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शरीर ही ब्रह्माण्ड : दर्शपूर्णमास

हमारी तरह प्रत्येक जड़-चेतन पदार्थ का दर्शपूर्णमास काल होता है और यह काल नियत भी होता है। अश्विन मास घृत का पौर्णमास है, शेषकाल दर्श है। अश्विन मास में आकाश से वायु द्वारा घृत की वर्षा होती है।... शरीर ही ब्रह्माण्ड श्रृंखला में 'प्रकृति तंत्र' को समझने के लिए पढ़िए पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी का यह विशेष लेख -

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sharir hi brahmand

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विश्व का निर्माण अग्नि-सोम के योग (यज्ञ) से होता है। अधिदैव में इनके स्वरूप इन्द्र और वरुण होते हैं। हम पार्थिव प्राणी हैं। पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है। चन्द्रमा भी पृथ्वी के साथ रहता है। इसी प्रकार जब सूर्य परमेष्ठी लोक की परिक्रमा करता है, तभी पृथ्वी और चन्द्रमा दोनों अपने-अपने परिक्रमा पथ पर भ्रमण करते रहते हैं। ये परिक्रमा पथ अण्डाकार होते हैं। पृथ्वी का परिक्रमा पथ क्रान्तिवृत्त कहलाता है। सूर्य और पृथ्वी दोनों एक-दूसरे को अपनी ओर खींचते रहते हैं। अत: परिक्रमा परिणाम बनती है। पृथ्वी की एक परिक्रमा-क्रिया को संवत्सर नाम से जाना जाता है। सभी पिण्ड अग्नि रूप होते हैं। इनसे निकलने वाली अग्नि ऋताग्नि कहलाती है। सृष्टि के आरंभ में सब कुछ ऋत ही था। किसी का कोई आकार नहीं था। ऋत अग्नि दक्षिण से उत्तर की ओर (ऊपर) उठती है और ऋत सोम ऊपर से नीचे। नीचे गिरता हुआ सोम अग्नि में आहूत होता जाता है। इस क्रम से ही विभिन्न ऋतुओं का निर्माण होता जाता है। इसी आहुति क्रम को संवत्सर यज्ञ कहते हैं। विश्व निर्माण का मूल हेतु संवत्सर है। इसी को दर्शपूर्णमास यज्ञ भी कहा जाता है।
सोमरूप चन्द्रमा अग्नि रूप पृथ्वी की परिक्रमा करता है। इसकी परिक्रमा एक मास में पूर्ण होती है। चन्द्रमा सूर्य के प्रकाश से चमकता है। पृथ्वी की छाया में ढक जाता है। इस कारण चन्द्रमास शुक्ल और कृष्ण दो स्वरूप ग्रहण कर लेता है। शुक्ल पक्ष की पूर्णता जहां पूर्णिमा है, वहीं कृष्ण पक्ष की पूर्णता अमावस्या (दर्श) कहलाती है। इन्हीं के मध्य में चन्द्रमा की यात्रा रहती है। इनका मूल है प्रतिपदा। यहीं से चन्द्रमा घटता-बढ़ता है। पूर्णिमा युवावस्था है, शुक्लद्वितीया जन्मकाल, शुक्लाष्टमी बचपन है। कृष्णाष्टमी वृद्धावस्था तथा दर्श (अमावस्या) मृत्यु है।

चन्द्रमा के सारे दिन-रात प्रतिपदा का ही अनुसरण करते हैं। नेतृत्व को प्रतिपत् कहते हैं, शेष अनुचर ही कहलाते हैं। चन्द्रमा प्रतिपत् है, नक्षत्र अनुचर हैं। प्रतिपत् एक होगा, अनुचर अनेक होते हैं। कृष्ण प्रतिपदा प्रतिपत् है, इसका कार्यकाल दर्शपर्यन्त है। शुक्ल प्रतिपदा का कार्यकाल पूर्णिमा पर्यन्त है। दर्शकाल में चान्द्र तत्त्व दूर हो जाते हैं, पूर्णिमा में ये तत्त्व जीव से जुड़ते हैं। इस दर्शपूर्णमास का प्रकृति के संवत्सर में महत्त्वपूर्ण स्थान है। हमारी तरह प्रत्येक जड़-चेतन पदार्थ का दर्शपूर्णमास काल होता है और यह काल नियत भी होता है। अश्विन मास घृत का पौर्णमास है, शेषकाल दर्श है। अश्विन मास में आकाश से वायु द्वारा घृत की वर्षा होती है। इसी प्रकार चैत्र-बैसाख को मधुमास (बसन्त) कहा जाता है। इनमें सूर्य से मधु-वृष्टि होती है। सूर्य जब भरणी नक्षत्र (मधुच्छत्र) पर आता है, तब से मधु का पौर्णमास शुरू हो जाता है। प्रकृति के सभी पदार्थों में माधुर्य का विकास होता है। प्रत्येक पदार्थ का आगमन काल पौर्णमास है, वियोग दर्श है। अन्तरिक्ष में दधि, घृत, मधु, ईक्ष आदि के समुद्र हैं। इनके अपने-अपने दर्शपौर्णमास हैं। इन मासों में उत्पन्न अन्न-फल-औषधियों में ये गुण प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। यह प्रकृति का तंत्र परिक्रमा क्रम के रूप में ही उपलब्ध होता है। अत: इसे दर्शपूर्णमास यज्ञ कहा जाता है।

