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कार्यनिष्ठा की मिसाल थे हिमांशु

हिमांशु ऐसे पुलिस अधिकारी थे जो पूरी न्याय प्रक्रिया से गुनहगार को सजा दिलाने तक अपनी जिम्मेदारी निभाते थे।

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Sunil Sharma

May 14, 2018

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himanshu roy

- उज्ज्वल निकम, मुम्बई हाईकोर्ट में वरिष्ठ लोक अभियोजक

पुलिस अधिकारी का खयाल आते ही आमतौर पर एक रौबदार कडक़ आवाज वाला व्यक्तित्व दिमाग में उभरता है। कठोर अनुशासन के साथ कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी वहन करने वाले पुलिस वालों से हमें मृदुभाषी और विनम्र होने की उम्मीद कम ही होती है, लेकिन मुंबई के ‘सुपर कॉप’ पूर्व एटीएस चीफ हिमांशु रॉय इस लिहाज से सबसे अलग थे। उनसे मेरा परिचय करीब 30 वर्षों का था। वे सभी के साथ, चाहे अपने मातहत अदना कर्मचारी ही क्यों न हो, अत्यधिक विनम्रता और आदर के साथ व्यवहार किया करते थे। वे बड़े और छोटे सभी को सम्मान से ही संबोधित करते थे।

मैंने बहुत से पुलिस वाले देखे हैं, जो मानते हैं कि आरोपी गिरफ्तार हो गया तो उनका काम समाप्त हो गया। हिमांशु ऐसे पुलिस अधिकारी थे, जो आरोपियों की गिरफ्तारी पर ही चुप नहीं हो जाते थे। वे पूरी न्याय प्रक्रिया से गुनहगार को सजा दिलाने तक अपनी जिम्मेदारी निभाते थे। उनके कार्यकाल में कोई मामला निपटाने की प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई हो और उनका स्थानांतरण अन्यत्र हो गया हो तो भी वे अन्य पद पर रहते हुए पिछले मामले को निपटाने में भरपूर मदद करते थे।

उन्हें कई प्रसिद्ध मामलों की तह खोलने का श्रेय जाता है। विशेष तौर पर जॉइंट पुलिस कमिश्नर रहते हुए उन्होंने 2012-14 के दौरान इंडियन प्रीमियर लीग में सट्टेबाजी का मामला पकड़ा। वे लश्करे तैयबा से संबद्ध आतंकी डेविड हेडली के 26/11 के मुंबई हमले से जुड़ाव को खोजने वाले दल के प्रमुख सदस्य थे। वे अपराधियों के विरुद्ध न्याय प्रक्रिया में पूरी दिलचस्पी लिया करते थे। मुंबई हमलों के दोषी अजमल कसाब मामले की सुनवाई की आखिरी तारीख थी तो मेरे पास उनका फोन आया कि सुनवाई के समय वे कोर्ट में उपस्थित रहना चाहते हैं। मैंने जब कहा कि आप जरूर आएं तो वे सपत्नीक कोर्ट की कार्यवाही देखने आए। उन्होंने ही अपनी टीम के सहयोग से पूरी गोपनीयता और सतर्कता के साथ कसाब को मुंबई से पुणे जेल में स्थानांतरित करवाया।

रॉय को अपना शरीर चुस्त-दुरुस्त रखने की काफी फिक्र रहती थी। वे नियमित व्यायाम करते थे। उनको मैं बाहुबली पुकारा करता था। उन्हें किसी भी मामले में हारना पसंद नहीं था। वे दो साल से कैंसर से संघर्ष कर रहे थे और शायद इसीलिए उन्होंने बीमारी से हारने की बजाय आत्महत्या का रास्ता चुना। अपने कार्य को पूरी निष्ठा और ईमानदारी से करने के मामले में, पुलिस महकमे में उनकी मिसाल दी जाती रहेगी।