
चाहें तो मौत के बाद भी देख सकती हैं आंखें
डॉ. सुरेश पांडेय
वरिष्ठ चिकित्सक और कई पुस्तकों के लेखक
आंखों के अभाव में जीवन कितना मुश्किल हो सकता है। इसकी कल्पना कुछ मिनट हम अपनी आंखें बंद करके कर सकते हैं। हमारी आंखें जीवनभर हमें रोशनी देती हैं। हमारे मरने के बाद भी वह किसी और की जिंदगी से भी अंधेरा हटा सकती हैं। मुश्किल यह है कि जब बात नेत्रदान की होती है तो काफी लोग इस अंधविश्वास में पीछे हट जाते हैं कि कहीं अगले जन्म में वे नेत्रहीन पैदा नहीं हो जाएं। समाज में प्रचलित इस अंधविश्वास की वजह से कॉर्नियल अंधता से पीडि़त दुनिया के लाखों लोगों को जिंदगी भर अंधेरे में ही रहना पड़ता है। विश्व में प्रत्येक पांच सेकण्ड में एक वयस्क व्यक्ति एवं प्रति मिनट एक बच्चा अंधता के अभिशाप से ग्रस्त होता है। विश्वभर में चार करोड़ तीस लाख व्यक्ति अंधता के अभिशाप से ग्रसित हैं। भारत में लगभग एक करोड़ 80 लाख व्यक्ति अंधेपन के शिकार हैं। देश में अंधता/दृष्टि बाधिता के पांच प्रमुख कारण मोतियाबिन्द, काला पानी (ग्लूकोमा), दृष्टि दोष, रेटिना (पर्दे) की बीमारियां एवं आंख की पारदर्शी पुतली (कॉर्निया) में होने वाले रोग हैं।
भारत में कुल अंधता का लगभग 1 प्रतिशत कॉर्नियल ब्लाइंडनेस के कारण है। हर वर्ष बड़ी संख्या में रोगी कॉर्निया खराब होने के कारण अंधता से ग्रसित हो रहे हैं। इनमें से करीब 50 प्रतिशत रोगी कॉर्नियल ट्रांसप्लांट (पारदर्शी पुतली के प्रत्यारोपण) के जरिए रोशनी वापस प्राप्त कर सकते हैं। इसके लिए हर वर्ष कम से कम दो लाख पचास हजार कॉर्निया की आवश्यकता है, परन्तु प्रतिवर्ष 50 हजार के लगभग ही नेत्रदान हो पाते है। समूचे देश मे 25 अगस्त से 8 सितम्बर तक नेत्रदान पखवाड़ा मनाया जाता है। इसका प्रमुख उद्देश्य नेत्रदान की भ्रांतियों को दूर करना है एवं कॉर्निया ट्रांसप्लांटेशन के बारे में जनमानस के बीच नेत्रदान के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। विश्व भर में सबसे अधिक नेत्रदान (कॉर्निया डोनेशन) श्रीलंका में किए जाते हैं। समाज में नेत्रदान के प्रति जागरूकता बढ़ाकर भारत नेत्रदान के क्षेत्र में सम्मानजनक मुकाम पर पहुंच सकता है। कॉर्निया (पारदर्शी पुतली) प्रत्यारोपण को मेडिकल भाषा में केराटोप्लास्टी कहते हैं। यह एक विशेष प्रकार की शल्य क्रिया है, जिसमें दान की हुई आंख से पारदर्शक कॉर्निया निकालकर मरीज के अपारदर्शी कॉर्निया को बदला जाता है। यह दुर्लभ शल्य क्रिया सूक्ष्म शल्य क्रिया यंत्र (सर्जिकल माइक्रोस्कोप) की सहायता से की जाती है। कॉर्निया प्रत्यारोपण करने के लिए स्वस्थ कॉर्निया चाहिए और उसको प्राप्त करने का एक मात्र साधन है दान की हुई आंख। भारत में कॉर्निया की खराबी के कारण होती जा रही अंधता (कॉर्नियल ब्लाइंडनेस) की गहन समस्या को देखते हुए यह आवश्यक है कि ज्यादा से ज्यादा व्यक्ति अपनी आंखों का दान कर देश में अंधता को दूर करने में सहयोग दें। नेत्र चिकित्सक अब 3 अंधे मरीजों को दृष्टि देने के लिए एक कॉर्निया का उपयोग कर सकते है।
सवाल यह है कि आंख कब और कैसे दान की जाती है? मृत्यु के तुरन्त बाद (6 घंटे तक) मरने की सूचना नजदीकी नेत्र कोष (आई बैंक) पहुंचा दी जाए तो अस्पताल के नेत्र विभाग का कोई डॉक्टर अथवा प्रशिक्षित आई बैंक टैक्नीशियन आपके घर आकर मृतक की आंख का कॉर्निया निकालकर ले जाएगा और निकाली हुई खाली जगह पर आर्टिफिशियल कॉन्टेक्ट लेंस (शेल) लगा देगा, ताकि नेत्रदान करने वाले का चेहरा विकृत न दिखे। मरने के बाद जितनी जल्दी कॉर्निया निकाला जाए, उतना ही वह प्रत्यारोपण के लिए उत्तम रहता है। कॉर्निया निकालने का काम नि:शुल्क किया जाता है। किसी भी उम्र के मृत व्यक्ति की रोग रहित आंखें (कॉर्निया) प्रत्यारोपण के काम आ सकती हंै। दान किए गए कार्निया का उपयोग कॉर्निया प्रत्यारोपण के अलावा शोध कार्यों अथवा नेत्र चिकित्सकों के ट्रेनिंग के लिए भी किया जाता है। आकस्मिक दुर्घटना, हार्ट अटैक या पक्षाघात से मरने वाले का कॉर्निया श्रेष्ठ है। ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, अस्थमा, हृदय सम्बन्धी बीमारी से कालकवलित हुए व्यक्तियों की आंखें भी ठीक मानी जाती हैं। सेफ्टीसीमिया, वायरल संक्रमण, जहर, पानी में डूबने, फांसी लगाने, जलने या लंबे बुखार, सिफलिस, टी.बी., एड्स जैसी बीमारी के कारण यदि किसी की मौत होती है, तो उसकी आंखों के कॉर्निया को कॉर्नियल ट्रांसप्लान्टेशन के प्रयोग में नहीं लाया जाता है। भारतवर्ष में नेत्रदान के बारे में आम जनता में जागरूकता अति आवश्यक है। नेत्रदान के बारे में जागरूकता बढ़ाकर ही नेत्रदान की परम्परा को आगे बढ़ाया जा सकता है।
Updated on:
25 Aug 2023 09:40 pm
Published on:
25 Aug 2023 09:38 pm
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