रहे। दुनियाभर में फैले अंगरेजी राज के साम्राज्यवादी आकाओं को उनके तर्क पसंद आये। भारत जैसे देशों में अंगरेजी राज के दौरान शासक लोग उनके विचारों से प्रभावित रहे। लॉर्ड मैकाले तो तो उनके अंध भक्त थे। जिन्होंने भारत के कानूनों व राज व्यवस्था आदि की नींव रखी। आज के दौर में इस कानून की शक्ति से कोरोना जैसी महामारी से क्या प्रभावी तरीके से निपटा जा सकता है ? हमें इस सवाल पर गहराई से विचार करना चाहिये। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे महामारी तभी घोषित किया है। जब यह एक से दूसरे देशों में फैल रही है और नियंत्रण के लिए सभी देशों का संयुक्त प्रयास जरूरी माना जा रहा है। स्वाइन फ्लू, इबोला और हांगकांग फ्लू जैसे गंभीर उदाहरण हमने देखे और भुगते हैं। चेचक,और ब्लैक डैथ जैसी महामारियों के खतरे हमारे पूर्वजों ने झेले थे।

सरकार ने आपदा प्रबंधन अधिनियम को भी प्रभावी कर दिया । यह कानून गृह मंत्रालय के द्वारा लागू किया जाता है। जबकि कोरोना जैसी महामारी में स्वास्थ्य मंत्रालय की भूमिका अहम होती है। इसलिए महामारी कानून ही ऐसी समस्या के लिए उचित कानूनी प्रावधान है। महामारी कानून में सरकारों को नियम व उपनियम बनाने की शक्ति दी गयी है। कुछ राज्यों ने ऐसे उपनियम यानि रेग्यूलेशन बनाये भी हैं। इससे महामारी को प्रभावी तरीके से रोकना संभव हुआ है। अभी भी कुछ अन्य प्रावधान करने उचित होंगे।

लॉकडाउन को कारगर तरीके से लागू करने के लिए कर्मियों को कानूनी व तकनीकी दक्षता से लैस करना होगा। मेडिकल विभाग के अधिकारियों द्वारा प्रवास के दौरान रुके या रोके गये लोगों की जांच और अलगाव के बारे में उल्लंघन के मामले देखे गए हैं। भारी संख्या में लोगों को रोके रखने से दिल्ली व अन्य कई जगह बीमारी फैलने के मामले सामने आये हैं। आयात, हवाई यात्रा के नियंत्रण और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर भौगोलिक जांच तंत्र स्थापित करने जरूरी होंगे। ऐसे मामलों में यह आरोप लगाते हैं कि कई संस्थाओं और सरकारों द्वारा जरूरी सूचना दूसरे देशों को नहीं दी जाती। मुझे याद है कि अपने बाड़मेर पदस्थापन के दौरान पाकिस्तान से भारी मात्रा में कई टिड्डी दल आये थे और सीमा क्षेत्रों में तबाही मचायी थी। उनके प्रभावी नियंत्रण में पूर्व सूचना नहीं मिलने के कारण खासी समस्या आयी थी।
कानूनी प्रावधानों के अलावा नागरिकों को जागरूकता और संगठनों से सहयोग भी जरूरी है। ऐसे माहौल में सोशल मीडिया पर गैर जिम्मेदार तरीकों से अफवाहें फैलाने से हालत बिगड़ जाते हैं। बीमारी से भी ज्यादा घातक होता है। अब का माहौल, जिससे समस्या बढ़ जाती है। प्रवासी भारतीयों की आमद और लोगों के पलायन को नियमित करना जरूरी है। स्वयंसेवी संगठनों, नगर परिषदों व पंचायत राज संस्थाओं की प्रभावी मदद लेना व समन्वय करना उपयोगी होगा। मेडिकल के विशेषज्ञ मॉस्क के उपयोग के बारे में कई अलग-अलग राय दे रहे हैं। अलगाव में रखे गए लोगों के खाने-पीने, रहने और देखभाल की भी समस्या सामने आ रही है। इस सब मुद्दों पर कानूनी और प्रशासनिक व्यवस्था की जानी चाहिए।
अंत में महामारी के बारे में मेडिकल व तकनीकी विशेषज्ञों को सामने आना होगा। इसी तरह की महामारियों के पिछले उदाहरणों में क्या कमियां रही और कैसे उन्हें सफलता से काबू में लिया गया ? इस बीमारी की कारगर दवा ढूंढने का आपातकालीन समाधान किया जाना जरूरी है। साथ ही झोलाछाप डॉक्टरी उपायों पर रोक लगानी भी जरूरी है।विश्व स्वास्थ्य संगठन ने साफ किया है कि इस महामारी के खतरे और इलाज के बारे में अफवाह फैलने से रोके। लहसुन, हल्दी और दारू जैसी कथित दवाओं के बारे में इस संगठन ने बताया है कि इनसे इलाज में मदद नहीं मिलती है। विशेषज्ञों की सहमति से बनी नीति, बेहतर तालमेल से इसे लागू करने और जनता के जिम्मेदार रवैये से ही इसे नियंत्रण में किया जा सकता है। रामानुजम समिति ने अंग्रेजी राज में बने 2,781 कानूनों का अवलोकन करके 62.6 प्रतिशत कानूनों को शून्य करने की राय दी है। यह महामारी कानून भी इस सूचि में है। एक सर्वांगी और प्रभावी महामारी कानून बनाना और लागू करना जरूरी है, जिस पर गंभीरता से विचार करना होगा।

(लेखक, भारतीय पुलिस सेवा (IPS) से सेवानिवृत्त हैं।)