
गफूर खां : जिन्होंने दी सूफी संगीत को नई दिशा
डॉ. भुवनेश जैन
नेहरू युवा केंद्र संगठन, नई दिल्ली
बाड़मेर का शिव इलाका मांड क्षेत्र कहलाता है। इसी क्षेत्र का एक गांव झाफली कलां अपने महान मांगणियार कलाकारों के कारण दुनिया भर में जाना जाता है। इसी झाफली कलां गांव के गफूर खां मांगणियार परंपरागत जांगड़ा गायकी, सिंधी संगीत, सूफी संगीत के साथ खड़ताल वादक के रूप में भी विख्यात हंै। इनका चयन देश के प्रतिष्ठित केंद्रीय संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार 2020 के लिए किया गया है। सम्मान समारोह इसी माह है। आकाशवाणी केंद्र में सिंधी संगीत के प्रथम श्रेणी के कलाकार गफूर खां को जांगड़ा शैली का गायन और सूफी संगीत विरासत में मिला हैं। उनको इन तीनों में सिद्धता प्राप्त है। निहाल खां एवं सद्दीक खां की देखरेख में नेहरू युवा केन्द्र के तहत लोक संगीत प्रशिक्षण में गफूर खां ने अपनी प्रतिभा को तराशा। अपनी साधना से वे नई पीढ़ी को भी तैयार करने में लगे हैं। गफूर का मन सूफी संगीत में रमता है। वे सूफी गीतों, भजनों में अपना स्वर, खड़ताल की ताल, कमायचा की धुन पर देते हंै, तो सभी मदहोश हो जाते है। लगता है ईश्वर-अल्लाह के करीब पहुंच गए हैं। बाबा बुल्लेशाह, शेख फरीद, अमीर खुसरो की रचनाओं को जब गफूर गाते हंै, तो लगता है कि अमृत की धार बह निकली है। धरती आकाश का मिलन हो गया है, जैसे प्रेम ही प्रेम चारों ओर है। गफूर खां मीरा, कबीर, नानक की निर्गुण भक्ति को भी उतनी ही सहजता और सरलता से प्रस्तुत करते हैं कि गीत संगीत की धारा जन-मन को निर्मल कर जाती है। लोक संगीत, सूफी संगीत और सिंधी संगीत का एक साथ ज्ञान, हुनर उनको हिंद सिंध के कलाकारों में श्रेष्ठता प्रदान करता दिखाई पड़ता है। गफूर अब तक 250 से अधिक मांगणियार और लंगा बच्चों को लोक संगीत, सूफी संगीत गायन एवं खड़ताल वादन में पारंगत कर वीरान धरती को संगीत की फसल से हरा-भरा कर रहे हैं।
गफूर ने रेगिस्तान के सूफी संगीत को नया अंदाज खड़ताल का प्रयोग करके दिया है। उनके काका सद्दीक खां ने खड़ताल को शुरू किया और सूफी संगीत के साथ उसे जोड़ा। गफूर ने इस परंपरा को आगे बढ़ाकर उसमें अनेक प्रयोग किए। ढाई इंच चौड़ी और सात इंच लंबी दो-दो लकड़ी की पट्टिकाओं का जोड़ा खड़ताल कहलाता है। साज-आवाज, लय-ताल में खड़ताल के साथ बेहतर संगीत ने गफूर को सूफी संगीत की दुनिया में अलग नाम, मुकाम दिया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने वाले 63 वर्षीय गफूर खां को एक हजार से अधिक लोकगीत, दोहे, सिंधी गीत, सूफी गीत, भजन, देवी-देवता की चिरजा मुंह जुबानी याद हंै। वे 75 से अधिक देशों में अपनी प्रस्तुतियां दे चुके है। उनको राजस्थान सरकार सहित देश-विदेश के अनेक सांस्कृतिक संस्थानों ने पुरस्कार देकर सम्मानित किया है। वे बाड़मेर जिले के सीमावर्ती तहसील शिव के झांफली गांव में परिवार के साथ रह रहे हैं। जब गफूर स्वयं गाते हैं, खुद ही खड़ताल के साथ नृत्य करते हैं, बजाते हैं तो श्रोता भी झूम उठते हैं। भैरवी, जोग, भरवास, कोयरी, तिलंग, सामुद्री, कल्याण आदि राग-रागनियों में सूफी संगीत को प्रस्तुत करते हैं। ढोलक की थाप, कमायचा के तारों पर मन को झंकृत करने वाला संगीत एक मेक हो जाता है, तब लगता है जैसे प्रेम भक्ति की एक अद्भुत दुनिया में प्रवेश कर गए हैं। गफूर के अनुसार सूफी संगीत प्रेम, इंसानियत को बढ़ाने के लिए है। सूफी गायन में सच्चाई ही सच्चाई है, झूठ नहीं। भविष्य सूफी संगीत का है। लोक गीतों में और उसकी शैली में बदलाव आ रहा है, लेकिन सूफी में ऐसा नहीं है।
Published on:
06 Feb 2023 09:11 pm
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