25 अप्रैल 2026,

शनिवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

संदर्भ: किसान आंदोलन, सहकारिता से ही किसानों का उत्थान संभव

सहकारी ऋणों की वसूली, पूंजी का निरन्तर अभाव और अवांछित राजनीतिक हस्तक्षेप ने सहकारी व्यवस्था को कमजोर बना दिया।

2 min read
Google source verification

image

Sunil Sharma

Nov 27, 2017

farmer agitation

farmer agitation

- रामचन्द्र सिंह जोधा, सहकारिता विशेषज्ञ

किसानों की आय दोगुनी करने का नारा तो दोहराया जाता है लेकिन उस पर अमल करने के प्रति उदासीन रवैया अपनाया जाता रहा है। किसान एक भीषण संकटकाल से गुजर रहा है और उसे हल करने का प्रभावी तरीका सहकारी क्षेत्र में सुधार से ही संभव है।

देश में सहकारिता की शुरुआत किसानों को साहूकारों से मुक्ति दिलाने एवं सस्ता व सुलभ कृषि ऋण मुहैया कराने के उद्देश्य से ब्रिटिश काल में 25 मार्च 1904 को हुई थी। यह व्यवस्था कुछ समय तक तो सुचारू रूप से चलती रही लेकिन कालांतर में इसमें कई कमजोरियां घर कर गईं। सहकारी ऋणों की वसूली, पूंजी का निरन्तर अभाव और अवांछित राजनीतिक हस्तक्षेप ने सहकारी व्यवस्था को कमजोर बना दिया। इन्हीं कारणों से कृषि ऋणों में सहकारी क्षेत्र का योगदान निरन्तर घटता गया।

नतीजतन किसानों को अल्पकालीन कृषि साख के लिए वाणिज्यिक बैंकों और गैर संस्थागत स्रोतों पर निर्भर होना पड़ रहा है। बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद भी एक गरीब व अशिक्षित कृषक के लिए वाणिज्यिक बैंक से ऋण प्राप्त करना तो दूर की बात है वह शाखा प्रबंधक तक भी नहीं पहुंच पाता। अगर किसी मध्यस्थ के मार्फत किसी तरह बैंक तक पहुंच भी जाए तो बैंकों से ऋण लेना न तो सस्ता है और न ही सुलभ। भारत की लगभग 75 प्रतिशत आबादी गांवों में रहती हैं लेकिन बैंक शाखाओं का मात्र 37 प्रतिशत हिस्सा ही ग्रामीण क्षेत्रों में हैं।

बैंकों का मुख्य ध्यान शहरी केन्द्रों पर होता है, ग्रामीण क्षेत्रों में तो मात्र उपस्थिति एवं खानापूर्ति के लिए कुछ कामचलाऊ शाखाएं खोली जाती हैं। ऐसी स्थिति में ग्रामीण किसानों द्वारा कृषि ऋण प्राप्त करना और कठिन हो गया हैं। सहकारी संस्थाएं किसानों के घर पर उपस्थित होती हैं तथा स्वयं किसानों द्वारा ही संचालित होती हैं। अत: इनसे ऋण लेना और चुकाना बैंकों की अपेक्षा काफी आसान होता है।

किसानों की आय दोगुनी करने का नारा तो दोहराया जाता है लेकिन उस पर अमल करने के प्रति उदासीन रवैया अपनाया जाता रहा है। किसान जिस संकटकाल से गुजर रहा है उससे उबरने का प्रभावी तरीका सहकारी क्षेत्र में सुधार से ही संभव है। यदि सहकारी आन्दोलन को किसानों की खुशहाली का प्रभावी जरिया बनाए रखना है तो सहकारी साख संस्थाओं को मजबूत करने के लिए और गम्भीर प्रयास करने होगें ।