चन्द्रमा चूंकि पृथ्वी की परिक्रमा करता है, अत: पृथ्वी को प्रतिपत् और चन्द्रमा को अनुचर कहते हैं। चन्द्रमा के साथ पृथ्वी भी सूर्य की परिक्रमा करती है। पृथ्वी में भी प्रकाश-अन्धकार रूप अवस्थाएं पैदा होती हैं। इनको अदिति-दिति कहते हैं। दिन में पृथ्वी का प्रकाशित भाग अदिति है। छाया भाग (रात्रिकाल) दिति है। मध्याह्न पूर्णिमा, अद्र्धरात्रि दर्श है। उत्तरायण अदिति तथा दक्षिणायण दिति है। उत्तरायण मध्यकाल (उत्तर) पूर्णिमा तथा दक्षिणायण मध्यकाल दर्श (दक्षिण) है। विषुवकाल पूर्णिमा है। संवत्सर पूर्णिमा रूप है। प्रकाशमय है।


उत्तर-दक्षिण ध्रुव प्रदेशात्मक अद्र्धखगोल का परिमाण 180 अंश है। इसके बीच के पूर्वापर वृत्त बृहतीछन्द (विष्वद् वृत्त) है। इसके 90 अंश पर उत्तर-दक्षिण ध्रुव है। क्रान्तिवृत्तीय पृष्ठी केन्द्र कदम्ब और विष्वद्वृत्तीय पृष्ठी केन्द्र ही धु्रव है। बीच में विष्वद्वृत्त है। इसके उत्तर-दक्षिण में 24 -24 अंश का परिसर मण्डल है। यह 48 अंश का परिसर ही सम्वत्सर है। पृथ्वी क्रान्तिवृत्त पर परिक्रमा करती है। स्वयं के अक्ष पर भी घूमती है। अत: पूरे परिक्रमा काल में 24 अंश उत्तर में (कर्क रेखा तक) तथा 24 अंश दक्षिण में (मकर रेखा तक) यात्रा करती है। इसी मध्य चन्द्रमा भी प्रतिमाह इन क्षेत्रों से गुजरता रहता है। पौर्णमास इष्टि का सम्बन्ध विषुवकाल से ही है। यही समस्त देवताओं का स्थान है। यही पृथ्वी का पौर्णमास है। सूर्य पृथ्वी का प्रतिपत् है। पृथ्वी अनुचर है। पृथ्वी और चन्द्रमा के साथ सूर्य भी परमेष्ठी लोक की परिक्रमा करता है। पं. मोतीलाल शास्त्री ने इस परिक्रमा काल को पच्चीस हजार वर्ष लिखा है। सूर्य के दर्शपौर्णमास से मह:लोक में प्रकृति के तीनों गुण (सत्त्व, रज, तम) उत्पन्न होते हैं। परमेष्ठी का प्रकाशित भाग ही उत्तरायण है- पूर्णिमा है। दिति भाग दक्षिणायण है- तमोभाव है। सन्धि भाग रज प्रधान है। यहां सूर्य अनुचर है, परमेष्ठी प्रतिपत् है।

सूर्य-पृथ्वी-चन्द्रमा परमेष्ठी में बुद्बुद् की तरह है। तीनों को साथ लेकर परमेष्ठी भी स्वयंभू मण्डल की परिक्रमा करता है। इसी से विश्व का निर्माण होता है। विश्व भी प्रकाश रूप है- पुण्याह है। ब्रह्मा का दिन है। अदिति मण्डल है। पूर्णिमा है। स्वयंभू स्थिर है। सूर्य के आगे मह:लोक है, जो परमेष्ठी और सूर्य के मध्य का अन्तरिक्ष है। परमेष्ठी आप: लोक है। इसमें भृगु-अंगिरा-अत्रि तीन तत्त्व रहते हैं। ये तीनों मह:लोक में सृष्टि का विकास करते हैं। आप: जल को कहते हैं। सर्वत्र जल से ही सृष्टि होती है। ईश्वर मह:लोक में ही सृष्टि का बीजारोपण करता है।
मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम्।
संभव: सर्वभूतानां ततो भवति भारत।। गीता 14.3
इसके लिए अत्रि प्राण आप: बिन्दुकण की पारदर्शिता को रोकता है, ताकि इस पर प्रतिबिम्ब पड़ सके। दर्पण की तरह इस आप: (जल) कण पर अव्यय पुरुष का प्रतिबिम्ब पड़ता है। यही जीव सृष्टि है। इसी आप: रूप जीव पर सूर्य का भी प्रतिबिम्ब पड़ता है। इससे जीव में अहंकृति पैदा होती है। इसी प्रकार चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब से प्रकृति तथा पृथ्वी के प्रतिबिम्ब से आकृति उत्पन्न हो जाती है। मह:लोक से पूर्व केवल अव्यय पुरुष संस्था है। केवल अमृत सृष्टि है।

इस प्रकार सभी चारों लोक (पृथ्वी-चन्द्रमा-सूर्य और परमेष्ठी) अपने-अपने परिक्रमा पथ पर भ्रमण करते हुए स्वयंभू (सत्यलोक) से युक्त होकर 'सर्वहुतयज्ञ' के कारक बनते हैं। यही पंचपर्वा विश्व कहलाता है। सातों लोक ही एक-दूसरे लोक के लिए मध्याह्न बनते जाते हैं। इन पंच पर्वों के ही सप्त लोक बनते हैं। स्वयंभू अपने शुद्ध गतिभाव से स्थितरूप से इन छह लोकों को धारण करते हुए ब्रह्मा कहलाते हैं।
क्रमश:
gulab.kothari@epatrika.com