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विद्यार्थियों को प्रकृति से जोडऩे के पक्षधर थे गांधी

गांधी जयंती, प्राकृतिक पर्यावरण से जुड़ाव वाली शिक्षा के महत्त्व पर विचार करने में हमारी मदद कर सकती है।

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Gyan Chand Patni

Oct 02, 2023

विद्यार्थियों को प्रकृति से जोडऩे के पक्षधर थे गांधी

विद्यार्थियों को प्रकृति से जोडऩे के पक्षधर थे गांधी

डॉ. ज्योति साही

कलाकार और शिक्षक (द बिलियन प्रेस)

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और गुरुदेव रबीन्द्र नाथ टैगोर दोनों ही मानते थे कि शिक्षा में किए जाने वाले प्रयोग भारत की स्वदेशी पहचान को फिर से खोजने पर आधारित होने चाहिए। टैगोर ने एक अलग तरह की स्कूली शिक्षा का नवाचार किया था जो पश्चिमी मॉडल से अलग थी। रबीन्द्रनाथ टैगोर का अपना खुद का स्कूली शिक्षा का अनुभव ठीक नहीं था। वे मानते थे कि युवाओं के ज्ञान को व्यापक बनाने का वास्तविक तरीका उन्हें प्राकृतिक माहौल में और संपूर्ण सृष्टि के साथ सामंजस्य बिठाकर शिक्षित करना है। रबीन्द्रनाथ और गांधीजी दोनों ही प्रकृति के साथ रहकर सीखने-सिखाने के हिमायती थे। जिस जैन परंपरा से गांधीजी ने अहिंसा की अवधारणा सीखी थी, उसमें माना जाता है कि प्राचीन काल में मनुष्य को जीवन के लिए जो कुछ भी आवश्यक था वह सब कल्पवृक्षों से प्राप्त होता था।

भगवान बुद्ध को भी पेड़ के नीचे ही ज्ञान प्राप्त हुआ था। टैगोर स्वयं ही 'द रिलिजन ऑफ द फॉरेस्ट' में लिखते हैं कि वन जीवन के स्रोत हैं। शिक्षाविद् मार्जोरी साइक्स ने भारत को अपना घर बना लिया था और प्रकृति के जरिए सीखने के समग्र दृष्टिकोण की खोज में गांधी तथा टैगोर दोनों के साथ मिलकर काम किया था। वे लिखती हैं कि त्योहारों का आयोजन जीवन को प्रकृति की लय से जोडऩे का एक तरीका है। 1928 में, टैगोर ने शांतिनिकेतन में वृक्षारोपण उत्सव की शुरुआत की। 1936 से 'वृक्षारोपण' उत्सव शांतिनिकेतन में आश्रम जीवन का नियमित हिस्सा बन गया। ऋतुओं से जुड़े अन्य त्योहारों, जैसे 'पौष मेला' में स्थानीय शिल्पकारों को उनकी कलाकृतियों के साथ आमंत्रित किया जाता था। विश्वभारती के छात्र बसंत उत्सव के दौरान नृत्य और संगीत के कार्यक्रमों में शामिल होते थे। यह उदाहरण था कि लोक संस्कृति के साथ शिक्षा को कैसे जोड़ा जा सकता है। आश्रम का माहौल इंगित करता है कि गांधी और टैगोर दोनों ने ही प्रकृति की मौलिकता के जरिए सीखने की कोशिश की। किताबी शिक्षा जिन्दगी के कटु अनुभवों का स्थान नहीं ले सकती। अनुभूति के लिए हृदय की संवेदनाएं भी जरूरी हंै, केवल बौद्धिक ज्ञान नहीं।

हम जब आश्रम के आदर्शों की प्रासंगिकता को लेकर टैगोर और गांधी दोनों के विचारों पर सोचते हैं तो हमें महसूस होता है कि दोनों पारिस्थितिकी से प्रेरित थे।

गांधी जयंती, प्राकृतिक पर्यावरण से जुड़ाव वाली शिक्षा के महत्त्व पर विचार करने में हमारी मदद कर सकती है। गांधीवादी सुंदरलाल बहुगुणा ने पेड़ों को गले लगाने वाले लोक अनुष्ठान को सामाजिक-पारिस्थितिकी सक्रियता में बदल दिया था। उनका काम 'चिपको आंदोलन' के रूप में प्रसिद्ध है। युवाओं में पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन को लेकर जागरूकता बढ़ रही है। आश्रम शिक्षा ऐसे लोगों को नई दिशा देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगी जो उपभोक्तावादी संस्कृति में अटके हैं। ताकत और विशेषाधिकार प्राप्त लोगों और वंचितों के बीच अंतर बढ़ रहा है। समग्र शिक्षा के लिए गांधीवादी दृष्टिकोण अब पहले से कहीं अधिक अपरिहार्य हो गया है।