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धर्म से दूर और अनियंत्रित शक्ति विनाश का कारण

कपट, छल और छद्म के साथ जीवनद्रोही आसुरी प्रवृत्तियां तेजी से सिर उठा रही हैं और चेतावनी दे रही हैं कि रावण दहन के रूप में सतही तौर पर प्रतीकात्मक विरोध दर्ज कराने भर से बात नहीं बनेगी। धर्म के अधिष्ठान श्रीराम स्नेह, दया और सौख्य के निधान हैं और उनके द्वारा शक्ति पूजा लोक-कल्याण के लिए है। शक्ति यदि धर्म से दूर और अनियंत्रित जो जाए, तो वह विनाशकारी हो जाती है। इसलिए धर्म और नैतिकता के मार्ग पर चलना ही एक मात्र विकल्प है।

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Patrika Desk

Oct 05, 2022

धर्म से दूर और अनियंत्रित शक्ति विनाश का कारण

धर्म से दूर और अनियंत्रित शक्ति विनाश का कारण


गिरीश्वर मिश्र
पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा

अ वतारों की पृष्ठभूमि में प्राय: धर्म की हानि का उल्लेख मिलता है और विशिष्ट देश काल में धर्म की संस्थापना के लिए अवतार होते रहे हैं। यद्यपि इन अवतारों की संख्या को सीमा में नहीं बांधा जा सकता, तथापि दशावतार बड़े प्रसिद्ध हैं और उनमें भी श्रीराम और श्रीकृष्ण अतुलनीय हैं। भारतीय काल गणना के अनुसार श्रीराम त्रेता युग में अवतरित हुए थे। सत युग के बाद आए त्रेता युग में विष्णु के कुल तीन अवतार हुए थे- वामन, परशुराम और राम। अवतारों की शृंखला में यदि विकास-क्रम में देखें, तो श्रीराम मत्स्य, कूर्म और वाराह आदि से होते हुए पूर्ण मनुष्य रूप में उपस्थित होने वाले पहले अवतार थे। इसीलिए उन्हें 'नारायणÓ भी कहा जाता है।
सौंदर्य, शक्ति और शील की प्रतिमूर्ति दशरथनंदन श्रीराम पर सभी मुग्ध होते हैं। उनकी लोकप्रियता और व्याप्ति का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि आज लगभग तीन सौ भाषाओं में राम-कथा का गायन मिलता है। भारत और विदेश में राम कथा के अनेकानेक संस्करण उपलब्ध हैं। इस कथा का प्रतिपाद्य धर्म की भावना जागृत करना है। धर्म को अनेक स्तरों या कोटियों में रख कर (जैसे-गृहधर्म, कुलधर्म, समाजधर्म, लोकधर्म और विश्व धर्म या पूर्ण धर्म) देखा जाता है, पर जो धर्म अधिक व्यापक है और सर्व की चिंता करता है वह पहले वाले से श्रेष्ठ है। इस कसौटी पर पूर्ण धर्म ही सर्वोच्च ठहरता है और इसका आधान पूर्ण पुरुषोत्तम ही हो सकता है। पुरुषोत्तम श्रीराम पूरी तरह धर्ममय हैं। मनुष्य रूप में उनकी लीला बाहरी दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में और भिन्न-भिन्न अवसरों पर प्रकट हुई। राम की गाथा लोक यानी हमारे आपके बीच धर्म का मार्ग प्रशस्त करती है। भक्ति, कर्म और ज्ञान की राह में धर्म उद्भासित होता है। श्रीराम लोक-कल्याण को सम्पादित करने वाले धर्म के परिचालक हैं।
पवित्रता और धर्म-परायणता के चरम उत्कर्ष राम 'मर्यादा पुरुषोत्तमÓ के रूप में विख्यात हैं। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि उन्होंने समकालीन परिस्थितियों में धर्म के पालन में आ रही विभिन्न अड़चनों और अव्यवस्थाओं को दूर किया। उनके शासन के आदर्श मानक बन गए । आज भी जन-मानस में उस राम-राज्य की सघन स्मृति बसी हुई है, जिसमें लोक जीवन में दैहिक, दैविक और भौतिक किस्म के त्रिविध ताप या कष्ट मौजूद नहीं हैं। यदि अयोध्या के राजा के रूप में श्रीराम के चरित्र को निकट से देखा जाए, तो यह प्रकट होता है कि लोक में व्याप्त पीड़ा, क्लेश, दु:ख, अन्याय तथा अत्याचार के दमन में वे सदैव जुटे रहते हैं। राम-कथा में अधर्म के नाश के लिए धर्म-वृत्ति के साथ संलग्नता के कठोर और कोमल यानी हर रूप दिखाई पड़ते हैं। वे आवश्यकतानुसार करुणा, प्रेम, क्रोध, त्याग और सहिष्णुता सभी का उपयोग करते हैं। अपने आचरण में श्रीराम स्थितप्रज्ञ की तरह हैं।
रामचरितमानस के अयोध्या कांड के शुरू में श्रीराम की वंदना करते हुए गोस्वामी तुलसीदास ने एक बड़ी मार्मिक अभिव्यक्ति दी है, जो श्रीराम के विलक्षण व्यक्तित्व को रेखांकित करती है। वे कहते हैं कि रघुकुल को आनंद देने वाले श्रीराम के मुखारविंद की जो शोभा राज्याभिषेक की बात सुन कर न तो प्रसन्नता को प्राप्त हुई और न वनवास की आज्ञा के दु:ख से मलिन हुई, ऐसी छवि सदा सुंदर मंगलों को देने वाली रहे।
नैतिक मानदंड कठोर होते हैं और जब आसुरी वृत्तियां उफान पर हों तो दृढ़ता से धर्म का अनुशासन जरूरी हो जाता है। विजयादशमी का पर्व श्रद्धापूर्वक साधना की परिणति को दर्शाता है। इन दिनों मीडिया में अशुभ तत्वों पर शुभ तत्वों की विजय की आकांक्षा और संकल्प पर चर्चा चल रही है। हिंसा पर करुणा, असत्य पर सत्य और अन्याय पर न्याय की विजय की कामना हमें उद्वेलित कर रही है। रावण के पुतले को जलाने का काम हाईटेक होता जा रहा है और बड़े पैमाने पर आयोजित राम लीला में रावण दहन किसी वरिष्ठ नेता द्वारा कराया जाता है। नेताओं द्वारा देश के लिए सुख-शांति के शुभ कामना संदेश दिए जाते हैं। नैतिक प्रदूषण और जीवन मूल्य में बदलाव के प्रश्न मन में घुमड़ रहे हैं।
राम और रावण जिन प्रवृत्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं उनके आयाम बदल रहे हैं। कपट, छल और छद्म के साथ जीवनद्रोही आसुरी प्रवृत्तियां तेजी से सिर उठा रही हैं और चेतावनी दे रही हैं कि रावण दहन के रूप में सतही तौर पर प्रतीकात्मक विरोध दर्ज कराने भर से बात नहीं बनेगी। धर्म के अधिष्ठान श्रीराम स्नेह, दया और सौख्य के निधान हैं और उनके द्वारा शक्ति पूजा लोक-कल्याण के लिए है। शक्ति यदि धर्म से दूर और अनियंत्रित जो जाए, तो वह विनाशकारी हो जाती है। इसलिए धर्म और नैतिकता के मार्ग पर चलना ही एक मात्र विकल्प है।