
शरीर ही ब्रह्माण्ड : दूजा न कोय
Gulab Kothari Article शरीर ही ब्रह्माण्ड: सृष्टि के दो भाग हैं-एक प्रलय, दूसरा सृष्टि। एक ब्रह्मा की रात्रि है, दूसरा ब्रह्मा का दिन। अवधि में दोनों बराबर हैं। गीता के अनुसार ब्रह्मा का एक दिन एक हजार चतुर्युगी* अवधि वाला है। रात्रि भी एक हजार चतुर्युगी अवधि वाली है। ब्रह्मा के दिन के प्रवेश काल में सम्पूर्ण चराचर ब्रह्मा के सूक्ष्म शरीर से उत्पन्न होते हैं। ब्रह्मा की रात्रि में ब्रह्मा के उस अव्यक्त शरीर में लीन हो जाते हैं।
सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदु:।
रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जना:।। (गीता 8/17)
अव्यक्ताद्व्यक्तय: सर्वा: प्रभवन्त्यहरागमे।
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसञ्ज्ञके।। (गीता 8/18)
ब्रह्मा के दिन में एक है सहस्र युग और दूसरा है चार युग। इसका अर्थ है ब्रह्मा भी एक नहीं दो हैं। आभूतत्त्व* एक है, अभ्व* अनेक रूप है। दोनों अविनाभूत हैं, नित्य सम्बद्ध हैं। इन दोनों की उन्मुग्ध अवस्था निर्गुण ब्रह्म है। ये ही कारण विशेष से उद्बुद्ध होकर सगुण ब्रह्म कहलाते हैं। निर्गुण ब्रह्म विश्वातीत होने से व्यापक है, अगोचर है। शब्दातीत होने से अनुपास्य है। सब में अनुस्यूत (पिरोया हुआ) है। विश्व की उत्पत्ति-स्थिति-संहार तीनों ब्रह्मलक्षण ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र (महेश) रूप देवत्रयी पर निर्भर है। जो ब्रह्मा माया द्वारा उत्पन्न है, वह तो परमेष्ठी समुद्र से पैदा होता है। अश्वत्थ वृक्ष की स्वयंभू नाम की बल्शा (शाखा) बनता है। उसी से आगे मृत्युलोक की सृष्टि होती है।
विश्वातीत ब्रह्मा भी एकल है। उसकी कामना-'एकोऽहं बहुस्याम्' को पूरी करने वाली अद्र्धांगिनी नहीं है। यहां सत्यलोक के स्वयंभू ब्रह्मा भी एकल पुरुष हैं। इनके भी अद्र्धांगिनी नहीं है। दोनों ने अपनी-अपनी सृष्टि रचना के लिए 'स्त्री' तत्त्व को पैदा किया और सृष्टि सर्जना की। इसका अर्थ है कि एक ब्रह्म माया विशिष्ट अनेक ब्रह्माण्डों का जनक है, अकेला है। वही स्वयंभू ब्रह्मा के रूप में मत्र्य भाव में आता है। वह भी अकेला है। अप् को पैदा करता है, जो अग्नि-सोम रूप है। इसी परमेष्ठी आपोलोक से स्वयंभू का प्रादुर्भाव होता है।
सृष्टि रचना हेतु यह अप् तत्त्व रूप स्त्री को उत्पन्न करता है। इसी पारमेष्ठ्य अप् तत्त्व और स्वयंभू के युगल भाव से जो सूर्य उत्पन्न होता है, आश्चर्य की बात यह सूर्य भी अकेला है। अपत्नीक हैं। सूर्य विष्णु के चार रूपों* में से एक हैं जो सत्यनारायण या श्वेतद्वीप निवासी कहलाते हैं। वह भी अकेला। सृष्टि के नियमों को पकड़ पाना संभव नहीं। हर स्तर पर अग्नि ही सोम को पैदा करता है, सोम में अग्नि को प्रकट करता है, वपन क्रिया होती है, और सभी कुछ पूर्ववत्।
यह सत्यनारायण सूर्य भी अकेला कहां है? इसकी नाभि में तीनों अक्षर प्राण रहते हैं। ये ही ऋक्-यजु:-साम हैं। ये केन्द्र के स्वरूप को बनाए रखने में सहायक हैं। किन्तु सृष्टि विस्तार में तो अद्र्धांगिनी ही चाहिए। ''सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च...' सूर्य जगत का पिता है। यह जिस रूप में जगत का पिता है- सत्यनारायण-उस रूप में अकेला है, सदा खड़ा ही रहता है, तपता रहता है। किरणें, चन्द्रमा, पृथ्वी, तुलसी, गंगा आदि सूर्य की पत्नियां हैं।
