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उच्च शिक्षा हो स्थानीय मांग व स्थितियों के अनुरूप

राष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित संस्थानों (आइओईज) का स्वयं का एक विशिष्ट स्थान है क्योंकि उन्हें ज्यादा अकादमिक और प्रशासनिक स्वायत्तता मिलती है। इन्हें केंद्र से अतिरिक्त वित्त पोषण भी मिलता है। इसलिए क्यूएस वल्र्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग में शीर्ष 500 में इनका प्रभुत्व होना कोई अचरज की बात नहीं है।

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जयपुर

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Patrika Desk

Sep 15, 2022

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भारत में उच्च शिक्षा संस्थानों की अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग पर चर्चा वर्ष में एक बार ही होती है। यह वार्षिक परंपरा भी तब निभाई जाती है, जब प्रतिष्ठित क्यूएस वल्र्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग की घोषणा की जाती है। उच्च शिक्षण संस्थानों की इस रैंकिंग का अनुपातिक आधार - अकादमिक प्रतिष्ठा (40%), नियोक्ता प्रतिष्ठा (10%), संकाय-छात्र अनुपात (20%), प्रति संकाय प्रशंसा पत्र (20%), अंतरराष्ट्रीय संकाय (5%) एवं अंतरराष्ट्रीय छात्र अनुपात (5%) है। क्यूएस वल्र्ड रैंकिंग सिस्टम के इस संस्करण में अंतरराष्ट्रीय अनुसंधान नेटवर्क व रोजगार परिणाम का प्रतिशत शून्य रहा है। निस्संदेह यह हर्ष का विषय है कि विश्व के शीर्ष 1000 संस्थानों में भारतीय संस्थानों की संख्या 22 से बढक़र 27 हो गई है। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (आइआइएससी), बेंगलूरु 31 पायदान चढक़र वर्ष 2023 के संस्करण में सर्वोच्च स्थान पाने वाला भारतीय संस्थान बना है किन्तु केवल राष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित संस्थानों (आइओईज) को छोडक़र भारतीय विश्वविद्यालयों के प्रदर्शन पर कोई गंभीर बहस होती नहीं दिखाई पड़ती है। राष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित संस्थानों (आइओईज) का स्वयं का एक विशिष्ट स्थान है क्योंकि उन्हें ज्यादा अकादमिक और प्रशासनिक स्वायत्तता मिलती है। इन्हें केंद्र से अतिरिक्त वित्त पोषण भी मिलता है। इसलिए क्यूएस वल्र्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग में शीर्ष 500 में इनका प्रभुत्व होना कोई अचरज की बात नहीं है।