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अस्तित्व की लड़ाई

तनुश्री एक्ट्रेस हैं, पर रूपन देओल बजाज तो वरिष्ठ आईएएस अधिकारी थीं। रूपम देओल को सत्रह साल अदालत में लडऩा पड़ा। उसके सारे आरोप सही पाए गए और आईपीएस सुपरकॉप केपीएस गिल दोषी।

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जयपुर

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Sunil Sharma

Oct 03, 2018

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- आशुतोष, वरिष्ठ मीडियाकर्मी

क्या तनुश्री दत्ता के आरोप निराधार हैं या फिर नाना पाटकर ने वाकई उनके साथ अभद्रता की है? ये सवाल महज एक सवाल नहीं रहा। अब इसने एक बहस को जन्म दे दिया है। बहस दो स्तरों पर है। एक महिला की अपनी साख से जुड़ता है और दूसरा स्त्री के अस्तित्व को ललकारता है। ये सवाल हर बार उठता है कि तनुश्री ने दस साल बाद इस मामले का जिक्रक्यों किया? वो पहले क्यों नहीं बोलीं? क्या आरोप और समय के बीच कुछ स्वार्थ जुड़ गया? इस बीच ये सवाल गुम हो जाता है कि दस साल पहले भी उन्होंने ये मसला उठाया था, आवाज बुलंद की थी तब उनकी आवाज को किसी ने तवज्जो नहीं दी थी। तो क्या इन दस सालों में बहुत कुछ बदला है जो अब ये चर्चा का विषय बना है?

तनुश्री का मसला अकेला नहीं है। पिछले ही महीने तीन बड़े वाकये हुए। एक नन ने एक पादरी पर बलात्कार का आरोप लगाया। तो कहा गया कि वो बारह बार क्यों चुप रही? तेरहवीं बार क्यों बोली? उसके पक्ष में दूसरी ननों ने प्रदर्शन किया। काफी हीलाहवाली के बाद पादरी को गिरफ्तार किया गया। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया। ये फैसला केरल के सबरीमला मंदिर में दस से पचास साल की महिलाओं के मंदिर प्रवेश पर लगे प्रतिबंध से जुड़ा था। अदालत ने प्रतिबंध हटा दिया। अदालत ने एक और फैसला दिया एडल्ट्री के संबंध में। डेढ़ सौ साल पुराने कानून को निरस्त करते हुए कहा कि स्त्री पुरुष की संपत्ति नहीं है। पहले, पति की मर्जी से पराए मर्द से संबंध बनाना तो जायज था लेकिन प्रेमी पुरुष के साथ अगर वो अपनी सहमति से रिश्ता कायम करती तो भी पुरुष को ही सजा मिलती। यानी स्त्री की अपनी कोई सहमति नहीं होती, उसका अस्तित्व कुछ भी नहीं।

भारत का संविधान स्त्री-पुरुष में भेद नहीं करता। वह दोनों को बराबर मानता है। जैसे कानून दलित और सवर्ण को एक दृष्टि से देखता है। लेकिन हकीकत में न तो स्त्री-पुरुष को बराबर माना जाता और न ही दलित-सवर्ण को। हैरानी की बात ये है कि हमारी परंपरा इसकी इजाजत देती है। उससे ज्यादा हैरानी इस बात की है कि इसी परंपरा में ये भी कहा गया है द्ग ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता।’ यानी वो लक्ष्मी भी है और सरस्वती भी। वो दुर्गा भी है और चंडी भी। लेकिन सती भी उसे ही होना होता है। हमारी परंपरा में सती सावित्री तो है, सती सत्यवान नहीं है। पति युद्ध में मरे तो पत्नी को जौहर करना होता है। इसलिए जब-जब स्त्री आवाज उठाती है उसे सम्मान से नहीं देखा जाता। उसके चरित्र पर लांछन लगाया जाता है।

जब तनुश्री कहती हैं कि नाना ने उसके साथ बदतमीजी की, तब एक बार के लिए तो सन्नाटा छा जाता है क्योंकि देश अब सती और जौहर के दौर से बाहर आ चुका है, वो इक्कीसवीं सदी में सांस ले रहा है। लेकिन पुरुषप्रधान सत्ता चूंकि आज भी कायम है, फिर से फुसफुसाहट होती है कि तनुश्री कौन-सी सती सावित्री है? फिल्म इंडस्ट्री के बड़े-बड़े स्टार चुप्पी साध लेते हैं। पूछने पर कहते हैं ‘न तो मैं तनुश्री हूं और न ही मैं नाना।’ तनुश्री एक्ट्रेस हैं, पर रूपन देओल बजाज तो वरिष्ठ आइएएस अधिकारी थीं। बात 1988 की है। रूपम देओल को सत्रह साल अदालत में लडऩा पड़ा। उसके सारे आरोप सही पाए गए और आइपीएस सुपरकॉप केपीएस गिल दोषी ठहराए गए।

अमेरिका में हार्वे वाइनस्टीन जैसे निहायत शक्तिशाली सिनेमा दिग्गज के खिलाफ अस्सी से ज्यादा औरतों ने आरोप लगाया कि उसने उनका शारीरिक दोहन किया। तीस साल तक औरतें चुप रहीं, क्योंकि समाज उनके आरोपों को सुनने के लिए तैयार नहीं था, वाइनस्टीन शक्तिशाली था और लोगों की किस्मत बनाता-बिगाड़ता था। वक्त बदला, औरत भी बदली। आज वह जेल की हवा खा चुका है। उसी तरह टीवी स्टार बिल कॉस्बी भी अस्सी साल की उम्र में सलाखों के पीछे है।

पिछले बीस सालों में देश में भी हवा बदली है। स्त्रियां ‘स्टेरियटाइप’ यानी रूढि़वादी व्यवस्था को तोड़ रही हैं। बाबा साहेब आम्बेडकर ने बहुत पहले कहा था कि भारतीय संविधान ने दलितों को फ्रांसीसी क्रांति की तर्ज पर समानता और स्वतंत्रता का अधिकार तो दिया, पर समाज ने बंधुत्व का व्यवहार नहीं दिया। दलितों को संवैधानिक बराबरी तो मिली, पर उन्हें इंसान नहीं माना गया। वे हार गए तो बौद्ध बन गए। स्त्री कहां जाए?

फ्रांसीसी लेखिका और दार्शनिक सिमोन द बोउआ कहती हैं द्ग ‘समाज के नियम कानून तो पुरुषों ने बनाए और औरत को कमजोर बना दिया। वह पुरुषों की सूपिरीऑरिटी को ध्वस्त कर के ही अपनी कमजोरी से निजात पा सकती है।’ तनुश्री लड़ रही हैं। और लड़ रही हैं गुलाबी गैंग की सखियां। आज के हिंदुस्तान में जब पुरुषवादी विचारधारा अपने उभार पर है तो स्त्री को अपने अस्तित्व के लिए लडऩा तो होगा। उसे नकारना होगा कि वह अबला है ताकि फिर कोई कवि ये न कहे द्ग ‘अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी, आंचल में है दूध और आंखों में पानी।’