इनमें से किरणों के अतिरिक्त कोई संग नहीं रहती। किरणें भी सूर्य शरीर का अंग नहीं हैं। शास्त्रों में इनकी उपाधि राधा-कृष्ण की है। ये विश्व के स्रष्टा हैं। राधा जननी है- अन्तरिक्ष से सोम ग्रहण करती है। विद्युत उत्पन्न होती है। सिद्धान्त है कि प्रत्येक निर्माण अग्नि रूप होता है। सोम अग्नि में आहूत हो जाता है, शेष अग्नि रहता है।
विद्युत इन्द्र की शक्ति है। इसी कारण इसको वर्षा का देवता कहते हैं। विद्युत के लिए पहले बादल उत्पन्न किया जाता है। वर्षा के बाद बादल नष्ट हो जाता है। बीज वपन के बाद योनि नष्ट हो जाती है। यह भी आश्चर्य है। खेत में भी वपन के बाद धरती को संवार देते हैं। एक प्रकार से ढक देते हैं। अन्न ग्रहण से पूर्व अग्नि की (वैश्वानर) आह्वान-प्रार्थना की जाती है। शरीर की अग्नि को जठर में स्थापित किया जाता है, तब मुख में आहुति दी जाती है।
यज्ञ समाप्ति पर आहुति बन्द, वैश्वानर अग्नि मन्द होकर रस में परिणत होने लग जाती है। इसी तरह प्राणी शरीरों में पहले अग्नि प्रज्वलित की जाती है। वपन क्रिया के बाद यह अग्नि मन्द पड़ जाती है। इसकी आवश्यकता समाप्त हो जाती है। यदि प्रजनन की आवश्यकता नहीं है, वहां न रेत है, न ही शुक्र का आह्वान है! इसलिए तो कहा है-''एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म'।
श्रुति कहती है-तुम ही (ब्रह्म) स्त्री हो, तुम पुरुष हो, तुम कुमार हो, कुमारी भी तुम्ही हो। तुम न स्त्री, न पुरुष और ना ही नपुंसक हो, यानी सभी तुम ही हो-
त्वं स्त्री, त्वं पुमानसि, त्वं कुमार उत वा कुमारी।
नैव स्त्री न पुमानेष न चैवायं नपुंसक।
ये कुछ चारों ओर दिखाई दे रहा है, सब मिथ्या है। अर्थात्-ये सारे मेरे आवरण हैं। इन सबके भीतर मैं हूं। यह बात कृष्ण ने गीता में कई स्थानों पर कही है। क्या यह आश्चर्य नहीं कि जिनको विश्वस्रष्टा कहा, चाहे वह ब्रह्म हो, ब्रह्मा हो, सूर्य हो, किसी के भी पत्नी नहीं है। ये सब सृष्टि के लिए स्वयं अपना योनि भाव पैदा करते हैं, और मकड़ी की तरह उसी में समाविष्ट हो जाते हैं। स्वयं भी सात लोक- चौदह भुवन की यात्रा करते हैं। चौरासी लाख योनियों के स्वयं ही नर हैं, स्वयं ही निर्माता हैं। सम्पूर्ण चराचर के अकेले पुरुष होने का यही रहस्य है।
सृष्टि विज्ञान का यह चौथा आश्चर्य है कि ब्रह्म अपनी योनि पैदा करता है, उसमें प्रवेश करता है, उसे बाद में नष्ट भी कर देता है और जब फल (शरीर) तैयार हो जाता है, तब शरीर पर सवार होकर मातृकुक्षि भी छोड़ देता है। मानो यह देह उसके निर्माण का स्थल हो। जो नए शरीर में गया, वह कहीं नहीं बदला।
स्त्रिय: सतीस्तां उ मे पुंस आहु: पश्यदक्षण्वान्त वि चेतदन्ध:।
कविर्य: पुत्र: स ईमाचिकेत यस्ता विजानात् सपितुष्पितासत् ॥ (ऋ .1.164.16)
अर्थात्-जो स्त्री रूप है, तत्त्व ज्ञानी उनको भी पुरुष कहते हैं। एक ही उपाधि शून्य आत्मा जब भिन्न-भिन्न शरीरों में जाता है तो उनकी स्त्री-पुरुष संज्ञा हो जाती है। वह एक ही है अर्थात् तुम वही हो- 'तत्वमसि' यानी कि गॉड पार्टिकल, जिसे आधुनिक वैज्ञानिक ढूंढ़ रहे हैं।
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चतुर्युगी = सत्य, त्रेता, द्वापर और कलियुग ये चारों युग मिलाकर एक चतुर्युगी होती है। ऐसे हजार चतुर्युग व्यतीत होने पर ब्रह्मा जी का एक दिन पूरा होता है।
आभू = अपरिवर्तनीय कार्य का मूल आभू है, यही रस कहलाता है।
अभ्व = परिवर्तन के योग्य कार्य का मूल अभ्व कहलाता है। यही बल है।
विष्णु के चार रूप = १. वैकुण्ठनाथ, २. समुद्रशायी, ३. श्वेतद्वीप निवासी (सत्यनारायण सूर्य) और ४. गोलोकनाथ।
क्रमश:
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Published on:
12 Aug 2023 04:38 pm
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