
द वाशिंगटन पोस्ट से... गलत साबित हुआ राष्ट्रपति बाइडन का अनुमान
डेविड वान ड्रेहल
(स्तम्भकार और 'राइज टु ग्रेटनेस' व 'ट्राइएंगल' समेत चार किताबों के लेखक)
अमरीका के सबसे खूनी युद्ध के दौरान जॉन हे और जॉन निकोले ने तत्कालीन राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन के निजी सचिवों के रूप में काम किया था। उन्होंने युद्धकाल में नेतृत्व की सरपरस्ती में बहुत कुछ सीखा। वर्षों बाद, उन्होंने उन सीखों को लिंकन प्रशासन के बहुखंडीय इतिहास में लिपिबद्ध किया। इसमें उन्होंने सबसे महत्त्वपूर्ण जो बात लिखी, वह है- 'हर युद्ध राजनीतिक विचारों से शुरू होता है, असर डालता है और खत्म हो जाता है। राष्ट्र के बिना, सरकार के बिना, धन या क्रेडिट के बिना, जनता के समर्थन के बिना, समर्थकों के उत्साह के बिना न तो कोई सेना हो सकती है और न ही कोई युद्ध।'
यह सीख आज भी सच है। अफगानिस्तान में अमरीकी युद्ध इसलिए खत्म हो गया, क्योंकि जनता थक गई थी और राजनेता इसके खिलाफ हो गए थे। युद्ध को खत्म करने के वादे पर 2016 में डॉनल्ड ट्रंप राष्ट्रपति चुने गए थे। उससे आठ वर्ष पहले बराक ओबामा भी इसे खत्म करने के वादे पर चुनाव जीते थे। इसे खत्म करने का वादा करते हुए पिछले वर्ष बाइडन भी राष्ट्रपति चुने गए थे। अमरीकी जनता एक दशक से ज्यादा समय से यही चाहती भी थी। सबसे महत्त्वपूर्ण बात तो यह है कि अफगान लोगों ने कभी युद्ध का समर्थन नहीं किया और न यह चाहत रखी कि अमरीकी सेना जब लौटे, तो कुछ सैनिक वहां रुके रहें। उन्होंने ऐसे नेताओं को आगे ही नहीं बढ़ाया जो जनता की खातिर व्यक्तिगत हितों का त्याग कर सकें। हालत यह है कि अफगानिस्तान के अपदस्थ राष्ट्रपति अशरफ गनी भारी मात्रा में नकदी लेकर देश से बाहर निकल गए। इसके विपरीत तालिबान काफी उत्साहित था और उसके लड़ाके लडऩे के लिए हमेशा मुस्तैद नजर आए।
मौजूदा हार की यही वजह है। यह कैसे हुआ और यूएस ने कैसे साइगॉन और मोगादिशु में हुए कटु अनुभवों को फिर से निर्मित करने का प्रबंधन किया? - ऐसे सवाल का जवाब कुछ हटकर है, जो सहज ही नहीं समझा जा रहा है। दरअसल, आधुनिक गृहयुद्धों में विद्रोही फायदे में रहते हैं, जिसकी वजह वह समर्थन है, जिसके आगे दीर्घकाल में भलीभांति प्रशिक्षित, सुसज्जित और अनुशासित अमरीकी सेनाएं भी कमतर साबित हुई हैं। यह कल्पना से परे लगता है कि वियतनाम के किसानों या पिकअप ट्रकों में तालिबान लड़ाकों के खिलाफ विश्व की सबसे ताकतवर सेना कमतर रही। असल में हम तदनुसार अपनी योजना में बदलाव करने में विफल रहे हैं। जहां व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो चुकी थी या जहां कभी इसका अस्तित्व ही नहीं रहा, उन समुदायों में व्यवस्था कायम करने में आने वाली मुश्किलों को हम कम आंकते रहे । और जैसी भी व्यवस्था हम मुहैया करा पाए, उसके स्थायित्व को लेकर हमें जरूरत से ज्यादा संतोष रहा। अफगानिस्तान युद्ध का दरअसल यही निचोड़ है।
अमरीकी नेता बीस वर्ष पहले भी अफगानिस्तान में व्यवस्था बनाने की योजना में विफल रहे और आज भी वे अपनी उपलब्धियों को ज्यादा आंक कर विफल हुए। उन्होंने अफगान सरकार की स्थिरता को महीनों में नापा, जबकि उन्हें इसे घंटों में गिनना चाहिए था।
अमरीका द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से दुनिया भर में उग्रवाद से लड़ रहा है और हमारे खाते में जीत की तुलना में अधिक नुकसान दर्ज हैं। यदि बाइडन ने तालिबान को ज्यादा गंभीरता से लिया होता, तो शर्मनाक हार के लिए उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जाता। तालिबान रणनीतिक तौर पर इतनी मजबूत स्थिति में आ चुका था कि नए सिरे से जंग ही समाधान हो सकता था और इसके लिए राजनीतिक समर्थन नदारद था।
(द वाशिंगटन पोस्ट से विशेष अनुबंध के तहत )
Published on:
19 Aug 2021 12:34 pm
बड़ी खबरें
View Allओपिनियन
ट्रेंडिंग
