
हर संकट से उबरेंगे जो देश के युवा बनेंगे ‘हरित कुशल’
भुवनेश जैन
निदेशक, नेहरू युवा केंद्र संगठन, नई दिल्ली
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वैश्विक जलवायु परिवर्तन से उपजे संकट से मुकाबला करके जलवायु-अनुकूल दुनिया बनाने के सपने को साकार करने के लिए हरित कौशलता के रास्ते उम्मीद जगा रहे हैं ताकि दुनिया ज्यादा हरी-भरी, सुरक्षित और टिकाऊ बन सके। इस वर्ष के अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस के लिए संयुक्त राष्ट्र की थीम भी यही है कि ‘हरित कौशल’ (ग्रीन स्किल्स) से सुसज्जित युवा एक सस्टेनेबल दुनिया के निर्माण का रास्ता बनाएं। यूनेस्को की एक रिपोर्ट के अनुसार, ‘हरित परिवर्तन’ के परिणामस्वरूप वर्ष 2030 तक दुनिया में युवाओं के लिए (15 से 29 वर्ष आयु वर्ग) 8.4 मिलियन हरित नौकरियों का सृजन होगा। इसलिए बदलते परिवेश में युवाओं को हरित कौशल से सुसज्जित होने की जरूरत है। दुनिया में इस समय 15-24 आयु वर्ग के 1.2 बिलियन युवा हैं और दुनिया की करीब आधी आबादी 30 वर्ष से कम उम्र के युवाओं की है।
ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकोनोमिक कोऑपरेशन एंड डवलपमेंट (ओईसीडी) के अनुसार हरित कौशल वह ज्ञान, क्षमता, मूल्य और दृष्टिकोण है जो एक टिकाऊ और संसाधनयुक्त कुशल समाज में रहने, इसे विकसित करने और इसका समर्थन करने के लिए आवश्यक है। इसमें तकनीकी ज्ञान और कौशलता शामिल है जो हरित प्रौद्योगिकी और प्रक्रियाओं के प्रभावी उपयोग को सक्षम बनाते हैं। सीवरेज जल उपचार, नवीकरणीय ऊर्जा, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, जल संरक्षण, वानिकी, सोलर व विंड एनर्जी, रिसाइक्लिंग, ग्रीन बिल्डिंग पर्यावरण, वन-कृषि, जलवायु परिवर्तन, इलेक्ट्रिक व्हीकल जैसे विज्ञान और इंजीनियरिंग से जुड़े अनेक क्षेत्र हैं जिनमें ‘हरित कौशल’ के उपयोग से युवा कार्बन उत्सर्जन और प्रदूषण को कम कर, जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र के नुकसान को रोक कर हरित दुनिया बनाने में योगदान दे सकते हैं। ‘हरित कौशल’ की शिक्षा और प्रशिक्षण की उपलब्धता रोजगार देगी और दुनिया को भी संरक्षित करेगी। बच्चों की प्रारम्भिक शिक्षा में ही उन्हें हरित कौशल के प्रति जागरूक और संवेदनशील बनाने की जरूरत है। देश में प्रयोगधर्मी, सामाजिक सरोकारों की सुध लेने वाले विद्यालय अपने विद्यार्थियों को ऊर्जा, जल संरक्षण, परिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने के लिए जिम्मेदार और हरित नागरिकों के रूप में तैयार कर अपना महती योगदान दे सकते हैं। यदि विद्यालयों में बने इको-क्लब अधिक सुसज्जित और जीवंत होंगे तो विद्यालयों से मिलने वाली सीख नई पीढ़ी को ज्यादा संवेदनशील और जिम्मेदार भूमिका के लिए तैयार करेगी। घरों में भी जरूरत के अनुसार रिड्यूस, रियूज व रिसाइकिल के सिद्धांत पर वस्तुओं की खरीद व उपभोग जरूरी है। साइकिल का उपयोग, पौधे लगाना, स्वच्छता और सामुदायिक हरियाली में योगदान को हर नागरिक अपना कत्र्तव्य समझेगा तभी हम 2030 तक अपने लक्ष्यों को हासिल कर सकेंगे। जैसे परम्परागत देशज हरित कौशल के उपयोग का एक प्रेरणादायी उदाहरण ओडिशा के इंजीनियर दंपती आशीष पाण्ड्य और मधुलिका ने राजस्थान के डूंगरपुर में प्रस्तुत किया। उन्होंने ऐसा इको-फ्रेंडली घर बनाया जिसमें सीमेंट और स्टील का उपयोग ही नहीं किया गया। जैसे राजस्थान के पुराने महल, हवेलियां और घर, पत्थर, चूने व मिट्टी से बने हैं और आज भी टिकाऊ हैं, उसी तरह उन्होंने हवा और रोशनी से भरपूर घर तो बनाया ही, जल संरक्षण, 150-200 प्रजाति के पौधे, साग-सब्जियां, हर्बल गार्डन की बेमिसाल आत्मनिर्भर व्यवस्था का भी ध्यान रखा।
जाहिर है कि हरित कौशल की शिक्षा, प्रशिक्षण और जीवन की वास्तविक स्थितियों में हरित कौशल के अनुप्रयोग, नई पीढ़ी में प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और भावी पीढ़ी की सुरक्षा के प्रति जिम्मेदारी के अहसास से ही बढ़ेगी। तकनीकी योग्यता के साथ-साथ उन आदतों, व्यवहार व मनोवृत्ति को भी बदलने की जरूरत रहेगी जिनसे पारिस्थितिकी तंत्र, पर्यावरण, धरती, नदी, समंदर व अन्य जलस्रोतों को नुकसान पहुंच रहा है। जीवन के प्राण तत्वों को बचाने के लिए हरित कौशल और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता आज की जरूरत है। जरूरत है समुदाय, विशेष रूप से युवा पीढ़ी, को आगे आने की ताकि हरित कौशल एवं देशज हरित ज्ञान व व्यवहार से समस्त मानव जाति का और हमारी धरती का भविष्य संवारा जा सके।
Published on:
13 Aug 2023 09:32 pm
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