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PATRIKA OPINION चुनावी राजनीति की फांस का असर क्यों

सत्तारूढ़ दल के संसदीय प्रबंधक इस मुद्दे का हल निकाल लेते तो टकराव से बचा जा सकता था। संसद चलाने की जिम्मेदारी सत्ता पक्ष की ज्यादा है। सत्तापक्ष और विपक्ष को जनादेश का सम्मान करने के लिए तैयार रहना होगा। लोकतंत्र में जीत- हार के अपने मायने हैं, लेकिन देश चलाने के लिए दलगत मतभेद भुला एक मंच पर आना ही होगा।

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टकराव जब लक्ष्मण रेखा पार कर जाए तो वही होता है, जो मंगलवार को लोकसभा में हुआ। लोकसभा अध्यक्ष पद के लिए आम तौर पर सर्वसम्मति से होने वाले चुनाव की बजाय अब मुकाबला तय हो गया है। उम्मीद थी कि नवनिर्वाचित सांसदों को शपथ लेने के लिए प्रोटेम स्पीकर की नियुक्ति को लेकर उपजा विवाद अब थम जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। एनडीए के ओम बिरला के सामने 'इंडिया' गठबंधन ने के. सुरेश को मैदान में उतार दिया। यह बात और है कि मौजूदा समीकरणों में जीत का जरूरी आंकड़ा 'इंडिया' के पास नहीं है।
अठारहवीं लोकसभा के सत्र के ऐसे आगाज से आगे के हाल का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। लोकतंत्र में पक्ष-प्रतिपक्ष का अपना महत्त्व है। इसके बावजूद आम जनता के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि स्पीकर के चुनाव को लेकर उपजे इस टकराव को क्या टाला नहीं जा सकता था? लोकसभा अध्यक्ष का चुनाव आम सहमति से होने की परिपाटी यदि कायम रहती तो क्या यह अच्छा नहीं होता? सब जानते हैं कि इस मामले में दोनों तरफ से गंभीर प्रयास हुए होते तो हमेशा की तरह लोकसभा अध्यक्ष का चुनाव आम सहमति से होने में कोई बाधा नहीं थी। यह बात सही है कि राजनीतिक दलों की अपनी- अपनी रणनीति व अपनी-अपनी मजबूरियां होती हैं। लेकिन लाख टके का अनुत्तरित सवाल तो यह है कि चुनावी राजनीति की फांस का असर आखिर लोकतंत्र के मंदिर में क्यों दिखाई दे?
बीते बरसों में संसद ने पक्ष-प्रतिपक्ष के बीच जैसा टकराव देखा वैसा शायद ही कभी नजर आया हो। सवाल यह भी है कि आखिर लोकसभा अध्यक्ष के पद को लेकर यह टकराव हुआ क्यों? क्या इस टकराव की वजह लोकसभा में डिप्टी स्पीकर का पद है? आमतौर पर यह पद मान्यता प्राप्त विपक्ष को जाता रहा है। कांग्रेस की सरकार थी तो डिप्टी स्पीकर पद विपक्ष के पास बना रहा। पांच साल अकाली दल और पांच साल भाजपा का डिप्टी स्पीकर रहा। बीते दस सालों में लोकसभा में मान्यता प्राप्त विपक्ष नहीं था, तो पद खाली रहा। इस बार प्रमुख विपक्षी दल बनकर उभरी कांग्रेस की मांग है कि यह पद उसकी झोली में जाना चाहिए। सत्तारूढ़ दल के संसदीय प्रबंधक इस मुद्दे का हल निकाल लेते तो टकराव से बचा जा सकता था। संसद चलाने की जिम्मेदारी सत्ता पक्ष की ज्यादा है। सत्तापक्ष और विपक्ष को जनादेश का सम्मान करने के लिए तैयार रहना होगा। लोकतंत्र में जीत- हार के अपने मायने हैं, लेकिन देश चलाने के लिए दलगत मतभेद भुला एक मंच पर आना ही होगा।